नवादा : कहते हैं न्याय कभी मरता नहीं। भले ही समय जो लग जाय। ऐसे में अधिकारियों को जब अपने पर बन आती है तब वे एक दूसरे पर जवाबदेही सौंप पल्ला झाड़ने में लग जाते हैं। वैसे इसके लिए एसडीओ भी उतने ही जिम्मेदार हैं जितने एमओ। जी हां! तो यहां हम बात कर रहे हैं रजौली एसडीएम का। मामला वर्ष 22 यानी चार वर्षों पुरानी है। जिले के बहुचर्चित आरटीआई कार्यकर्ता प्रणव कुमार चर्चिल ने रजौली प्रखंड अमांवा पूर्वी पंचायत पीडीएस विक्रेता योगेन्द्र पासवान से संबंधित कुछ दस्तावेज की मांग की थी।
दस्तावेज उपलब्ध कराने के एवज में नियमत: निर्धारित राशि की मांग की गयी थी। जब वे राशि जमा करने रजौली एमओ कार्यालय पहुंचे तो वे भाग खड़े हुए। रजौली एसडीएम से राशि जमा लेने का अनुरोध किया लेकिन उन्होंने जमा लेने से इंकार कर दिया। ऐसे में उन्हें पुलिस का सहारा लेना पड़ा था। उन्होंने राज्य सूचना आयोग में अपील दायर की थी।
लम्बी लड़ाई के बाद राज्य सूचना आयुक्त ने 09 सितंबर तक सूचना उपलब्ध कराने तथा सुनवाई की तिथि निर्धारित की। सूचना संबंधित को उपलब्ध कराई गई। अब जब राज्य सूचना आयुक्त का डंडा चला तो अपनी जबावदेही टाल एमओ को जबावदेह ठहरा राज्य सूचना आयुक्त के न्यायालय में उपस्थित होकर जबाव देने का आदेश निर्गत किया है। इसी को कहते हैं हर बड़ी मछली छोटी मछली को ही अपना शिकार बनाती है।
भईया जी की रिपोर्ट