सिद्धाश्रम बक्सर का नाम सुनते ही मेरे मन-मस्तिष्क में एक साथ कई प्रकार के भाव व विचार उठने लगते हैं। बक्सर का वह केंद्रीय कारा जहां लोकतंत्र की रक्षा की लड़ाई में हमने कैदी जीवन व्यतीत किया था। वहीं साथी कैदियों से इस परमतीर्थ के बारे में जानकारी मिली थी। सिद्धाश्रम, वामनाश्रम, चैत्ररथ वन, ताटका वन जैसे कई नाम विभिन्न कालखंडों में इस तीर्थ के गौरवशाली इतिहास के द्योतक हैं। यह मेरे पूर्वजन्म का कुछ पुण्य था कि मुझे इस परमतीर्थ का लोकसभा में प्रतिनिधित्व करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। सिद्धाश्रम के अधिष्ठाता वामन भगवान की जन्मभूमि जेल की चहारदीवारी से बाहर निकल रही है। यह मेरे लिए परमसंतोष की बात है। बक्सर के विकास में कई प्रकार के विघ्न बाधाएं आती रही है लेकिन रूका नहीं। सुखद परिणाम सामने दिखने लगा है। स्मरण है एक बार भाजपा अध्यक्ष के रूप में श्री सम्राट चौधरी मेरे साथ जेल परिसर स्थिति वामन भगवान के दर्शन के लिए गए थे। उनकी सहज प्रतिक्रिया थी, यह गलत है।

सिद्धाश्रम स्थित वामन जन्मभूमि बक्सर केंद्रीय कारा की चहारदीवारी के भीतर थी। यह भारत के माथे पर कलंक का टीका था। मुख्यमंत्री बनने के बाद श्री सम्राट चौधरी जी हम से मिलने हमारे पटना आवास पर आए थे। उस समय हमने सिद्धाश्रम बक्सर के उत्थान के लिए कुछ करने का सुझाव उन्हें दिया था। युवा और दूरदर्शी मुख्यमंत्री श्री सम्राट चौधरी ने बहुत जल्द हमारे सुझाव पर अमल करते हुए 23 मई 2026 को वहां जाने का अपना कार्यक्रम बना लिया। अपने इस यात्रा के दौरान उन्होंने वामन जन्मभूमि पर स्थित मंदिर में पूजा अर्चना की और वामन जन्मभूमि को जेल की चहारदीवारी से शीघ्र मुक्त कराने का आश्वासन दिया था। उन्होंने वह आश्वासन शीघ्र पूरा कर दिया। इसके साथ ही उन्होंने रामरेखा घाट स्थित रामेश्वर नाथ मंदिर में पूजा की तथा वहां लेजर शो के माध्यम से सिद्धाश्रम का इतिहास दिखाने वाले कार्यक्रम का उद्घाटन भी किया था।
युवा नेता सम्राट चौधरी के हाथों परमात्मा ने इस विशिष्ट कार्य को सम्पन्न करा उनके यश-कीर्ति को बढ़ाया है। इसके लिए ये अभिनंदन के पात्र हैं। उनका यह यश-कीर्ति हमारे लिए हर्ष की बात है। इस प्रसंग में मुझे गीता के छठे अध्याय का 41 वां श्लोक का स्मरण हो जाता है। भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि प्राप्य पुण्यकृतां लोकानुषित्वा शाश्वतीः समाः, शुचीनां श्रीमतां गेहे योगभ्रष्टोभिजायते। अर्थात योगी अपने पूर्व जन्म के शरीर में ब्रह्म का साक्षत्कार नहीं कर पाता तो उसे दूसरे जन्म में राजा जैसा कार्य व सम्मान मिलता है। ताकि वह परमात्मा के निश्चित कामों को पूरा करे और प्रजा का भला करे।


