प्रतिवर्ष 11 जुलाई को विश्व जनसंख्या दिवस मनाया जाता है। इसका उद्देश्य केवल “जनसंख्या बढ़ रही है” का रोना रोना नहीं, बल्कि ये समझना है कि जनसंख्या का ढांचा कैसे बदल रहा है और उसके हिसाब से देश को कैसे तैयार करना है। नमूना पंजीकरण प्रणाली SRS-2024 की रिपोर्ट और संयुक्त राष्ट्र के विश्व जनसंख्या संदर्भ— 2024 के आंकड़े बताते हैं कि भारत एक बहुत बड़े मोड़ पर खड़ा है।
आंकड़े क्या कह रहे हैं?
1. प्रजनन दर 2.1 से नीचे: SRS 2024 के अनुसार भारत की कुल प्रजनन दर TFR अब 1.9 रह गई है। 2.1 को “Replacement Level” कहते हैं। यानी हर महिला औसतन 2.1 बच्चे पैदा करे तभी जनसंख्या स्थिर रहती है। हम अब उससे भी नीचे आ गए हैं।
2. जनसंख्या का पीक: UN के अनुसार भारत की जनसंख्या 2060 के आसपास 170 करोड़ पर पीक करेगी। इसके बाद धीरे-धीरे गिरावट शुरू होगी। सदी के अंत यानी 2100 तक हम लगभग 150 करोड़ के साथ नई सदी में प्रवेश करेंगे।
3. बुजुर्गों की बाढ़: आज 70 साल से ऊपर के बुजुर्गों की संख्या 5% से भी कम है। NITI Aayog की रिपोर्ट कहती है 2100 तक ये बढ़कर 30% हो जाएगी। यानी हर तीसरा भारतीय बुजुर्ग होगा। “जनसंख्या विस्फोट” का डर अब खत्म हो रहा है। पर उसकी जगह 5 नई और गहरी चुनौतियां खड़ी हो रही हैं:
क. बुढ़ापे का भारत: सहारे की अर्थव्यवस्था
आज भारत को विश्व का सबसे युवा देशों में गिना जाता है। देश की लगभग 65 प्रतिशत आबादी 35 वर्ष से कम आयु की है। किंतु यह स्थिति स्थायी नहीं रहने वाली। वर्तमान में 70 वर्ष से अधिक आयु के नागरिकों की हिस्सेदारी कुल जनसंख्या में 5 प्रतिशत से भी कम है, लेकिन विभिन्न जनसांख्यिकीय अनुमानों के अनुसार सदी के अंत तक यह अनुपात 25 से 30 प्रतिशत तक पहुँच सकता है।
जापान, दक्षिण कोरिया और अनेक यूरोपीय देशों के अनुभव बताते हैं कि वृद्ध समाज की तैयारी समय रहते नहीं की जाए तो आर्थिक विकास की गति भी प्रभावित होती है। भारत के पास अभी तैयारी का समय है, लेकिन यह समय बहुत लंबा नहीं है।
जब 30% आबादी 70+ की हो जाएगी तो भारत की सबसे बड़ी इंडस्ट्री “देखभाल” बन जाएगी। आंकड़े कहते हैं कि WHO के अनुसार 2024 में भारत में 1 लाख बुजुर्गों पर सिर्फ 3 जेरियाट्रिक डॉक्टर हैं। नर्सिंग होम, होम केयर, फिजियोथेरेपी, एल्डरली डे-केयर – इन सबकी मांग 10 गुना बढ़ेगी।
आज का पेंशन सिस्टम, हेल्थ इंश्योरेंस और घर सब “युवा परिवार” के लिए बने हैं। बुजुर्गों के लिए अकेले रहने लायक घर, व्हीलचेयर फ्रेंडली सड़क, सस्ती दवा की व्यवस्था नहीं है।
इसी से सेवा क्षेत्र में करोड़ों नई नौकरियां आएंगी। जापान और जर्मनी की तरह “सिल्वर इकोनॉमी” भारत का भविष्य है। पर उसके लिए अभी से कानून, ट्रेनिंग और टैक्स नीति बनानी होगी।सबसे बड़ा सवाल: छोटा परिवार सुखी परिवार के नारे के बाद जो बच्चे शहर चले गए, वो बूढ़े माता-पिता का सहारा कैसे बनेंगे?
