बिहार में विपक्षी एकता महागठबंधन के नाम पर तो उपर से ठोस नजर आती है, लेकिन अंदर खाने तगड़ी खींचतान बनी हुई है। इसकी स्पष्ट झलक बीते दिन SIR और मुख्य चुनाव आयुक्त CEC के विरोध में आयोजित विपक्ष के लोकभवन मार्च के दौरान साफ दिखा। बिहार में महागठबंधन के मुख्य घटक दल राजद ने बिहार प्रदेश कांग्रेस को इस मार्च में साफ इग्नोर कर दिया। विपक्ष के इस मार्च में निर्धारित समय पर कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष राजेश राम के नेतृत्व में सैंकड़ों कार्यकता और नेता पटना स्थित शहीद स्मारक पहुंचे। लेकिन जब लोकभवन जाकर विपक्षी महागठबंधन की तरफ से राज्यपाल को ज्ञापन सौंपने गए प्रतिनिधिमंडल में उन्होंने कांग्रेसी नेताओं को शामिल नहीं किया। पहले से तय समय से आधा घंटा पहले ही तेजस्वी यादव के नेतृत्व विपक्षी महागठबंधन के नेता लोकभवन चले गए, जबकि कांग्रेस के नेता केवल अपने बुलाए जाने का इंतजार करते रह गए।

यह कोई पहली बार नहीं है, जब महागठबंधन के बैनर तले राजद ने कांग्रेस को खुलेआम बिहार में उसकी औकात बता दी हो। अगर इसी साल 2026 की बात करें तो पिछले सितंबर माह में ही राजद ने कांग्रेस को एक के बाद एक, कई झटके दिये हैं। अभी वर्तमान में बिहार में हो रहे MLC चुनाव में राजद ने कांग्रेस को बिना बताए ही अपनी पार्टी के 6 प्रत्याशी उतार दिए हैं। इतना ही नहीं कांग्रेस को राजद ने तब एक और झटका दिया जब तेजस्वी की पार्टी ने कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष और मौजूदा MLC मदन मोहन झा के खिलाफ भी उम्मीदवार उतार दिया। इसके बाद अब कांग्रेस को राजद ने तब एक और तगड़ा झटका दिया, जब उसने महागठबंधन के लोकभवन मार्च में कांग्रेस को अकेला छोड़ दिया और बाकी गठबंधन साथियों के साथ राजभवन जाकर राज्यपाल को ज्ञापन सौंप दिया।
दरअसल, कांग्रेस के साथ सबसे बड़ा मजाक तो ये है कि कहने को तो यह एक राष्ट्रीय पार्टी है, लेकिन बिहार में किसी सर्वमान्य और करिश्माई नेता के न होने से इसे राजद जैसी क्षेत्रीय पार्टी की बैशाखी पर निर्भर होना पड़ता है। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि जब तक कांग्रेस बिहार में अकेले दम पर जीरो से स्टार्ट नहीं लेगी, तब तक यही स्थिति बनी रहेगी। यही कारण है कि पुराने कांग्रेसी अब अपनी ही पार्टी से सवाल पूछने लगे हैं कि राजद से गठबंधन करने के बाद कांग्रेस को आखिर क्या फायदा हुआ है। अपने सवाल के सपोर्ट में वे लालू काल की 23 सीटों से शुरू करके तेजस्वी के काल में 19 और फिर अब 6 विधानसभा सीटों पर मिली पार्टी को विजय का उदाहरण भी सामने रख देते हैं। ऐसे में उनका एक ही कहना है कि राजद से कांग्रेस को फायदा नहीं, नुकसान अधिक हुआ। राजनीति विश्लोषक भी कहते हैं कि बिहार में अगर कांग्रेस अकेले चले और शून्य से भी स्टार्ट ले तो जहां उनका संगठन मजबूत होता जाएगा, वहीं पुराने समर्थक, दलित और अल्पसंख्यक भी जुड़ेंगे और पार्टी कुछ वर्षों के संघर्ष के बाद कुछ तो खड़ा हो ही जाएगी।
