सम्राट चौधरी की सरकार ने बक्सर सेंट्रल जेल परिसर की चहारदीवारी से वामन जन्मभूमि को मुक्त कराकर भारत की परतंत्रता की प्रारंभिक लेकिन, कम चर्चित कलंक को भी मिटा दिया। परमात्मा ने यह असाधारण कार्य मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के हाथों से करवाया। इस प्रकार सम्राट चौधरी पर भगवान विष्णु के प्रथम मनुज अवतार वामन देव की विशेष कृपा मानी जा रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 2047 में विकसित भारत के संकल्प को सिद्ध करने में लगे हैं। यह संकल्प भारत के चेतन मन से ही संभव है। लोक के मन को चैतन्य बनाने वाले वामन देव हैं। उनकी जन्मभूमि की मर्यादा की पुनर्स्थापना का संकेत इससे जुड़ा है।

इतिहासकार भी यह मानते हैं कि 1764 के ऐतिहासिक बक्सर युद्ध के बाद ही संपूर्ण भारत अंग्रेजों के नियंत्रण में आ सका था, क्योंकि उस युद्ध में ईस्ट इंडिया कंपनी ने बंगाल के नवाब मीर कासिम, अवध के नवाब शुजाउद्दौला और दिल्ली के मुगल बादशाह शाह आलम द्वितीय की संयुक्त सेना को हरा दिया था।
इस जीत के बाद ईस्ट इंडिया कंपनी यानी अंग्रेजों ने बंगाल, उत्तर प्रदेश से लेकर दिल्ली तक राजस्व वसूली के लिए जनसामान्य को भयभीत कर अपने नियंत्रण में लेने के प्रयास शुरू कर दिए थे। ऐसे में वे किसी भी उत्सव व मेले की परंपरा को किसी भी कीमत पर समाप्त कर देने की रणनीति पर काम कर रहे थे। बक्सर में गंगा तट पर स्थित वामन जन्मभूमि पर भाद्र शुक्ल द्वादशी को यानी वामन द्वादशी को विराट मेला लगता था। बक्सर के वामन द्वादशी मेले को अंग्रेज अपने राजपाट के लिए खतरा मान बैठे। इसीलिए गंगा तट पर जिस बावन बीघे के विशाल भूखंड पर प्रत्येक वर्ष विशाल मेला लगता था उसे अंग्रेजों ने सबसे पहले अपने कब्जे में ले लिया। वहां चहारदीवारी खड़ी कर दी गयी। विशाल माल गोदाम का निर्माण करा दिया गया जहां से अफीम और अन्य उत्पाद नदी मार्ग से समुद्र तक भेजे जाते थे।


तब स्थानीय लोगों ने वामन जन्मभूमि पर गोदाम निर्माण का भारी विरोध किया था। अंग्रेजों की फौज ने उस जनविरोध को तत्काल दबा दिया। लेकिन, यह विरोध आगे भी जारी रहा। ब्रिटिश सरकार के भारत के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम से जुड़े दस्तावेजों में बक्सर के वामन जन्मभूमि की मुक्ति को लेकर स्थानीय लोगों के प्रतिरोध का भी जिक्र है। गंगा तट पर निवास करने वाले सभी जाति के लोग जो वामन देव को अपना आराध्य मानते थे, वे 1857 की लड़ाई में बाबू कुंअर सिंह के नेतृत्व में अंग्रेजों को भागाने की लड़ाई में शामिल हो गए थे।
