गंगा, सरयू, गंडक यानी नारायण और सोन जैसे पवित्रतम नदियों से पोषित प्लावित व भारतीय ज्ञान परंपरा की आदि भूमि सारण की धरती पर बिहार के विश्वविद्यालयों के कुलाधिपति ने भारत और बिहार के समक्ष खड़े जिस भयंकर संकट की ओर संकेत किया है वह वास्तव में एक मानसिक और मायावी युद्ध है। इस युद्ध में हारने वाले देश की संस्कृति, प्रज्ञा और आत्मविश्वास को समाप्त कर उसे कीड़े की तरह रेंगने के लिए मजबूर किया जाता है। इसे खतरनाक नैरेटिव वार कहना अधिक उचित होगा। इस युद्ध को जितने के लिए सक्षम बौद्धिक सेना की आवश्यकता है।
पुराणों में कई कथाएं हैं जिसमें दानवों द्वारा मोहिनी अस्त्र के प्रयोग से जनसामान्य को अपने अधीन कर लेने और इसके बाद उनका अत्याचारपूर्ण शोषण करने का वर्णन मिलता है। वहीं रामायण में वनवासी श्रीराम द्वारा महर्षि विश्वामित्र से प्राप्त मोहिनी अस्त्र के प्रयोग का भी वर्णन मिलता है। श्रीराम ने रावण के क्षत्रप खर और दूषण की 14 हजार राक्षसांे वाली सेना पर उस मोहिनी अस्त्र का प्रयोग किया और सभी राक्षस एक-दूसरे पर प्रहार करने लगे। वे एक दूसरे को अपने शत्रु के रूप में देखने लगे और एक-दूसरे पर अस्त्रांे का प्रहार कर मरने-मारने लगे।
मानवता विरोधी वैश्विक बाजारवादी शक्तियां एकजुट होकर इसी मायावी युद्ध के माध्यम से पूरे विश्व को अपना गुलाम बनाने के लिए प्रयासरत है। साइबर क्रांति के इस युग में आभाषी माध्यम व उपकरणों के माध्यम से संचालित होने वाले इस युद्ध को संचालित करने वाली अदृश्य शक्ति की पहचान डीप स्टेट के रूप में किया गया है। इसने स्वयं को लोकतंत्र और मीडिया की स्वतंत्रता का रक्षक बताने वाले अमेरिका को ही आधार बनाकर यह शक्ति लोकतंत्र का समूल नाश कर अराजकतंत्र की स्थापना करने पर तुला है। लोकतांत्रिक देशों में उपयोग आने वाले संवैधानिक मूल्यों व प्रतिबद्धताओं का दुरूपयोग करते हुए वहां अराजक वातावरण बनाने का उनका खेल चरम पर है। इनका यह षड्यंत्रकारी चाल साम्यवादी तानशाही व मजहबी तानशाही शासन व्यवस्था वाले देशों में सफल नहीं हो पाती है क्योंकि वहां लोकतंत्र, संविधान और मानवाधिकार की दुहाई देकर कोई स्वयं को नहीं बचा सकता। लोकतांत्रिक मूल्य को जीने वाले देशों को ये आसानी से अपना चारा बना लेते है। नेपाल और बांग्लादेश इसके उदाहरण हैं।

लोकतंत्र और मीडिया की स्वतंत्रता के लिए अमेरिका अपने आपको पूरी दुनिया में सबसे बड़ा पैरोकार मानता है। लेकिन, मीडिया के माध्यम से दुनिया के अन्य लोकतांत्रिक देशों में अमेरिका से संचालित होने वाली आधुनिक सूचना तकनीक से संपन्न आर्थिक शंक्तियां कैसे अपना आधिपत्य स्थापित करती हैं, इसका दिलचस्प खुलासा अभी हाल ही में फ्रांस के समाचार पत्र मीडियापोर्ट ने किया है। इसने सनसनीखेज खुलासा किया है कि अमेरिकी सरकार मीडिया रिपोर्टों के ज़रिये पक्षपातपूर्ण खबरों को प्रकाशित करवाती है, जिससे दुनिया के कुछ विशेष देशों की लोकतांत्रिक सरकारों को अस्थिर किया जा सके।
अमेरिका से संचालित होने वाली ऑर्गेनाइज़्ड क्राइम एंड करप्शन रिपोर्टिंग प्रोजेक्ट द्वारा पूरे विश्व में शोध हो रहे हैं। अमेरिका की जो बाइडेन की अगुआई वाली डेमोक्रेटिक सरकार से इस प्रोजेक्ट को बहुत बड़ी वित्तीय मदद मिली है। इस पृष्ठभूमि के साथ जब भारत पर दृष्टि डालते हैं तो चौंकाने वाले तथ्य सामने आ जाते हैं। इसके द्वारा पिछले कुछ सालों में भारत के खिलाफ कई ऐसी रिपोर्ट प्रकाशित की गयी हैं, जिसे भारत की संस्कृति, संप्रभुता, लोकतंत्र और सामाजिक सद्भाव पर प्रहार माना जायेगा।
