‘चराचर संवेदी एकात्मकता: भारतीय जीवन-दर्शन’ जैसे विषय पर व्यापक विमर्श क्यों? इसी प्रश्न के साथ हम में आयोजित अखिल भारतीय दर्शन परिषद के 70 वें अधिवेशन में हुए सघन तत्व मीमांशा को समझने का प्रयास करें। इस शीर्षक में भारत की सौम्य शक्ति और ज्ञान परंपरा का सूत्र निहीत है।
चर यानी मनुष्य, पशु-पक्षी, कीड़े-मकोड़े, और सभी जीवित प्राणी जो गति करते हैं। वहीं अचर यानी पेड़-पौधे, पहाड़, नदियां, और सभी स्थिर वस्तुएं जिन्हे भारतीय दर्शन जीवंत मानता है। परब्रह्म ही चराचर जगत में व्याप्त हैं और सबको एकसूत्र में पिरोकर उन्हें धारण करता है। यत् पिण्डे तत् ब्रह्मांडे सूत्र के माध्यम से इस व्यापक विचार को भारतीय दर्शन व्यक्त करता है। यही दर्शन मानव को सबके अस्तित्व का बोंध कराता है, उनके प्रति एक भावनात्मक रिश्ता भी स्थापित करता है। यह दर्शन जब मानव के मन-मस्तिष्क के माध्यम से व्यवहार में उतरता है तो पेड़-पौधे, पहाड़, नदियों एवं अन्य प्राणियों के साथ हमारा एक जीवंत रिश्ता बन जाता है। यही सतत विकास का मूल मंत्र है जिस पर आधुनिक विश्व विचार मंथन कर रहा है।
वैश्विक स्तर पर स्पिनोजा का प्रकृतिवादी अंतर्सबद्धता, सापेक्षता सिद्धान्त, पारिस्थितिकी को वैज्ञानिक और दार्शनिक आधार प्रदान करने के प्रयत्न होते रहे हैं। अखिल भारतीय दर्शन परिषद् का 70वां राष्ट्रीय अधिवेशन ने इस चराचर संवेदी एकात्मकता की अवधारणा को मात्र आध्यात्मिक धारणा के रूप में व्याख्यायित करने का प्रयास नहीं किया बल्कि समकालीन नैतिक और पर्यावरणीय संकटों के समाधान के लिए व्यापक विमर्श का फलक भी तैयार किया है।
मानव सभ्यता के समक्ष अस्तित्व संकट है। जलवायु परिवर्तन, जैव-विविधता का ह्रास, युद्ध, उपभोक्तावाद, पांथिक-कट्टरता और मानसिक विखंडन। इन संकटों के मूल में चर और अचर के मध्य कृत्रिम विभाजन है। आधुनिक सभ्यता ने प्रकृति को ‘संसाधन’ के रूप में देखा और मानव उसका उपभोक्ता बन बैठा। भारतीय चिन्तन ने इसे ‘स्व’ का विस्तार माना। इस कृत्रिम विभाजन को अस्वीकार करते हुए भारतीय जीवन दर्शन यह स्वीकार करता है कि समस्त अस्तित्व एक ही मूल चेतना, ऊर्जा या तत्त्व का प्रतिफल है।
संपूर्ण भारतीय चिन्तन इस एकात्मकता को व्याख्यायित करते हुए जब उद्घोष करता है तब ‘एकं सद् विप्राः बहुधा वदन्ति’, वसुधैव कुटुम्बकम्, सर्वेभवन्तु सुखीनः जैसे सूत्र प्रकट होते है। इन सूत्रों के माध्यम से भारत का चिंतन दर्शन विविधता में निहित एकता का प्रतिवादन करने वाले तत्व के व्यावहारिक पक्षों से विश्व समुदाय का परिचय कराता है।

इस ज्ञान के आधार पर ऋग्वेद का पुरुषसूक्त समस्त सृष्टि को विराट पुरुष का अंग घोषित करता है। चंद्रमा को उस विराट पुरूष का मन तो सूर्य को उसका नेत्र बताते हुए एक ऐसे गूढ़ रहस्य को समझने का सूत्र प्रदान करता है जहां सम्पूर्ण विश्व को एक जैविक एकक के रूप में निरुपित किया गया है।