ईस्ट इंडिया कंपनी के शासन को समाप्त करने व फिरंगियों को भारत से खदेड़ने के लिए हुए 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के बाद यूनाइटेड किंगडम की संसद ने 2 अगस्त 1858 को एक अधिनियम पारित कर भारत पर शासन का अधिकार ब्रिटिश क्राउन को हस्तांतरित कर दिया। इसके बाद 1880 में ब्रिटिश सरकार ने गंगा तट पर स्थित वामन जन्मभूमि के 52 बीघे के भूखंड पर विद्रोहियों व अन्य अपराध के आरोप में बंदी बनाए गए लोगों को कैद करने के उद्देश्य से बक्सर सेंट्रल जेल की स्थापना की। उस 52 बीघे में वामन भगवान की स्मृतियों से जुड़ा एक विशाल वामन तालाब भी था। बाद में बक्सर सेंट्रल जेल में पूरे भारत में मृत्यु दंड की सजा प्राप्त कैदियों के लिए फांसी का फंदा बनाया जाने लगा। कई स्वतंत्रता सेनानियों को भी बक्सर जेल में बने रस्सी के फंदे से फांसी दी गयी।

कुछ भारतीय अधिकारियों ने महारानी विक्टोरिया द्वारा 1 नवंबर 1858 को जारी की गई ‘भारत के राजाओं, राजकुमारों, सरदारों, नवाबों और जनता’ के लिए घोषणा को आधार बनाते हुए कहा कि वामन भगवान की जन्मभूमि की स्मृतियों को नष्ट किया जाना उस घोषणा के विपरीत और भारत के लोगों के साथ धोखा माना जाएगा।
उस घोषणा में कहा गया था कि ‘हम अपने भारतीय क्षेत्रों के मूल निवासियों के प्रति उसी कर्तव्यबद्धता का पालन करते हैं, जिस कर्तव्य का पालन हम अपने अन्य सभी प्रजा के प्रति करते हैं।’ उसी आधार पर वामन भगवान के धार्मिक महत्व व उनसे जुड़ी जनभावना से अंग्रेज अधिकारियों को अवगत कराया गया। कहा गया कि यदि वामन जन्म स्थान के प्रतीक को नष्ट किया गया तो भारी उपद्रव शुरू हो जाएगा। इससे पूरे विश्व में ब्रिटेन की शाख गिरेगी।
इसके बाद जेल प्रशासन ने अपने परिसर स्थित वामन जन्मभूमि पर पूजा किसी भारतीय आचार्य से कराने का आदेश जेलर को दिया था। तब से वामन भगवान की पूजा तो होती रही लेकिन जेल परिसर में किसी सामान्य नागरिक के प्रवेश व दर्शन की अनुमति नही दी गयी थी। वहीं स्थानीय लोग वामन द्वादशी के अवसर पर गंगा ठोरा नदी के संगम पर एकत्रित होते रहे। वहां संगमेश्वर महादेव को वामनेश्वर मानकर उनकी पूजा अर्चना करने लगे।
आगे चलकर भारत आजाद हो गया लेकिन भारत की सरकार को चलाने वाले तंत्र की मानसिकता वही रही जो अंग्रेजों के शासनकाल में थी। तंत्र व सत्ता में बैठे राजनेताओं की औपनिवेशिक मानसिकता के कारण आजादी के बाद भी वामन भगवान की जन्मभूमि बक्सर केंद्रीय कारा की चहारदीवारी में कैद रही। जनआक्रोश भयंकर रूप धारण करने लगा तो वामन भगवान के नियंत्रित दर्शन-पूजन के लिए एक छोटा सा द्वार खोल दिया गया।

सम्राट सरकार के निर्णय के बाद वामन भगवान की जन्मभूमि अब जेल की चहारदीवारी से बाहर आ रही हैं। उनके भव्य मंदिर के निर्माण का सपना साकार होने वाला है।
विष्णु के प्रथम मनुज अवतार वामन भगवान ने बिना किसी अस्त्र-शस्त्र का प्रयोग किए ब्रह्मांड की व्यवस्था में विचलन एवं स्खलन से उत्पन्न होने वाली समस्याओं का समाधान कर दिया था।
कलिकाल में लोकतांत्रिक व्यवस्था सबसे उत्तम मानी जाती है। वामन देव की कृपा से लोक का मन शुभ्र और क्ल्याणकारी संकल्पों से युक्त होता है। यही भारत की सौम्य शक्ति का मूल है।