पश्चिमी बुद्धिजीवियों का मानना है कि वर्तमान में विश्व में दो विचारधाराओं के बीच संघर्ष है। इसमें एक तरफ लेफ्ट लिबरल विंग है तो दूसरी ओर राइट विंग की विचारधारा है। अमेरिका में लंबे समय तक लेफ्ट लिबरल के सत्ता में रहने से इस विचारधारा का वहां एक ईकोसिस्टम विकसित हुआ और यही ईकोसिस्टम अमेरिका का डीप स्टेट है, जिसकी जड़ें बहुत मजबूत हैं। इस डीप स्टेट में मीडिया, न्यायपालिका, सरकारी संस्था और व्यापार समूह का एक ऐसा गठजोड़ है, जो न सिर्फ अमेरिका में, बल्कि दुनिया के अन्य देशों में भी लेफ्ट लिबरल विचारधारा के लिए जमीन तैयार करने का काम करता है। इस डीप स्टेट को अमेरिका में जो बाइडेन की डेमोक्रेटिक सरकार का पूरा संरक्षण मिला। अमेरिका में रिपब्लिकन पार्टी के डोनाल्ड ट्रंप की जीत ने अमेरिका के लेफ्ट लिबरल ईकोसिस्टम के इस डीप स्टेट के चेहरे को बेनकाब कर दिया है।
अमेरिका का ऑर्गेनाइज़्ड क्राइम एंड करप्शन रिपोर्टिंग प्रोजेक्ट कहने को तो खोजी पत्रकारों की ऐसी संस्था है, जो विश्व के हर देश में मौजूद है। लेकिन, इसकी वास्तविकता कुछ और है। वास्तव मंे यह संगठन उच्च वेतनभोगी ऐसे बुद्धिजीवियों का जमावड़ा है जो स्वयं को खोजी पत्रकार कहते हैं लेकिन इनका काम निर्देशित नैरेटिव को गढ़ना और उसे सत्य जैसा विश्व समुदाय के समक्ष परोस देना होता है। इस संस्था को चलाने के लिए धन का एक बड़ा हिस्सा अमेरिकी सरकार से आता रहा है। वर्तमान में जॉर्ज सोरोस के ओपन सोसाइटी फाउंडेशन से इसे अकूत धन मिल रहा है।
ओसीसीआरपी ने पेगासस पर प्रकाशित अपनी एक रिपोर्ट में दावा किया था कि भारत सरकार पेगासस सॉफ्टवेयर के ज़रिये राजनीतिक विरोधियों और पत्रकारों की जासूसी कर रही है। लेकिन जब यह मामला भारत के सुप्रीम कोर्ट के सामने पहुंचा, तो सुप्रीम कोर्ट ने पेगासस के उस पूरी रिपोर्ट को बेबुनियाद करार दे दिया था। उस रिपोर्ट को आधार बनाकर ’द वॉशिंगटन पोस्ट’, ’न्यूयॉर्क टाइम्स’, ’द गार्डियन’ जैसे समाचारपत्रों में संपादकीय व विशेष रिपोर्ट प्रकाशित करा दिए गए थे। उन विदेशी अखबारों के रिपोर्ट को आधार बनाकर भारत में अराजक माहौल बनाने के प्रयास हुए थे।
डीपस्टेट से किसी न किसी तरीके भारी वितीय सहायता प्राप्त भारत के एनजीओ द्वारा सर्वोच्च न्यायालय में दायर जनहित याचिकाआंे की लंबी सूची है। इन जनहित याचिकाओं में अधिकांश उन प्रोजेक्ट से जुड़े होते हैं जिनका संबंध भारत के विकास से जुड़ा हुआ है। इनके काउंटर में जब भारत के विभिन्न संस्थाओं द्वारा अध्ययन रिपोर्ट और साक्ष्य प्रस्तुत किए जाने लगे तब कुछ माह से इसमें कमी देखी जा रही है। इसके साथ ही तथ्यहीन विदेशी संस्थाओं की रिपोर्ट को आधार बनाकर जनहित याचिका दायर करने वालों पर जब सर्वोच्च न्यायालय की भृकुटी तनने लगी तब इसमंे कमी आयी है।
वैसे तो अमेरिका और भारत के बीच राजनीतिक, व्यापारिक और सामरिक संबंध पिछले एक दशक से लगातार बेहतर ही हो रहे हैं लेकिन अमेरिका की संस्थाओं में मौजूद डीप स्टेट की हमेशा यही मंशा रहती है कि भारत में कमजोर सरकार बने जिसे कठपुतली की तरह नचाया जाता रहे। अमेरिका का यही डीप स्टेट लगातार प्रधानमंत्री मोदी और भारत के हितों के खिलाफ कुचक्र रचता है। इसके लिए यह इस्लामिक आतंकी संगठनों और वामपंथी आतंकवादियों से भी हाथ मिला लेता रहा है। भारत के युवाओं में अपने देश के प्रति विद्रोह व अपनी संस्कृति व संस्कार के प्रति घृणा का भाव भरने के लिए यहां के शिक्षण संस्थानों व कालेज-विश्वविद्यालय के परिसरों में भारी पैसे के बल पर कार्यक्रम चलवा रहा है। अमेरिकी