सारण प्रवास के क्रम में मुझे चिरांद के बारे में जानकारी मिली थी। तीन नदियों के संगम पर स्थित उस तीर्थ स्थल को देखने व उसके तटों पर निवास करने वाले संत महापुरूषों से जुड़े स्थानों को नमन करने की प्रबल इच्छा जागृत हुयी। जहां तक मुझे स्मरण है जनवरी 2008 में मैं पहली बार चिरांद गया था। मेरे पास बैठे एक सज्जन ने कहा कि इस स्थान पर गोस्वामी तुलसी दास भी कभी पधारे थे। भगवान श्रीराम व लक्ष्मण जी के पुरूषार्थ का वर्णन करते हुए उन्होंने यहां की भौगोलिक व प्राकृतिक दृश्यों का जो रेखा चित्र अपने अमर सत ग्रंथ रामचरित मानस के बाल कांड में खिंचा है, वह काव्य जगत का धरोहर है। गोस्वामी जी ने राम चरित मानस के बाल कांड में लिखा है-

देव भगति सुर सरित ही जाई, मिली सुकीरति सरजू सुहाई। सानुज राम समर जसु पावन, मिलेउ महानदु सोन सुहावन। जुग बीच भगति देव धुनिधारा ……।
मानस की इन पंक्तियों को सुनने के बाद मैं तत्काल उस स्थान के लिए चल पड़ा। मन में कई प्रकार के विचार उठ रहे थे। जिस स्थान का वर्णन लोकनायक तुलसी दास ने इस रूप में किया है वह स्थान निश्चित रूप से अद्भुत होगा। कुछ मित्रों के साथ मैं चिरांद स्थित गंगा तट पर पहुंच गया। मैं जहां खड़ा था उससे पश्चिम में थोड़ी दूरी पर गंगा व सरयू की धाराएं मिल रही थी। वहीं थोड़ा और आगे पूरब दिशा में दक्षिण से आ रहे सोननद की धारा गंगा-सरयू से मिल रही थी। दिन के उजाले में इन धाराओं को मिलते देख अद्भुत आनंद की अनुभूति हुई। यह स्थान सहज ही आकर्षित कर रहा था। लेकिन, चिरांद के गंगा तट पर चलते हुए जो दिखा उससे मेरा मन व्यथित हो उठा। अंतरमन कह रहा था कि इस तीर्थ की ऐसी दुर्दशा क्यों? गंगा के पवित्र तट पर इतनी गंदगी क्यों? कैसे सुधरेगी इस तीर्थ की दशा? पुरातात्विक स्थल की भी दशा अत्यंत दयनीय थी। बालू की ढेर के बीच उस स्थान की गरिमा मंद दिख रही थी।


लगभग 16 वर्षों बाद उस रास्ते से गुजरने का मौक मिला। अब वहां गंगा नदी पर पुल का निर्माण हो गया है। आरा और छपरा के बीच आवागमन की अच्छी सुविधा हो गयी है। पहले छपरा के लोग पटना से होकर आरा जाते थे जिसमें 100 किलोमीटर की अधिक दूरी तय करनी पड़ती थी। अब पुल निर्माण हो जाने से आरा-छपरा की दूरी मात्र 30 किलोमीटर हो गयी है। लेकिन, पुल के निर्माण के कारण गंगा की धारा थोडी दूर हो गयी है। इस प्रकार गंगा और सरयू का संगम भी थोड़ा पश्चिम की ओर खिसक गया है। वहां के लोगों ने बताया कि बरसात के दिनों में गंगा, सरयू और सोन के इस त्रिवेणी का वही मनोरम दृश्य रहता है।
स्मरण है, चिरांद की पहली यात्रा के दिन हम लोगों ने तय किया था कि इस तीर्थ स्थल के संरक्षण व विकास का प्रयास शुरू किया जाए। इस दिशा में स्थानीय लोगों के सहयोग से काम भी शुुरू हुआ। जिसके परिणामस्वरूप चिरांद विकास परिषद् की स्थापना हुयी। काम जब से शुरू हुआ है तब से अनवरत चल रहा है। लेकिन, अब इसमें गति लाने की आवश्यकता है।

