राजधानी पटना में आज शनिवार को एकबार फिर बड़ी संख्या में छात्र सड़क पर प्रदर्शन के लिए निकले। दरअसल आज असिस्टेंट प्रोफेसर अभ्यर्थियों ने लोकभवन मार्च का कॉल दिया था, जिस दौरान उनकी पुलिस से तीखी झड़प होने की खबर है। अभ्यर्थी पिछले 19 दिनों से चल रहे अनिश्चितकालीन आमरण अनशन क्रम में आज शनिवार को लोकभवन मार्च पर निकले थे। पुलिस ने जगह-जगह अभ्यर्थियों को रोकने के लिए बैरिकेडिंग लगाई लेकिन बेली रोड पर मार्च के दौरान छात्रों से पुलिस की जबरदस्त झड़प हो गई। अभ्यर्थियों ने बैरिकेडिंग तोड़ दी। सैकड़ों अभ्यर्थी गर्दनीबाग से लोकभवन की ओर से बढ़ रहे हैं। असिस्टेंट प्रोफेसर अभ्यर्थी सरकार के खिलाफ नारेबाजी कर रहे हैं। आंदोलन का नेतृत्व कर रहे हैं डॉ. कुंदन कुमार ने कहा कि पिछले 19 दिनों से हम आमरण अनशन पर बैठे हैं। तीन में दो शोधर्थियों की हालत बिगड़ गई है। उन्हें अस्पताल में भर्ती करवाया गया है लेकिन सरकार को हमारी चिंता नहीं है।

नई नियमावली रद करने की कर रहे मांग
छात्रों का कहना है कि हमलोग बिहार सरकार की नई सहायक प्राध्यापक नियुक्ति नियमावली 2026 का विरोध कर रहे हैं। नई नियमावली बिहार के छात्रों और शोधार्थियों के हित में नहीं है तथा इससे उच्च शिक्षा व्यवस्था प्रभावित होगी। अभ्यर्थियों ने कहा कि बिहार के विश्वविद्यालयों में करीब 30 वर्षों में केवल तीन बार सहायक प्राध्यापक की बहाली हुई है। ऐसे में स्थायी नियुक्ति के बजाय फिर संविदा आधारित नियुक्ति का प्रावधान उचित नहीं है। उन्होंने UGC के टेबल 3A के आधार पर स्थायी शिक्षकों की नियुक्ति की मांग की। अभ्यर्थियों ने कहा कि नई नियमावली में अधिकतम उम्र सीमा 55 वर्ष से घटाकर 40 वर्ष कर दी गई है। इससे वर्षों से अतिथि शिक्षक के रूप में कार्यरत अभ्यर्थियों के सामने अवसर खत्म होने का खतरा है। उन्होंने उम्र सीमा 55 वर्ष रखने की मांग की। इसके अलावा अभ्यर्थियों ने रिसर्च पब्लिकेशन के अंक हटाए जाने पर भी आपत्ति जताई। उनका कहना है कि पिछली बहाली में UGC टेबल 3A के तहत रिसर्च पब्लिकेशन को 10 अंक दिए गए थे। संगठन ने नियमावली में संशोधन कर बिहार के अभ्यर्थियों के हितों की रक्षा करने की मांग की है।
उधर पूर्णिया के निर्दलीय सांसद पप्पू यादव ने असिस्टेंट प्रोफेसर अभ्यर्थियों को समर्थन देते हुए कहा कि शोधार्थी हमारे शिक्षा और ज्ञान की रीढ़ हैं। उनके सम्मान, अधिकार, रोजगार और भविष्य से जुड़े सवालों को संघर्ष या विरोध के रूप में देखने के बजाय सरकार को संवेदनशीलता के साथ उनकी समस्याएं सुननी चाहिए और तत्काल वार्ता कर समाधान का रास्ता निकालना चाहिए। शोधार्थियों की आवाज को दबाना नहीं, बल्कि सुनना और सम्मान देना सरकार की जिम्मेदारी है। उनके अधिकार और न्याय की इस लड़ाई में हम मजबूती से उनके साथ खड़े हैं। शिक्षा, शोध और शोधार्थियों के सम्मान के लिए यह संघर्ष जारी रहेगा।