ख. पार्किंग से लेकर ट्रैफिक तक: समृद्धि की मार, वाहन विस्फोट
जनसंख्या वृद्धि की गति कम होने का अर्थ यह नहीं कि संसाधनों पर दबाव भी कम हो जाएगा। बढ़ती आय, शहरीकरण और उपभोक्तावाद के कारण वाहनों की संख्या तेजी से बढ़ती रहेगी।
सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार पिछले दो दशकों में देश में पंजीकृत वाहनों की संख्या कई गुना बढ़ चुकी है। आने वाले वर्षों में यह वृद्धि और तेज हो सकती है। परिणामस्वरूप पार्किंग भारत के सबसे बड़े शहरी संकटों में से एक बनने जा रही है।
आज महानगरों से लेकर छोटे शहरों तक अवैध पार्किंग, सड़क अतिक्रमण, ट्रैफिक जाम और पार्किंग विवाद सामान्य बात हो गई है। कई स्थानों पर पार्किंग को लेकर मारपीट, गंभीर हिंसा और हत्या तक की घटनाएँ सामने आती हैं। इस विषय पर फिल्में और वेब सीरीज़ तक बन चुकी हैं।
दुर्भाग्य से भारत में पार्किंग को अभी भी शहरी नियोजन का केंद्रीय विषय नहीं माना जाता। अधिकांश भवनों का निर्माण पर्याप्त पार्किंग व्यवस्था के बिना हो रहा है। केंद्र और राज्य सरकारों को संयुक्त रूप से एक राष्ट्रीय पार्किंग नीति बनानी चाहिए, जिसमें भवन निर्माण मानकों, बहुस्तरीय पार्किंग, सार्वजनिक परिवहन और स्मार्ट पार्किंग प्रणालियों को एकीकृत रूप से शामिल किया जाए।
जनसंख्या स्थिर होगी, पर समृद्धि बढ़ेगी। NCAER की रिपोर्ट कहती है 2047 तक भारत की प्रति व्यक्ति आय 4 गुना बढ़ेगी।
आज भारत में हर 1000 लोगों पर 22 कार हैं। अमेरिका में 800 हैं। 2050 तक भारत में ये आंकड़ा 200 के पार जाएगा। यानी गाड़ियां 10 गुना। हम घर, ऑफिस और मॉल बनाते समय पार्किंग को “बाद में देखेंगे” बोल देते हैं। नतीजा, रोज मारपीट, FIR और हत्या तक। मुंबई, चेन्नई, दिल्ली, पटना हर जगह यही कहानी है। हाल में बनी फिल्में भी इसी पर हैं।
समाधान: केंद्र सरकार को राष्ट्रीय पार्किंग निति को अनिवार्य करना होगा। हर नए भवन में “1 फ्लैट = 1 पार्किंग” का नियम। सड़क किनारे पार्किंग पर भारी जुर्माना। जापान की तरह “पहले पार्किंग साबित करो, फिर गाड़ी खरीदो” वाला नियम लाना पड़ेगा। वरना 170 करोड़ की आबादी सड़क पर ही फंसी रह जाएगी।
ग. स्लम का भारत: विकास का छिपा हुआ संकट
शहर विस्तार के नाम पर देशभर में स्लमीकरण हो रहा है—सरेआम, चहुँओर और प्रशासन की आँखों के सामने। भारत का लगभग हर बढ़ता शहर इस समस्या का उदाहरण प्रस्तुत कर रहा है। नई कॉलोनियाँ बनती हैं, किंतु उनके साथ पर्याप्त जल निकासी, हरित क्षेत्र, सार्वजनिक परिवहन, विद्यालय और स्वास्थ्य सुविधाएँ नहीं जुड़ पातीं।
सरकारें विभिन्न योजनाओं के माध्यम से आवास निर्माण का प्रयास कर रही हैं, लेकिन अभी भी एक समग्र और दूरगामी शहरी ब्लूप्रिंट का अभाव दिखाई देता है। केवल मकान बनाना पर्याप्त नहीं है; रहने योग्य, टिकाऊ और मानवीय शहर बनाना उससे कहीं बड़ी चुनौती है।
