देश को आज़ाद हुए 80 साल हो गए। संविधान उस समय की परिस्थिति और समय की माँग को देखकर बनाया गया था। पुरानी व्यवस्था के व्यवस्थापक, यानी राजा-महाराजाओं को नियंत्रण में रखने के लिए नए जनप्रतिनिधियों और उनके अधीनस्थ कर्मचारियों को विशेष अधिकार दिए गए। यह उस समय सही था। जवाहरलाल नेहरू देश के विकास के लिए दक्षिणपंथ, वामपंथ, समाजवाद-सबका साथ और सबके विकास के सिद्धांत पर चले। उसके बाद लाल बहादुर शास्त्री आए, उनका कार्यकाल छोटा और सादगी भरा था।
हिंदुस्तान की राजनीति में इसके बाद जननेता राजनेता बन गए और एक राज परिवार स्थापित हुआ, जो नेहरू-गांधी राजवंश के नाम से स्थापित हुआ। इंदिरा गांधी ने उसकी नींव डाली। इंदिरा ने अपनी निजी लोकप्रियता के लिए निजी क्षेत्र के व्यवसाय, जमीन, माइंस आदि पर अपने कांग्रेस के राजनेताओं और अफसरों के द्वारा पुराने इज्जतदार लोगों की संपत्ति और व्यापार पर राष्ट्रीयकरण के नाम पर कब्जा करना शुरू कर दिया। तब से नेहरू-गांधी का जनतंत्र भ्रष्ट तंत्र में बदलने लगा।
स्थापित बैंकर, बड़े किसान, छोटे जमींदार, पुराने सम्मानित परिवारों को सरकारी कानूनों से बचने के लिए राजनेताओं और सरकारी कर्मचारियों को सुविधा शुल्क देना पड़ा। यहीं से काले धन और भ्रष्ट तंत्र की शुरुआत हुई। देश की जनता को बाँटने के नाम पर सब कुछ अपनी पार्टी के राजनेताओं और अपने अधीनस्थ अधिकारियों के बीच बाँट दिया गया। उसके बाद देश के सबसे सम्मानित परिवारों, राजघरानों के प्रिवी पर्स और हाइनेस की उपाधि खत्म की गई, जो कि उन्हें हिंदुस्तान में विलय के समय पेंशन के तौर पर दी गई थी।
अब सवाल यह है कि जब मालिक ही गरीब है, तो नौकर को मालिक से ज्यादा सुविधा क्यों? जिस दिन ‘वन नेशन वन फैसिलिटी’ लागू होगा, जिस दिन जनसेवक और सरकारी कर्मचारी को उसके मालिक यानी जनता से कम सुविधा मिलेगी, उसी दिन आरक्षण की मारामारी और भ्रष्टाचार दोनों खत्म हो जाएँगे।