सम्राट चौधरी ने वामन भगवान की जन्मभूमि को मुक्त कराकर भारत की सौम्य शक्ति के जागरण का शुभारंभ करा दिया है। इससे मजबूत लोकतंत्र के लिए अनुकूल सामाजिक वातावरण का निर्माण होगा।
भगवान श्रीराम अपने गुरु विश्वामित्र के संरक्षण में जब वामन भगवान की जन्मभूमि व तपोभूमि पर आते हैं तब साक्षात् धर्मविग्रह के रूप में प्रतिष्ठित हो जाते हैं। यही रामराज्य का विचार बीज है जो वामन जन्मभूमि पर प्रस्फुटित हुआ था।
मुख्यमंत्री के रूप में सम्राट चौधरी ने सिद्धाश्रम बक्सर दौरे का विशेष कार्यक्रम बनाया और बक्सर सेंट्रल जेल परिसर स्थित वामन मंदिर में पूजा की। वहां प्राचीन वामनेश्वर शिव का अभिषेक किया, इसके बाद रामरेखा घाट गए। इस दौरे में ही उन्होंने कहा कि वामन भगवान जेल की चहारदीवारी से बाहर आयेंगे। बाद में सम्राट कैबिनेट ने बक्सर संेट्रल जेल परिसर से वामन मंदिर को अलग करने का निर्णय ले लिया।
वामन जन्मभूमि मुक्ति की लंबी लड़ाई
वामन, परशुराम, राम, कृष्ण, बुद्ध जैसे हमारे अवतार भारत के पुरूषार्थ के प्रतीक हैं। इस प्रकार उनके प्राकट्य स्थल यानी जन्मभूमि हमारे देश की संस्कृति व प्रकृति के मान बिंदु हैं। मजहबी आक्रांताओं ने भारत के इन मान बिंदुओं को अपवित्र व ध्वस्त किया था। अध्योध्या में भगवान श्रीराम की जन्मभूमि तो मथुरा में भगवान श्रीकृष्ण की जन्मभूमि को जिहादी मानसिकता वालों के चुगुल से मुक्त कराने के लिए लंबी लड़ाई चली। श्रीराम जन्मभूमि पर विवाद अब समाप्त हो चुका है लेकिन श्रकृष्ण जन्मभूमि को लेकर संघर्ष अभी जारी है। इन दोनों मान बिंदुओं को मुक्त कराने के लिए जो संघर्ष हुए हैं उनमें अनेक लोगों ने अपना बलिदान दिया है।
सिद्धाश्रम बक्सर स्थित वामन जन्मभूमि भी अवैध व अनैतिक कब्जे का शिकार हुआ। इसकी मुक्ति के लिए लंबी लड़ाई चली। लेकिन, इसमें रक्तपात नहीं हुआ। यहां वामन द्वादशी के अवसर पर लगने वाले मेले में जुटने वाले विशाल जनसमूह को देखकर अंग्रेज इतने भयभीत हुए कि उस स्थल पर केंद्रीय कारा का निर्माण करा दिया। वामन भगवान की जन्मभूमि जेल की चहारदीवारी के अंदर चली गयी। इसके बाद भी भक्तजन हार नहीं माने। लगातार डेढ़ सौ वर्षों तक विरोध होते रहा। वामन जन्म स्थल जेल के अंदर चले जाने के बाद गंगा और ठोरा नदी के संगम पर वामन द्वादशी के अवसर पर लोग भारी संख्या में एकत्रित होते रहे। पूर्व की तरह वामन द्वादशी के अवसर पर मेला लगता रहा। समय-समय पर बिटिश सरकार के इस तानाशाही और अत्याचार के विरोध में आंदोलन भी होते रहे। करीब डेढ़ सौ वर्षों के शांतिपूर्ण संघर्ष के बाद वामन भगवान की जन्मभूमि मुक्त हो गयी।
धर्म की पुनर्स्थापना के संकेत

कथावाचक आचार्य रणधीर ओझा