जनसंख्या स्थिर होने के बाद भी शहरों की तरफ पलायन रुकेगा नहीं। 2011 की जनगणना में भारत की शहरी आबादी 31% थी। UN का अनुमान है 2050 तक ये 50% यानी 85 करोड़ हो जाएगी।
हम शहर “बनाते” नहीं, शहर “हो जाते” हैं। नतीजा स्लम। भारत के 6 बड़े महानगरों में 40% लोग स्लम या स्लम जैसी बस्तियों में रहते हैं। पानी, सीवर, बिजली का कोई प्लान नहीं। सरकार के पास स्मार्ट सिटी तो है, पर स्मार्ट स्लम या प्लान्ड नगरीकरण का ब्लूप्रिंट नहीं है। जरूरत है “10 साल का शहरी मास्टर प्लान” की। जिसमें हर 5 लाख की आबादी पर अस्पताल, स्कूल, पार्क और ट्रांसपोर्ट पहले से तय हो। टुकड़ों में ‘प्रधानमंत्री आवास योजना’ ऊंट के मुंह में जीरा है।
यदि आने वाले दशकों में शहरों का नियोजन वैज्ञानिक आधार पर नहीं किया गया तो जनसंख्या स्थिर होने के बावजूद शहरी जीवन की गुणवत्ता निरंतर गिरती जाएगी।
घ. कृषि योग्य जमीन बचाएं: SAZ की जरूरत
जनसंख्या भले स्थिर हो, पर पेट तो सबका भरेगा। और पेट भरने के लिए जमीन चाहिए। 1960 से 2020 के बीच भारत ने 3 करोड़ हेक्टेयर कृषि भूमि खो दी है। हर साल 30 हजार हेक्टेयर जमीन कंक्रीट में बदल रही है। ICAR की रिपोर्ट कहती है 2050 तक हमें 33% ज्यादा अनाज चाहिए होगा।
हरित क्रांति ने भारत को खाद्यान्न के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाया, किंतु इसके कुछ दुष्परिणाम भी सामने आए हैं— मृदा की उर्वरता में कमी, भूजल का अत्यधिक दोहन और रासायनिक निर्भरता उनमें प्रमुख हैं।
इसी कारण आज देश के अनेक हिस्सों में प्राकृतिक खेती, जैविक खेती और टिकाऊ कृषि पद्धतियों की ओर लौटने का प्रयास हो रहा है। लेकिन इसकी पहली और सबसे अनिवार्य शर्त है— कृषि योग्य भूमि का संरक्षण।
दुर्भाग्य से उपजाऊ कृषि भूमि पर तेजी से कंक्रीट का विस्तार हो रहा है। औद्योगिक परियोजनाएँ, आवासीय कॉलोनियाँ और वाणिज्यिक निर्माण खेती योग्य भूमि को लगातार कम कर रहे हैं।
जिस प्रकार उद्योगों के लिए स्पेशल इकॉनमिक ज़ोन (SEZ) बनाए गए, उसी प्रकार कृषि भूमि की सुरक्षा के लिए स्पेशल एग्रो ज़ोन (SAZ) बनाए जाने चाहिए। इन क्षेत्रों में कृषि भूमि के गैर-कृषि उपयोग पर कठोर नियंत्रण हो तथा किसानों को टिकाऊ खेती के लिए प्रोत्साहन मिले।
ड. मानसिकता बदलें: “शहर ही विकास” का झूठ
1990 के बाद आर्थिक उदारीकरण के दौर में कुछ सामाजिक धारणाएँ व्यापक रूप से स्थापित हुईं—“शहर में रहना ही बेहतर है”, “बच्चों का बाहर जाकर बस जाना ही सफलता है” और “छोटा परिवार ही सुखी परिवार है”।
