इसे भी एक राहत मानकर चलिए कि अब तक गर्मियों के लिए वैश्विक तपन को कारण और एसी-कूलर को निवारण बताने वाला मुख्यधारा का मीडिया अब कम से कम लिखना-बोलना तो शुरू किया है कि सीमेंट के मकानों से गर्मी अधिक लग रही है। सरकार भी अब गर्मी सम्मेलन (हीट समिट) कराने लगी है।
36 वर्ष पूर्व जब शहरीकरण को जब रोमैंटिसाइज किया गया, तो सीमेंट-सरिया के उसके मकान मानक हिस्सा हो गए। नगरों में सीमेंटेड सड़कें, मकान और वृक्ष विहीन भूमि मिलकर ‘सुपर समर’ का कॉकटेल तैयार कर रहे हैं। सीमेंट के मकान गर्मी की भट्टी बन गए हैं। बाहर के तापमान के मुकाबले इन मकानों के अंदर औसतन 5 से दस डिग्री तक अधिक गर्मी होती है। दिन में सूर्य की गर्मी से एक बार तप जाने के बाद शाम में जब धूप खत्म हो जाती है, तो सीमेंट-सरिया वाली दीवारें धीरे-धीरे गर्मी छोड़ती है। इस कारण रात भर मकान गर्म ही रहता है। दस घंटे के बाद जब दीवारें ठंडी होनी शुरू होती हैं, तब तक फिर से चिलचिलाती धूप उग जाती है और इस प्रकार चौबीसों घंटे मकान गर्म ही रहते हैं।
ऐसा नहीं है कि उक्त बातें पहले से हमें या मीडिया को मालूम नहीं है। सबको सब पता है। लेकिन, कहने में संकोच है कि जिस वास्तुकला को विश्व भर में अत्याधुनिक निर्माण के रूप में पूजा जा रहा हो, उसकी आलोचना भारत में कैसे हो सकती है भला! स्टेरियोटाइप से अलग होने का भय, भीड़ से हटकर कहने में संकोच। ”सब लोग सीमेंट के मकान बनवा रहे हैं, तो सारे के सारे मूर्ख थोड़े होंगे!… और सीमेंट के मकान में गर्मी लगती है, तो इसके लिए एसी-कूलर हैं ही न! फिर इतना क्या सोचना भला!”
लेकिन, सोचने का समय आ गया, क्योंकि कल तक ठंडक देने वाली पंखे की हवा अब आग बरसा रही है, क्योंकि कूलर में 24 घंटे रहना सुखकर नहीं होता, क्योंकि धड़ाधड़ एसी ब्लास्ट हो रहे हैं, क्योंकि लगातार एसी में रहने से शुष्क नेत्र व शुष्क त्वचा की समस्या आ रही है, क्योंकि प्राकृतिक हवा के अभाव में शरीर व मन बीमार हो रहे हैं, लिस्ट लंबी है और समस्या बड़ी। समस्या विकराल है इसलिए बड़े शोध संस्थान से पढ़कर निकले अभियंता व वास्तुकार चेन्नई के पक्के मकानों में बकायदा सेंसर लगाकर शोध कर रहे हैं और यह सिद्ध कर रहे हैं कि भारत जैसे उष्णकटिबंधीय क्षेत्र के लिए इस प्रकार के मकान अनुकूल नहीं हैं। बड़े अखबार व टीवी चैनल प्रमुखता से समाचार चला रहे हैं कि कंक्रीट के मकान हीट ट्रैपर हो गए हैं। शोधकर्ता बता रहे हैं कि किसी भी परिस्थिति में इन भवनों का तापमान 32 से 25 डिग्री से कम नहीं हो रहा है। यह डेटा चेतावनी भरा है।
गर्मी के मौसम में कंक्रीट के मकानों को प्राकृतिक रूप से ठंडा रखने के लिए छत को श्वेत पेंट करना, हल्के रंग के मोटे परदे लगाना, वेंटिलेशन रखना, सीलिंग ऊंची रखना आदि जैसे समाधान ऊंट के मुंह में जीरा के समान है। इसलिए अब समय आ गया है कि एआई के लिए अरबों रुपए खर्च करने वाली सरकार स्थानीय वातावरण के अनुसार सतत आवासन तकनीक पर शोध के लिए पैसे निकाले। यहां सावधानी रखनी होगी कि आवासन की तकनीक तब ही असर करेगी, जब पूरे नगर का वास्तु अनुकूल हो। इसके कई मंत्रालय का समन्वय करना होगा। दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था वाले मुल्क में 80 करोड़ लोगों को चावल बांटा जा रहा है, तो आवासन भी मौलिक आवश्यकता है। हालांकि, सरकार पहल शुरू कर दी है। पिछले दिनों क्लाइमेट ट्रेंडस द्वारा इंडिया हैबीटेट सेंटर में आयोजित ”इंडिया हीट समिट 2026” में केंद्रीय मंत्री प्रह्लाद जोशी ने भी स्वीकार किया कि बढ़ता तापमान हमारी अर्थव्यवस्था व नागरिकों के दैनिक जीवन के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन चुका है।
गर्मी से मुकाबले में अमीरी-गरीबी का अंतर स्पष्ट दिख रहा है, इसलिए इसमें सरकारी हस्तक्षेप आवश्यक हो जाता है। हमारे देश में भूमि के अनुपात में अत्याधिक लोग ठूंसे पड़े हैं। शीघ्र उपाय नहीं किए गए, तो एक और महामारी को हम न्योता देंगे।
(यह लेखक के निजी विचार हैं)