सतयुग और त्रेतायुग के संधिकाल में माता अदिति और महर्षि कश्यप के पुत्र के रूप में भगवान विष्णु का प्रथम मनुज अवतार हुआ जिन्हें हम वामन देव कहते हैं। इन्हें बटुक वामन के नाम से भी जाना जाता है। काल के प्रभाव से मानव व प्रकृति में परिवर्तन एक शाश्वत नियम है। इसके कारण धर्म का लोप होता है। धर्म के लोप होते ही सृष्टि का संतुलन बिगड़ने लगता है। धर्म के लोप के कारण ही ऋषियों की तपो भूमि और ज्ञान की भूमि भारत मलेच्छों के आक्रमण का शिकार होता रहा है। परकीय दासता की पीड़ा भोगने के लिए यहां के निवासी बाध्य होते रहे हैं। भारत के पुरूषार्थ के प्रतीक महापुरूषों के मान बिंदुओं की मर्यादा खंडित होती रही है। परमात्मा की कृपा से भारत की परा शक्ति अब जाग गयी है जिससे भारत के मान बिंदओंु की मर्यादा भी स्थापित होने लगे हैं। अयोध्या में प्रभु श्रीराम की जन्मभूमि पर भव्य व दिव्य मंदिर निर्माण के बाद उनकी प्रथम कर्मभूमि सिद्धाश्रम बक्सर में वामन जन्मभूमि का जेल की चहारदीवारी से मुक्त होना प्रकृति में बदलाव व धर्म की पुनर्स्थापना के लिए सकारात्मक परिवर्तन का बड़ा संकेत है। संपूर्ण लोक के मन को कुंठा व कुप्रवृतियों से मुक्त कराकर उसे चैतन्य बनाने वाले वामन देव की कृपा से भारत का मन स्वस्थ होने वाला है। इसके साथ ही भारत का लोकतंत्र भी पूर्णतः स्वस्थ होगा। परमात्मा ने इस कार्य का श्रेय हमारे प्रदेश बिहार के युवा मुख्यमंत्री श्री सम्राट चौधरी को दिया है। यह इनके पूर्व जन्म के प्रबल पुण्य का परिणाम है। इसके लिए ये अभिनंदन के योग्य है।
सम्राट ने मिटाया कलंक

महंत श्री अच्युत प्रपन्नाचार्य जी महाराज श्री निवास दिव्य पीठ
बसांव मठ, सिद्धाश्रम बक्सर
मुख्यमंत्री श्री सम्राट चौधरी सनातन धर्म के प्रति समर्पित और दृढ़ राजनीतिक इच्छा शक्ति से संपन्न राजनेता है। अंग्रेजों के रावण राज के समय भगवान वामन देव की जन्मभूमि को बक्सर सेंट्रल जेल की दीवारों के बीच कैद कर दिया गया था। वामन द्वादशी के दिन लगने वाले विराट मेले की परंपरा को खंडित करने के प्रयास हुए थे। संतों की प्रार्थना व देशभक्त वीरों के प्रचंड पुरुषार्थ से हमारा भारत तो आजाद हो गया लेकिन आजादी के 80 वर्ष बाद भी हमारे वामन भगवान की जन्मभूमि आजाद नहीं हुई थी। अंग्रेजों द्वारा निर्मित तंत्र की औपनिवेशिक मानसिकता के परिणामस्वरूप आजादी के बाद भी हमारे वामन महाराज की जन्मभूमि को जेले की चहारदिवारी के बीच कैद रखा गया। इस कलंक को हमारे युवा मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने मिटाया। तुष्टिकरण और वोट बैंक की राजनीति के इस युग में सम्राट चौधरी का यह निर्णय भारत और भारत की संस्कृति के प्रति उनके अगाध समर्पण एवं प्रबल राजनीतिक इच्छा शक्ति का प्रतीक है। हम सभी संतजन उनका मंगलाशासन करते है और भगवान वामन से उनके मन व विचार को शुभ्र व चैतन्य बनाये रखने की प्रार्थना करते है ताकि उनके यश-कीर्ति में उतरोतर वृद्धि होती रहे। संपूर्ण साधु समाज उनके साथ खड़ा है।