इनमें से कुछ धारणाओं के सकारात्मक पक्ष अवश्य हैं, किंतु इन्हें अंतिम सत्य मान लेना उचित नहीं होगा। इन तीनों का नतीजा आज सामने है। गांव खाली, शहर जाम और घर में बूढ़े अकेले। सामाजिक न्याय एवं आधिकारिता मंत्रालय की रिपोर्ट कहती है भारत में 70% बुजुर्ग अकेले रहते हैं या सिर्फ पति-पत्नी। “ओल्ड एज होम” की संख्या 2010 से 2024 तक 3 गुना बढ़ी है। जब 30% आबादी बुजुर्ग होगी तो “बच्चे बाहर चले गए” वाला मॉडल फेल हो जाएगा। हमें “गांव में रोजगार + शहर जैसी सुविधा” का मॉडल बनाना होगा।
शिक्षा और सरकारी नौकरी में “गृह जनपद” को प्राथमिकता। हर जिले में IT पार्क, हेल्थ सेंटर। और सबसे जरूरी – परिवार को फिर से आर्थिक इकाई बनाना। टैक्स में छूट, हाउसिंग लोन में छूट उनको मिले जो माता-पिता के साथ रहते हैं।
जब वृद्ध आबादी का अनुपात बढ़ेगा, तब परिवार और समुदाय की भूमिका पुनः महत्त्वपूर्ण हो जाएगी। यदि युवा पीढ़ी बड़े पैमाने पर अपने मूल स्थानों से दूर बसती रहेगी और परिवार लगातार छोटे होते जाएँगे, तो लाखों बुजुर्ग अकेलेपन, असुरक्षा और देखभाल के संकट का सामना कर सकते हैं।
भारत की पारंपरिक संयुक्त पारिवारिक व्यवस्था ने सदियों तक सामाजिक सुरक्षा का कार्य किया है। आधुनिकता और परंपरा के बीच संतुलन स्थापित करना भविष्य की बड़ी आवश्यकता होगी।
…और अंत में
SRS—2024 के आंकड़े राहत देते हैं कि भारत में “जनसंख्या बम” नहीं फूटेगा। पर ये राहत धोखा भी है।2060 का भारत 170 करोड़ का होगा, पर उसमें 50 करोड़ बुजुर्ग होंगे। 85 करोड़ लोग शहर में रहेंगे और हर घर के पास 2 गाड़ियां होंगी। अगर आज से तैयारी नहीं की तो ये “जनांकिकीय लाभांश” “जनसांख्यिकीय आपदा” बन जाएगा। जरूरत है एक ”राष्ट्रीय जनसांख्यिकीय तैयारी मिशन” की, जिसमें स्वास्थ्य, शहरीकरण, कृषि और सामाजिक नीति एक साथ काम करें।विश्व जनसंख्या दिवस पर संकल्प लें: जनसंख्या को नियंत्रित करना ही लक्ष्य नहीं था। लक्ष्य था सम्मानजनक जीवन। और वो तभी मिलेगा जब हम आंकड़ों से डरने के बजाय, आंकड़ों के हिसाब से देश बनाएंगे।
विश्व जनसंख्या दिवस हमें केवल जनसंख्या की संख्या पर नहीं, बल्कि उसकी संरचना पर भी विचार करने का अवसर देता है। भारत अब जनसंख्या विस्फोट के भय से आगे निकलकर जनसंख्या परिवर्तन के युग में प्रवेश कर रहा है।
आने वाले दशकों में वृद्ध होती आबादी, शहरी आवासन, पार्किंग संकट, कृषि भूमि संरक्षण, सामाजिक सुरक्षा और पारिवारिक संरचनाओं में परिवर्तन जैसे मुद्दे राष्ट्रीय नीति के केंद्र में होंगे। यदि आज से ही इन चुनौतियों के समाधान की दिशा में गंभीर तैयारी शुरू की जाए तो भारत अपनी जनसांख्यिकीय यात्रा को एक अवसर में बदल सकता है। अन्यथा जनसंख्या स्थिरता के बाद उत्पन्न होने वाली समस्याएँ जनसंख्या विस्फोट से कम गंभीर नहीं होंगी।
इसलिए विश्व जनसंख्या दिवस पर केवल यह पूछना पर्याप्त नहीं कि भारत में कितने लोग हैं; अधिक महत्त्वपूर्ण प्रश्न यह है कि आने वाले भारत में वे लोग कहाँ रहेंगे, कैसे रहेंगे और उनकी देखभाल कौन करेगा।