छपरा विश्व प्रसिद्ध संत परमहंस दयाल जी महाराज की जन्मभूमि है। इनकी जन्मभूमि पर आयोजित अखिल भारतीय दर्शन परिषद के अधिवेशन में परमहंस दयाल जी द्वारा प्रतिपादित परमहंस अद्वैत दर्शन पर भी गहन विमर्श हुआ। इनके क्रियात्मक साधना पद्धति उससे होने वाले अनुभवों पर आधारित ब्रेन स्टार्मिंग विशेष सत्र का भी आयोजन किया गया।
संपूर्ण भारत सहित विदेशों में इनकी तप साधना और ज्ञान की चर्चा होती रही लेकिन छपरा के लोग उनसे अनजान बने हुए थे। जब उनके जन्म स्थान पर उनके अनुयायियों ने भव्य मंदिर का निर्माण करा दिया तब छपरा के लोगों ने जाना कि उनके शहर में महान आध्यात्मिक संत का जन्म हुआ था। उनके अनुयायियों ने परमहंस दयाल जी द्वारा प्रतिपादित ज्ञान, सेवा व प्रेम की साधना मार्ग के प्रचार प्रसार के लिए उनकी जन्मभूमि छपरा में भव्य ब्रह्मविद्या आश्रम की भी स्थापना कर दी है। इसके बावजूद छपरा के सामान्य लोग उनकी ज्ञान व साधना पद्धति से दूर ही रहे हैं। अधिवेशन में उनकी ज्ञान साधना के दार्शनिक व साधनात्मक पद्धति पर गहन विमर्श हुआ। स्थानीय अखबारों में इससे संबंधित खबरें भी प्रकाशित हुईं। इससे परमहंस दयाल जी के बारे में स्थानीय बुद्धिजीवियों में जिज्ञासा हुई है।

परमहंस दयाल, श्री श्री 108 स्वामी अद्वैतानन्द जी महाराज का जन्म बिहार प्रांत के छपरा नगर स्थित दहियावाँ ब्राह्मण टोली में चैत्र श्री रामनवमी के दिन सन् 1846 ई० को हुआ था। भगवान श्रीराम के प्राकट्य दिन को जन्म लेने के कारण उनका नाम ‘रामयाद’ रखा गया। उनके पितामह का नाम पंडित ख्यालीराम पाठक था। उनके पांडित्य की ख्याति संपूर्ण बिहार और उत्तर प्रदेश में थी। उनके पुत्र का नाम तुलसी पाठक थे। वे भी अपने पिता की तरह क्षेत्र के प्रसिद्ध कर्मकांडी थे। बहुत पूजा-पाठ के बाद तुलसी पाठक जी को एक पुत्र हुआ था जो आगे चलकर परमहंस दयाल स्वामी के नाम से देश-विदेश में प्रसिद्ध हुए थे। पुत्र के जन्म के आठ माह बाद ही उनकी धर्मपत्नी का देहांत हो गया। इस प्रकार नवजात रामयाद के लालनपालन की समस्या खड़ी हो गयी। संयोग से तुलसी पाठक के एक प्रिय यजमान लाला नरहर प्रसाद श्रीवास्तव के एक साल के पुत्र का देहांत हो गया। पुत्र शोक से राहत पाने के लिए लाला साहब ने नवजात रामयाद को तुलसी पाठक से मांग लिया और पुत्र की ही तरह उनका पालन-पोषण करने लगे। जब वे आठ साल के ही थे तो उनके पिता का भी देहांत हो गया। जब वे सोलह वर्ष के हुए तो उनका लालन-पालन करने वाले लाला नरहर प्रसाद श्रीवास्तव का भी देहांत हो गया। लाला साहब बालक रामयाद की शिक्षा की उतम व्यवस्था करायी थी। चार वर्ष की अवस्था में उनकी शिक्षा प्रारम्भ हुई। बहुत कम समय में ही वे हिन्दी-संस्कृत के साथ ही अरबी-फारसी के अच्छे ज्ञाता हो गए। इसके साथ ही बचपन से ही वे आध्यात्मिक संस्कारों से युक्त थे जिसके कारण वे सामान्य बच्चों से अलग थे। पांच वर्ष की उम्र में ही वे एक आसन पर ध्यानस्थ होकर घंटों बैठे रह जाते थे। श्री रामयाद के पिताजी ने काशाी स्थित केदार घाट पर निवास करने वाले संत परमहंसजी से ब्रह्मविद्या का उपदेश लिया था। बालक रामयाद की प्रतिभा व संस्कार से प्रभावित होकर परमहंस जी ने उन्हें भी ब्रह्मविद्या का उपदेश कर दिया था। इसी बीच पिता की तरह उनका लालन-पालन करने वाले लाला साहब का देहांत हो गया। इससे व्यथित रामयाद ने संन्यास का मार्ग अपनाना चाहा लेकिन परमहंस जी ने उन्हें उनकी पत्नी की देख-रेख व सेवा की सलाह दी। तीन वर्ष बाद जब उनकी पत्नी का दहांत हो गया तब वे फिर अपने गुरु के पास पहुंच गए। परमहंस जी ने उन्हें संन्यासी बनने का आदेश दे दिया।