जब-जब मानव मन में विकृति और अशांति की प्रमुखता होती है तब-तब अत्याचार और अनाचार की वृद्धि होती है। वर्तमान समय में भी पूरे विश्व में अशांति एवं घातक युद्ध का प्रमुख कारण मानव मन की विकृति ही है। भगवान वामन मानव मन को चैतन्य बनाकर धर्म के अनुसार आचरण का सामाजिक वातावरण बनाते हैं। भगवान वामन की जन्मभूमि का जेल की दीवारों से मुक्त होना भारत के लिए शुभ संकेत है। चैतन्य लोकमन से ही लोकतंत्र की सफलता संभव है। सिद्धाश्रम के गौरव की पुनर्स्थापना से संपूर्ण भारत ही नहीं बल्कि विश्व भी आलोकित होगा।
आध्यात्मिक आजादी का पुण्य अवसर

महंत श्री राजाराम शरण जी महाराज,
महर्षि विश्वामित्र पीठ, नया बाजार, बक्सर
अंग्रेजों के समय से अतिक्रमण के शिकार सिद्धाश्रम बक्सर स्थित भगवान वामन देव की जन्मभूमि का जेल के कब्जे से मुक्त होना बहुत बड़ा आध्यात्मिक संकेत है। सबसे बड़ी बात यह है कि बिना किसी लंबे मुकदमेबाजी, हिंसक आंदोलन व तोड़फोड के बिना ही इस समस्या का समाधान हो गया। भगवान विष्णु के प्रथम मनुज अवतार वामन भगवान ने किसी शस्त्र-अस्त्र का प्रयोग किए बिना ब्रह्मांड व देव संस्कृति के समक्ष खड़े अस्तित्व संकट का समाधान कर दिया था। उसी प्रकार उनकी जन्मभूमि भी अवैध व अनैतिक कब्जे से एक झटके में मुक्त हो गयी। इसके लिए बिहार के मुख्यमंत्री श्री सम्राट चौधरी धन्यवाद के पात्र है। इस महान काम के लिए उनकी जितनी भी प्रशंसा की जाए वह कम है। भगवान वामन ने अपने इस कार्य के लिए उनका चयन किया। वामन देव से हम साधुजन प्रार्थना करते हैं कि उनकी कृपा युवा राजनेता और मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी पर बनी रहे। उन्हें आध्यात्मिक आजादी दिलाने का पुण्य अवसर भगवान ने दिया। उन्हें हरेक प्रकार से सामर्थ्यवान बनायें ताकि वे बिहार को बहुत आगे लेकर जायें और हमारी आकांक्षाओं को पूरा करने में समर्थ हो। अब हम सिद्धाश्रम बक्सर के निवासियों का कर्तव्य है कि परमात्मा की कृपा से जो अनुकूलता मिली है उसका उपयोग कर इस परम तीर्थ को विश्व का फिर से आध्यात्मिक केन्द्र बनाएं।
संत का संकल्प: 35 वर्ष से एक ही नारा चरित्रवन बक्सर, बिहार, भारत धाम की जय

पूज्य संत जीयर स्वामी जी महाराज
बक्सर
पूज्य संत जीयर स्वामी जी महाराज का नाम जगत विख्यात है। महान साधक के रुप में उनकी छवि है। जब उनसे बक्सर के बारे में पूछा गया तो उन्होंने स्पष्ट शब्दों में दो वाक्य कहे। मैं जब से संयासी बना, गुरू वाक्य को अपना मूल बनाया। जहां भी जाता हूं, जिस अवस्था में रहता हूं, कथा हो या आरती। देश के हर कोने में एक ही बात कहता हूं। सिद्धाश्रम जैसा कोई तीर्थ नहीं। चरित्रवन, बक्सर बिहार भारत धाम की जय। मेरे लिए तो बक्सर गुरू धाम है। लेकिन, यह सिर्फ मेरी