डीप स्टेट की नीति भारत में एक तीर से कई निशानों को साधने की रही है। इसके निशाने पर भारत को विकसित देश बनाने का सपना देखने वालों के साथ ही यहां के सफल उद्यमी भी हैं। इसने भारत के उद्यमी गौतम अदाणी को अमेरिका में बदनाम करने का जो चाल चला वह भारत की बढ़ती शक्ति पर प्रहार है। फर्जी दस्तावेज के सहारे तैयार रिपोर्ट के आधार पर भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ख़लिाफ़ माहौल बनाने का जो प्रयास किया गया वह नैरेटिव वार का भारत विरोधी खतरनाक पक्ष है। आश्चर्य की बात यह है कि संसद में इस मुद्दे पर कांग्रेस हंगामा और विरोध कर रही थी वहीं उसी मुद्दे पर तेलंगाना में अपना बचाव करती नजर आ रही थी। इससे साफ है कि मानवता का सर्वनाश करने वाली डीप स्टेट की जड़ें भारत में गहरी फैली हुई है। इसका कोई अपना नहीं।

साइबर क्रांति के बाद भारत एक अजीब आभाषी विश्व के अधीन होता चला गया। 2000 के दशक के मध्य से लेकर 2010 के दशक के बीच जन्मंे बच्चे डिजिटल तकनीक को एक स्थापित अनिवार्य वस्तु के रूप में देखते हुए बड़े हुए। इनका मन, बुद्धि, विचार अपने पहले की पीढ़ी से बहुत अलग है। अपने लिए जरूरी सूचनाओं, मनोरंजन के लिए अब ये एनरॉयड फोन पर निर्भर करने लगे। फोन पर गूगल, व्हाटसेप, फेसबुक, इंस्टाग्राम जैसे प्लेटफार्म पर मिलने वाली सूचनाओं पर ये आंखमूंद कर विश्वास करने लगे। आभाषी माध्यम संगठन, मिलन व विचारों के आदान प्रदान के सहज, सुलभ और विश्वसनीय माध्यम बन गए। लेकिन, सारे डाटा एक स्थान पर संग्रहित भी होने लगे। ऐसी परिस्थिति का उपयोग डीप स्टेट अपने खतरनाक षड्यंत्र को सफल बनाने में कर रहा है। बांग्लादेश और नेपाल के भयानक आंदोलनों को जेन-जेड का आंदोलन कहते है। लेकिन, वास्तव में यह कंटेंट वार है जिसमें युवा और तरूणों का उपयोग अस्त्र के रूप में किया जाता है।
दरअसल, नई पीढ़ी यानी जेनरेशन जेड वह बच्चे हैं, जिनका जन्म 1997 से 2012 के बीच हुआ है। इस 15 साल के बीच जो बच्चे पैदा हुए है वे साइबर फ्रेंडली हैं। वर्ष 2025 तक यह पीढ़ी दुनिया की करीब 30 फीसदी कार्यबल बन चुकी है और अपनी अलग सोच और आदतों से समाज और अर्थव्यवस्था दोनों पर असर डाल रही है।
यह पीढ़ी इंटरनेट और सोशल मीडिया के युग में पली-बढ़ी है, जिसके कारण यह तकनीक-संपन्न तो है ही साथ ही नवाचार व आभाषी वातावरण में तैर रहीं सूचनाओं के प्रति अत्यंत जागरूक है। सामाजिक मुद्दों पर मानसिक व बौद्धिक रूप से बहुत अधिक सक्रिय है। ये जिलेनियल्स भी कहे जाते हैं। सहजता से यह पीढ़ी नए ऐप्स और ट्रेंड्स को बहुत तेजी से अपनाने और उसपर प्रतिक्रिया देने में सक्षम भी हैं।
मोबाइल इनका सबसे अधिक भरोसेमंद साथी है। डेस्कटॉप के बजाय मोबाइल पर ही ज्यादा काम करते हैं। सोशल मीडिया पर ही प्रोडक्ट खोजना और नए प्रोडक्ट्स के बारे में पूरी जानकारी लेना इनकी सामान्य आदत हो गयी है। इस प्रकार इनका जीवन साइबर तकनीक और आधुनिक उपकरणों के इर्द-गिर्द ही बीतता है। ऐसे में सोशल मीडिया के कंटेंट इन्हें बहुत तेजी से और गंभीरता से प्रभावित करते हैं। एकाकी जीवन होने के कारण भावनात्मक आवेग तर्क बुद्धि पर भारी पड़ने लगती है। ऐसे में वायरस की तरह तैर रहे कंटेंट की सत्यता और उपयोगिता के बारे में उचित निर्णय लेने की मानसिकत व बौद्धिक क्षमता का उपयोग नहीं होता है। ऐसे युवा बहुत जल्द किसी अंतिम निष्कर्ष पर पहुंच जाते हैं। इनको एक प्लेटफार्म पर लाकर किसी देश या प्रदेश में अराजक माहौल बनाने के प्रयोग चल रहे हैं। इसका उपचार बौद्धिक जागरूकता से ही संभव है।