कटिहार के कई ग्रामीण इलाकों में आज भी विकास की तस्वीर अधूरी नजर आती है। आधुनिक पुल और सड़क की जगह लोग बांस से बनी चचरी पुलिया के सहारे जान जोखिम में डालकर आवागमन करने को मजबूर हैं। जैसे-जैसे मानसून नजदीक आ रहा है, वैसे-वैसे ग्रामीणों की चिंता भी बढ़ती जा रही है। कई जगह वर्षों पहले टूटे पुल अब तक नहीं बन सके हैं, जबकि कहीं निर्माण कार्य अधूरा पड़ा है।
प्राणपुर में बरसात से पहले बढ़ी चिंता
प्राणपुर विधानसभा क्षेत्र के दक्षिणी लालगंज पंचायत में दो प्रखंडों को जोड़ने वाला शोसाधार पुल वर्ष 2017 की बाढ़ में टूट गया था। करीब नौ वर्षों बाद भी पुल का निर्माण नहीं हो सका है। केशवपुर, नया टोला, नीमा और बैदा समेत कई गांवों के लोग आज भी चचरी पुल के सहारे आवागमन कर रहे हैं। लाभा स्टेशन और बाजार जाने के लिए जहां सीधा रास्ता मात्र दो किलोमीटर पड़ता है, वहीं पुल नहीं रहने से लोगों को करीब आठ किलोमीटर घूमकर जाना पड़ता है। ग्रामीणों का कहना है कि पुल बनने से दस हजार से अधिक आबादी को सीधा लाभ मिलेगा।
कदवा में टूटी पुलिया और अधूरे निर्माण
कदवा विधानसभा क्षेत्र के धपरसिया पंचायत स्थित भौरा धार पुल की स्थिति भी बदहाल है। यहां लोग सालों भर बांस की चचरी के सहारे आवाजाही करते हैं। बरसात के दिनों में हालात और भयावह हो जाते हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि हर वर्ष दुर्घटना की आशंका बनी रहती है, बावजूद इसके स्थायी पुल निर्माण की दिशा में कोई ठोस पहल नहीं हो रही।
कोढ़ा व बारसोई में चचरी ही मात्र सहारा
वहीं कोढ़ा प्रखंड के मधुरा पंचायत में कारी कोसी नदी पर बने चचरी पुल भी चर्चा में हैं। बिनोदपुर पंचायत के चूरली घाट पर ग्रामीण किसी तरह पुराने चचरी पुल से गुजरते हैं, जबकि नए पुल का निर्माण कार्य अब तक अधूरा है। निर्माण की धीमी रफ्तार से लोगों में नाराजगी बढ़ रही है। जबकि बारसोई की बात करें तो इस प्रखंड की स्थिति सबसे चिंताजनक मानी जा रही है। यहां नगर पंचायत क्षेत्र समेत लगभग 13 स्थानों पर आज भी बांस से बने चचरी पुल ही लोगों का सहारा हैं। जमीरा घाट, तारापुर घाट, दासग्राम घाट, महानंदा घाट और कुशियार मोड़ा सहित कई इलाकों में लोग जोखिम उठाकर सफर करते हैं। ग्रामीणों ने जिला प्रशासन और जनप्रतिनिधियों से बरसात शुरू होने से पहले स्थायी पुल निर्माण कराने की मांग की है, ताकि हर साल भय और परेशानी के बीच जीवन जीने की मजबूरी खत्म हो सके।