विनोद कुमार तिवारी (राजनैतिक विश्लेषक)
विधानसभा और विधान परिषद को मिलाकर इस समय बिहार में कुल 318 विधायक हैं। 243 विस में और 75 विप में। इन सभी 318 विधायकों को पिछले 56 सालों से अपने क्षेत्र में स्वेच्छा से चुनी गई विकास योजनाओं पर प्रति वर्ष एक करोड़ रूपए तक ख़र्च करने का अधिकार मिला हुआ है। लेकिन इस अधिकार में सबसे बड़ा झोल यह है कि माननीयों की अनुशंसा पर यहां एक तो कोई पारदर्शी वैकल्पिक व्यवस्था लागू नहीं है। दूसरे इसको हथियार बनाकर लोकतांत्रिक प्रक्रिया से जनप्रतिनिधि बने माननीय अपने पॉवर का प्रयोग एक दूसरे को या अधिकारियों और कर्मियों को ब्लैकमेल कर किसी तरह अपना हित साधने से गुरेज नहीं करते। बड़ सवाल यह है कि जो इंसान अपने जीवन यापन की जिम्मेदारी वैध तरीके से खुद नहीं उठा सकता, वो जनता की नुमाइंदगी कैसे कर सकता है?
नीतीश ने रोक दिया था विधायक फंड
यही कारण है कि वर्ष 2010 में तत्कालीन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने इन सभी गतिविधियों पर रोक के लिए विधायक फंड को ही बंद कर दिया था। लेकिन कुछ समय बाद यह फिर शुरू हो गया। नतीजा यह कि आज नीतीश के सीएम पद छोड़ देने के बाद भी बिहार में MLA/MP की कुर्सी का इस्तेमाल धड़ल्ले से माननीयों के फंड के दुरुपयोग और ब्लैकमेल तथा सौदेबाजी के लिए धड़ल्ले से हो रहा है। साफ है कि लोकशासन में एक पारदर्शी व्यवस्था अनिवार्य रूप से क्रियाशील होनी चाहिए जो ऐसे मामलों में सीधे हस्तक्षेप में सक्षम हो।
पारदर्शी व्यवस्था समय की मांग
यह पारदर्शी व्यवस्था लोकायुक्त, सक्षम प्राधिकार या किसी भी आटोनोमस बॉडी के रूप में हो सकती है। साथ ही यह भी सुनिश्चित होना चाहिए कि अगर किसी MP/MLA को किसी नेता, अधिकारी या व्यक्ति के गलत काम की जानकारी हो, तो उसे 15 दिन के अंदर लिखित में Lokayukta/सक्षम अधिकारी को बताना अनिवार्य होना चाहिए। यह भी व्यवस्था होनी चाहिए कि अगर उसने संबंधित जानकारी को नहीं बताया तो उस MP/MLA को भी उस गलत काम में बराबर का गुनहगार माना जाना चाहिए। इसके अलावा अगर उस लोकायुक्त या सक्षम प्रधिकार की जांच में कोई भी MLA/MP किसी अधिकारी पर दबाव डालते पाया जाए तो उसे भी गुनाहगर मानकर दंडित किया जाना चाहिए।
इससे क्या होगा:
1. ब्लैकमेल बंद: नेता जानकारी छिपाकर सौदा नहीं कर पाएगा
2. भ्रष्टाचार रुकेगा: सबको डर रहेगा कि कोई न कोई बता देगा
3. जनसेवक बनेगा: नेता जनता की तरफदारी करने को मजबूर होगा
4. सिर्फ इमांनदार ही नेता बनने की सोचेगा।
एक राष्ट्र, एक सुविधा का नियम
MP/MLA को भत्ते के अलावा ऐसी कोई सुविधा न मिले जो आम नागरिक के पास न हो।
1. आवास: सरकारी बंगला बंद। क्षेत्र में स्थाई निवास
2. यात्रा: इकोनॉमी/ट्रेन। बिजनेस क्लास बंद
3. स्वास्थ्य-शिक्षा: वही सरकारी सुविधा जो आम आदमी को दी जाती है।
4. पेंशन: आम नागरिक को जब तक नहीं मिलेगा, तब तक MP/MLA को भी नहीं मिलेगा।
अन्य सुधार
1. वर्चुअल संसद: क्षेत्र से ही डिजिटल माध्यम से कार्यवाही। हफ्ते में 5 दिन जनता के बीच
2. Recall अधिकार: 50% जनता चाहे तो 5 साल से पहले वापस बुला सके ये प्रावधान होना चाहिए।
इस सारे विषय के संदर्भ में पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय राजीव गांधी की एक उक्ती काफी समीचीन होगी। राजीव गांधी ने कहा था कि—”पारदर्शिता ही लोकतंत्र की जान है”। जब तक “जानकारी छिपाने” पर सजा नहीं होगी, तब तक ब्लैकमेल की राजनीति नहीं रुकेगी। अगर राजीव गांधी की इसी उक्ती को गंभीरता से हम देखें तो हमें इसमें सारी समस्याओं का समाधान मिल जाता है। ऐसे में अगर MLA/MP “15 दिन में बताओ वरना जेल जाओ” वाले कानून को संसद में प्राइवेट बिल के रूप में लाने का प्रस्ताव रखा जाए और इसपर अच्छी बहस हो और जरूरत पडे को कुछ जनता के अच्छे लोगों को भी बहस मे शामिल किया जाए तो हमारी कई मुश्किलों का स्वत: समाधान हो जाएगा। उमीद है कि आज की भारत सरकार में शामिल और विपक्ष में मौजूद प्रतिभाशाली जनप्रतनिधि इस पर गौर करें और जनता के लिए ऐसा कानून लाने मे जुटें तो हमारा विकसित भारत का सपना हकीकत बनने से कोई नहीं रोक सकता। जिस विश्वगुरु भारत के लक्ष्य को हमारे पूर्वजों ने सामने रखा था, उसे पाने के लिए अब वह समय आ गया है कि हम कोई ऐसा कानून लायें कि कोई भी जन प्रतिनिधि जनता को उल्लू बनाने की कोशिश ना करे। कई नेता एलेक्शन के समय कई झूठे वादे करते है। चुनने के बाद भूल जाते है। एक ऐसा कानून आना चाहिए की जो नेता एलेक्शन के समय जो वादे किये वो पुरा नही करते है तो उनकी हर सुविधा वापस ली जाए, उनके असेट्स को बेच कर जितना हो सके उनसे जनता को दिये गये वादे पूरे करे और जनता को उसे वापस बुलाने की ताकत दी जाए।