अयोध्या में श्रीराम लला के भव्य मंदिर में स्थापित होने के बाद उनकी प्रथम यात्रा का महत्वपूर्ण पड़ाव के रूप में चिरांद की प्रमाणिकता सिद्ध हुई है। ऐसे में इस तीर्थ के प्रति लोगों में जिज्ञासा बढ़ रही है। इसे बहुत आगे बढ़ाना होगा। तभी इस तीर्थ की प्रतिष्ठा पुनर्स्थापित होगी, इसका पुरूषार्थ जागृत होगा। यहां आकर लोग शांति व आनंद का अनुभव करेंगे।
यह स्थान हमारे पूर्वजों की कीर्ति व पुरूषार्थ की धरोहर है। इसे बचाने व सजाने के लिए हमें ही आगे बढ़ना होगा। एक सांस्कृतिक व धार्मिक केन्द्र के रूप में इसकी प्रतिष्ठा थी लेकिन कालक्रम में यह केन्द्र हमारी आंखों से ओझल हो गया। अब हम ऐसा नहीं होने देंगे। इस तीर्थ को जागृत कर इस लायक बनाएंगे कि यहां आकर लोग शांति व आनंद का अनुभव करें। इसके साथ ही यह स्थान सामाजिक-सांस्कृतिक केन्द्र के रूप में भी विकसित हो सकता है जहां से समाज के निचले पायदान पर खड़े बंधुओं को आगे बढ़ाने का कार्य चले। चिरांद विकास परिषद् सामाजिक समरसता के लिए भी कार्य कर रही है। इस क्षेत्र के धार्मिक केन्द्रों व संत-महात्माओं के सहयोग से सेवा कार्य भी चलाये जा रहे हैं ताकि भारत की सनातन परंपरा एक बार फिर इस संगम पर साकार हो उठे।
अपने देश में नदियों के तटों पर ही अधिकांश तीर्थ स्थल है। भारत का सांस्कृतिक व धार्मिक जीवन प्रवाह नदियों के साथ चलता रहा है। हमारी नदियां आज संकट में है। माता गंगा आज संकट में है। मां गंगा के तट पर ही इस चिरांद का उद्भव व विकास हुआ है। चिरांद विकास परिषद् इसके महत्व को समझता है। इसलिए चिरांद का मुख्य महोत्सव गंगा महाआरती व गंगा बचाओ संकल्प समारोह के रूप में होता है। यह आयोजन पिछले 19 वर्षों से निर्बाध रूप से जारी है। इस आयोजन के बहाने सारण के साथ ही भारत के अन्य स्थानों से संत-महात्मा व गृहस्थ इस संगम स्थल पर एकत्र होते हैं।

गंगा महाआरती के बहाने संगतिकरण व विचार प्रबोधन के अद्भुत समन्वय से जो वातावरण यहां बना है उससे इस तीर्थ स्थल के विकास के लिए चल रहे प्रयास को शक्ति मिली है। अभी अनुकूलता की स्थिति है। इसमें प्रयास को और तेज किया जाए तो अपेक्षित परिणाम सामने आयेंगे। अब वह दिन दूर नहीं जब चिरांद पर हम गर्व महसूस करेंगे। इस तीर्थ स्थल पर ग्रामीण विकास, सेवा, सामाजिक समरसता के साथ ही सांस्कृतिक चेतना की भी धारा प्रवाहित होगी। इससे ही किसी तीर्थ की सार्थकता सिद्ध होती है।
श्रीराम ने वनवास का अधिकांश समय चित्रकूट मे बिताया था। वह स्थान भी हाल तक बहुत उपेक्षित और उदास था। वनवासी बंधुओं के समक्ष अभाव था। नानाजी देशमुख ने उस स्थान को सभी प्रकार से विकसित करने संकल्प लिया। परिणाम हमारे सामने है। वहां विश्वविद्यालय से लेकर कई सेवा प्रकल्प चल रहे हैं। विश्वस्तरीय नेत्र चिकित्सा के केंद्र स्थापित हो चुके हैं। इसी प्रकार से यदि योजनबद्ध तरीके से सतत कार्य होता रहा तो श्रीराम की प्रथम पराक्रम यात्रा का यह पड़ाव भी एक आदर्श तीर्थ बन जायेगा।