काशी में रहकर कुछ दिनों तक साधना करने के बाद वे गंगा के किनारे चलते-चलते हरिद्वार पहुंच गए। हरिद्वार के बाद हिमालय में कुछ दिनों तक तप किया। इसके बाद वे घुमते-घुमते जयपुर पहुंच गए। जयपुर में संत आनंदपुरी के सानिध्य में लम्बे समय तक रहे। यहीं वे दयाल अद्वैतानंद जी महाराज कहे जाने लगे। इसके बाद वहां से फिर निकल पड़े और अखंड भारत के खैबर पख्तूनख्वाह प्रांत के कारक जिला स्थित टेरी पहुंचे। फिलहाल वह स्थान पाकिस्तान में है। वहां स्वामी जी ने कृष्ण युग के योग शक्ति ज्ञान से अनुयायियों का परिचय कराया। अंत में उन्होंने अपनी गद्दी परमशिष्य स्वरूपानंद जी महाराज को सौंपा और 10 जुलाई 1919 को समाधि ले ली। वहां के श्रद्धालुओं ने उनकी समाधी स्थल पर भव्य मंदिर का निर्माण करा दिया। मजहब के नाम पर जब भारत का विभाजन हुआ तब अलग पाकिस्तान देश बना। इसके बाद इस्लामिक चरमपंथियों ने उनकी समाधी स्थल पर बने मंदिर को क्षतिग्रस्त कर दिया। इसके बावजूद उनके प्रति श्रद्धा रखने वाले उनकी समाधी पर आते रहे। इनकी भक्ति और योग की शक्ति को पाकिस्तान के सुप्रीम कोर्ट ने भी स्वीकार किया था। कोर्ट ने 4 अप्रैल 2015 को अपने एक आदेश में पाकिस्तान के खैबर पख्तूनख्वाह प्रांत के कारक जिला के टेरी में चरमपंथियों द्वारा क्षतिग्रस्त उनकी समाधि पर बने मंदिर को प्रशासनिक देखरेख में पुनः निर्माण कराने का आदेश दिया था। इस आदेश के बाद भी पाकिस्तान सरकार ने संत के मंदिर निर्माण में रुचि नहीं दिखाई। यह मंदिर 1997 तक यथावत रहा। यहां गुरू परमहंस दयाल जी के पंथ के हजारों अनुयायी दर्शन व आशीर्वाद के लिए नियमित पहुंचते थे। उनके द्वारा प्रतिपादित पंथ को लोग परमहंस अद्वैत मत कहने लगे। वे आनंदपुर धाम के पहले गुरु थे। उत्तर भारत में आध्यात्मिक उत्थान के लिए उन्होंने कृष्ण द्वार आश्रम की स्थापना की और स्वामी स्वरूपानंद जी महाराज को दीक्षा दी। इस प्रकार श्री परमहंस दयाल जी महाराज इस पंथ के प्रथम गुरु हुए। इन्होंने प्रेम, भक्ति और सेवा का संदेश दिया। उनका दर्शन सादगी, आत्मानुभूति और निराकार ईश्वर में विश्वास पर आधारित है, जिसे उनके अनुयायी आगरा तपोभूमि और अन्य आश्रमों में अनुभव करते हैं। उनके जीवन दर्शन के मुख्य बिंदु स्वयं को जानना इसके बाद ईश्वर से जुड़ना है। अर्थात पहले आत्मज्ञान इसके बाद ब्रह्मज्ञान। अपने अनुभव व ज्ञान को उन्होंने पदों में संकलित किया।
जहँ देखो तहँ वही आतमा पिता पुत्र औ नाती। ब्राह्मण वैश्य शूद सब एही, नाममात्र बिलगाती ।।
यही देवता, यही देवालय, पुष्प धूप अरु वाती। पूजनवाली यही आतमा, यह ही आप पुजाती।।
अण्डज पिण्डज स्वेदज उद्भिज, सकलो एही जाती। कारण यही काज भी एही, यह सबको उकसाती।।
‘रामयाद’ विचार निर्भय हो, कासे करूँ संघाती।सच्चिदानन्द प्रकाश हुआ तब, सबहीं भरम नसाती।।