बिहार सरकार अब विश्वविद्यालयों से ग्रेजुएशन की पढ़ाई अलग करने जा रही है। इसके लिए विधानमंडल के इसी मानसून सत्र में एक नया विधेयक लाया जाएगा। इसके तहत सूबे के 481 सरकारी डिग्री कॉलेज अब सीधे उच्च शिक्षा विभाग के प्रशासनिक नियंत्रण में काम करेंगे। यानी अब डिग्री कॉलेजों को विश्वविद्यालयों के प्रशासनिक नियंत्रण से पूरी तरह मुक्त कर दिया जाएगा। यही नहीं, अब कॉलेज के शिक्षकों को किसी भी प्रकार की राजनीतिक गतिविधि में भाग लेने या किसी राजनीतिक विचारधारा का सार्वजनिक समर्थन, प्रचार अथवा लेखन करने पर पूरी तरह रोक रहेगी। यानी अब प्रोफेसर नेतागीरी नहीं कर पायेंगे। बताया गया कि नया विधायक अमल में आने के बाद विश्वविद्यालयों में केवल पीजी और विवि प्रशासन का काम रह जाएगा।
नेट पास को सीधे मिलेगी नौकरी
खबर है कि मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के नेतृत्व वाली राज्य सरकार आगामी विधानमंडल के मानसून सत्र में ‘बिहार उच्च शिक्षा विधेयक 2026’ पेश करने जा रही है। इस विधेयक के जरिये राज्य सरकार कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में वैचारिक गुटबाजी और राजनीतिक दखल को जड़ से खत्म करने के लिए बेहद सख्त प्रावधान ला रही है। नए विधेयक के पास होने के बाद न केवल डिग्री कॉलेज विश्वविद्यालयों के नियंत्रण से पूरी तरह मुक्त हो जाएंगे, बल्कि कॉलेज के प्रोफेसरों के चुनाव लड़ने, किसी राजनीतिक विचारधारा का प्रचार करने और यहां तक कि उसके समर्थन में लिखने पर भी पूरी तरह रोक लग जाएगी।
सरकार ला रही नया विधेयक
साथ ही कॉलेजों में वर्षों से खाली पड़े पदों को भरने के लिए भर्ती नियमों में भी एक ऐतिहासिक ढील दी जाने वाली है।
डिग्री कॉलेजों में असिस्टेंट प्रोफेसर पद पर नियुक्ति के लिए अब न्यूनतम योग्यता नेट (NET) के साथ पीजी डिग्री प्रस्तावित की गई है। नए नियमों के तहत अब इस पद के लिए पीएचडी (PhD) की अनिवार्यता को हटाने का प्रस्ताव शामिल किया गया है। यदि यह विधेयक विधानमंडल से पारित हो जाता है तो विश्वविद्यालयों की जिम्मेदारी मुख्य रूप से स्नातकोत्तर (पीजी) शिक्षा, शोध और अकादमिक गतिविधियों तक सीमित हो जाएगी। वहीं स्नातक (यूजी) स्तर की पढ़ाई कराने वाले कॉलेजों का प्रशासन, नियुक्तियां और संचालन सीधे राज्य सरकार के नियंत्रण में होगा।