बात नहीं है। जो भी यहां के निवासी हैं। जो सनातन धर्मावलंबी हैं। सभी को इसका अनुसरण करना चाहिए। प्रत्येक तीर्थ की वंदना होती है। बक्सर की वंदना पूज्य गुरूदेव (त्रिदण्डी स्वामी जी) ने लिखी है। उसका गायन होना चाहिए। उन्होंने कहा अन्य प्रदेशों में जिस तरह तीर्थों पर सरकारें ध्यान देती हैं। यहां उसकी कमी खलती है। यहां के प्रतिनिधि भी इस पक्ष की तरफ उदासी बरतते हैं। जन मानस को चाहिए, अपना न सही अपने नगर के विकास के लिए चैतन्य हो। बक्सर सिद्धआश्रम है। यहां आदि काल से तपस्या होती रही है। हवन और यज्ञ होते रहे हैं। शास्त्रों में इसका वर्णन है। किसी को प्रमाण चाहिए तो वह पुस्तकों का अध्ययन कर सकता है। प्रदेश में किसी की सरकार हो। उसका यह कर्तव्य है, इस धराधाम पर बेहतर कार्य हो। यहां का पंचकोशी क्षेत्र आज भी उपेक्षित है। कहीं भी श्रद्धालुओं के लिए बेहतर व्यवस्था नहीं है। सड़क चौड़ी हो या न हो, जो है वह भी खराब स्थिति में हैं। उनकी देखभाल हो, उन्हें बेहतर बनाया जाए। जिससे बिहार सरकार के पर्यटन मानचित्र में बक्सर के तीर्थों का उल्लेख हो। हालांकि मौजूदा सरकार से लोगों को उम्मीद है। वामन मंदिर को जेल से अलग करने का प्रस्ताव भी बेहतर है। वह प्रशंसा के योग्य है। लेकिन, यहां की जरूरतें और भी हैं।
भगवान वामन ने की थी शिव की आराधना, विकास की और दरकार: शील नाथ जी
महंत शील नाथ बाबा

आदि नाथ अखाड़ा, बक्सर
वामन मंदिर और बक्सर के आध्यात्मिक विकास के सवाल पर आदि नाथ अखाड़ा के महंत शील नाथ बाबा जी कहते हैं। मौजूदा सरकार ने वामन मंदिर के लिए जो निर्णय लिया है। वह प्रशंसा के योग्य है। उन्होंने कहा वामनेश्वर मंदिर का स्थान भगवान वामन की तपः स्थली है। जब राजा बली से दान लेकर उन्होंने जगत का कल्याण किया। उस समय लघु से विराट रुप बनाने पर कुछ प्रश्न खड़े हुए। इस पर उन्होंने भगवान शिव की आराधना शुरू की। उस धरा धाम पर सिर्फ भगवान वामन ही नहीं अपितु शिव भी प्रकट हुए। उन्होंने कहा, आपका यह कार्य जगत हित के लिए था। इसमें किसी तरह के संकोच की बात नहीं। तब भगवान वामन के आग्रह पर वहां वामनेश्वर महादेव के रुप में प्रभु विराजे। जिसकी आराधना होती है। इसी तरह पंचकोशी के पूरे क्षेत्र में भगवान शिव की पूजा होती है। उन सभी स्थानों की उपेक्षा हो रही है। न आने जाने का बेहतर मार्ग है। न उन सभी को किसी विशेष मार्ग से सीधा जुड़ाव। इन बातों पर सरकार ध्यान दे। यह वक्त की जरूरत है और बक्सर के विकास के लिए जरुरी भी। शहर में गंगा तटों के आस-पास गंदगी पसरी है। उस पर कोई ध्यान नहीं देता। जहां तहां प्रकाश के कुछ हाई मास्ट लगे हैं। उनमें से कई जलते ही नहीं, कुछ अनियमित जलते हैं। इस सब पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए। कुल मिलाकर शहर की स्थिति बेहतर नहीं। जिससे यहां की आभा मलीन हो रही है।