उपनिषदों के ‘ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगद’।, ‘तत्त्वमसि’ एवं ‘अहंब्रहमास्मि’ महावाक्यों द्वारा जीव और ब्रह्म की अभिन्नता प्रतिपादित है। इसके साथ ही अनियंत्रित भोग के कारण आने वाले गंभीर संकटों से सावधान किया गया है। वेद, वेदांत, उपनिषद और गीता जैसे ग्रंथों में मानव के समक्ष आने वाली सार्वकालिक और सार्वदेशिक संकटों से उबरने के सूत्र उपलब्ध हैं। लेकिन, काल के प्रभाव से प्रकृति में होने वाले परिवर्तनों से उत्पन्न परिस्थितियों का पूर्वानुमान व आंकलन करते हुए भारतीय मनीषा ने इनके भाष्य की परंपरा भी स्थापित की। शंकराचार्य, रामानुजाचार्य से लेकर सभी आचार्यो को भाष्यकार ही माना गया है। इस प्रकार भारत का चितन दर्शन किसी पुस्तक या विचार से बंधा हुआ जड़ बौद्धिकता या पांथिक कर्मकांड या मान्यता नहीं है। यह जड़ और चेतन दोनों का विज्ञान है जो काल के अनुसार स्वयं को गढ़ने-रचने का समर्थ्य रखता है। यह ज्ञान भी है और विज्ञान भी। इसमें नदी की तरह प्रवाह भी है।
इदं तु ते गुह्यतमं प्रवक्ष्याम्यनसूयवे।
ज्ञानं विज्ञानसहितं यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात् ।।
गीता के नौवें अध्याय का यह प्रथम श्लोक इस यांत्रिक युग में भी भारतीय चिंतन दर्शन की प्रासंगिकता को सिद्ध करता है। भारतीय चिंतन में जिस ‘चराचर संवेदी एकात्मकता’ का विकास हुआ, उसी के तत्व विश्व भर के दर्शन व सिद्धांतों में विविध रूपों में दिखाई देती है। वैश्विक धार्मिक परिप्रेक्ष्य में जब हम इस चिन्तनधारा ‘चराचर संवेदी एकात्मकता’ को देखते है तो पाते है कि ईसाई पथ में भी सृष्टि ईश्वर की रचना है और मानव उसका संरक्षक मात्र है। इस्लाम में तौहीद का सिद्धान्त ईश्वर की एकता को स्वीकार करता है तथा सृष्टि को उसकी अमानत मानता है। पश्चिमी दर्शन में स्पिनोजा का विचार भी ईश्वर और प्रकृति की एकात्मकता को अवधारणा के द्वारा इतिहास को वैश्विक चेतना की क्रमिक अभिव्यक्ति के रूप में व्यक्त करते है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण से जब हम चिन्तनधारा की प्रासंगिकता को देखते हैं तो यह स्पष्ट है कि अल्बर्ट आइंस्टीन द्वारा स्थापित सापेक्षता सिद्धान्त जिसमें स्थान और काल की एकीकृत निरंतरता का वर्णन करता है। क्वांटम एंटैगलमेंट यह सिद्ध मिलता है कि कण परस्पर दूर होते हुए भी एक-दूसरे से जुड़े रहते है। जेम्स एफ्रैम लवलॉक ने अपने गैया परिकल्पना में पृथ्वी को एक स्व.नियंत्रित जीवित तंत्र माना है।
भारतीय दर्शन की ज्ञान धाराएं मुख्यतः वेदों की प्रामाणिकता के आधार पर आस्तिक (षड्दर्शन) और नास्तिक (श्रमण) परंपराओं में विभाजित हैं। ये सभी मोक्ष, कर्म, और आत्म-साक्षात्कार पर केंद्रित हैं। ये दार्शनिक विचार आत्मज्ञान और संसार के दुखों से मुक्ति को जीवन का अंतिम लक्ष्य मानते हैं। परस्पर विरोध के बावजूद इनमें कटुता नहीं थी बल्कि एक-दूसरे को सम्मान देते थे। चार्वाक जैसे भौतिकवादी दार्शनिक को भी भारत में ऋषि माना गया है।
मानव सभ्यता आज जिस अलगाव व विखंडन के संकट से गुजर रही है। इसका मूल कारण मनुष्य का प्रकृति और अन्य जीवों से अलगाव है। अखिल भारतीय दर्शन परिषद् के 70वें राष्ट्रीय अधिवेशन की चिन्तनधारा- ‘चराचर संवेदी एकात्मकता: भारतीय जीवन दर्शन’’ इस अलगाव का दार्शनिक प्रतिवाद प्रस्तुत कर अपने व्यापक विमर्श के साथ भविष्य की सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक, राजनीतिक, नैतिक और पर्यावरणीय दृष्टि को एक वैचारिक नेतृत्व देने का प्रयास है।
(बातचीत पर आधारित)