भगवान श्रीराम की प्रथम कर्मभूमि सिद्धाश्रम बक्सर की स्थिति देखकर मैं भीतर से व्यथित रहता हूं। अपनी क्षमता के अनुसार इस परमतीर्थ के गौरव की पुनर्स्थापना के लिए मैं सतत लगा रहा। हम जिस प्रकार की लोकतांत्रिक व्यवस्था में रह रहे हैं उसमें आज भी सरकार के माध्यम से कोई बड़े काम को अंजाम देना अत्यंत मुश्किल कार्य है। भगवान श्रीराम भारत के पुरूषार्थ के प्रतीक पुरूष है। महात्मा गांधी ने भी कहा है कि मेरे लिए लोकतंत्र का अर्थ रामराज्य है।
मेरा मानना है कि समर्थ भारत के निर्माण का मार्ग श्रीराम के गौरव की पुनर्स्थापना से होकर गुजरता है। इसीलिए हमारे संविधान निर्माताओं ने मूल संविधान के मौलिक अधिकार वाले अनुच्छेद के प्रथम पृष्ठ पर वनवासी श्रीराम, लक्ष्मण और सीता का चित्र अंकित कराया था।
लेकिन, आजादी के बाद श्रीराम को काल्पनिक बताने की मानसिकता वाली राजनीति चलती रही जिसके परिणाम स्वरूप श्रीराम की प्रथम कर्मभूमि के अधिष्ठाता भगवान विष्णु के प्रथम मनुज अवतार वामन भगवान की जन्मभूमि जेल की चहारदीवारी में सीमटी रही। यह स्थिति मुझे परेशान करती थी।

कोरोना महामारी के समय पटना उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश श्री संजय करोल जी से मैने अपनी यह पीड़ा व्यक्त की थी। माननीय न्याधीश स्वयं वामन भगवान के दर्शन व पूजन के लिए बक्सर गए थे। वह भी जेल की चहारदीवारी में वामन जन्मभूमि को देख अचंभित थे। उन्होंने अपनी ओर से इसके लिए कानून के तहत कुछ प्रयास किया था।
सरकार के नियम और कानून को मानते हुए हमने उस परिसर को रामायण में वर्णित कथा के अनुसार हराभरा करने के लिए वामन नक्षत्र वाटिका लगवाने का प्रयास किया। बक्सर रहने पर मैं वामन भगवान का दर्शन करने का प्रयास जरूर करता था। ऐसे शास्त्रीय प्रमाण हैं जिसके अनुसार राम राज्य का विचार बीज इसी सिद्धाश्रम में प्रस्फंुटित हुआ था। यह स्थान संपूर्ण विश्व को आकर्षित करने में समर्थ है लेकिन कुव्यवस्था व कई दशकों की उपेक्षा के कारण इसका सामर्थ्य समाप्त हो चुका था।
काफी प्रयास के बाद भी जब अपेक्षित परिणाम नहीं मिलने लगे तब मैंने इस परमतीर्थ को लेकर अखिल भारतीय स्तर पर लोक जागरण के अभियान का संकल्प लिया। इस तीर्थ का विकास किसी सरकार के बस की बात नहीं। लोक व संतो ंके सम्मिलित प्रयास से ही यह संभव हो सकता है। इसी विचार से हमने श्रीराम कर्मभूमि न्यास की स्थापना कर कार्य प्रारंभ किया है। इसके तहत अखिल विश्व सनातन संस्कृति समागम रामराज्य की ओर का आयोजन किया जिसमें संपूर्ण भारत और विश्व के कई देशों के प्रतिनिधि शामिल हुए।
श्रीराम वैदिक यज्ञ, श्रीराम कथा ज्ञान यज्ञ, श्रीराम भागवत कथा ज्ञान यज्ञ, श्रीराम प्रज्ञा यज्ञ एवं श्रीराम लोक मंथन इन पांच प्रकल्पों में वह विराट आयोजन हुआ जिसमें श्रीराम के दिव्य जीवन व सिद्धांत के अनुरूप राज्य व्यवस्था, शिक्षा व्यवस्था, विकास दृष्टि, समाज व्यवस्था एवं पर्यावरण चेतना जैसे मुद्दो पर विशेषज्ञों ने अपने-अपने शोध पत्र प्रस्तुत किए थे।
हमारा प्रयास रहा कि उत्तर और दक्षिण भारत के लोगों को सांस्कृतिक रूप से जोड़ने में सिद्धाश्रम की भूमिका बढ़े। इसी सोच के तहत दक्षिण से श्रीराम तीर्थ का दर्शन करने के लिए आने वाले दक्षिण भारत के यात्रियों को बक्सर लाने का विशेष प्रयास किया गया। श्रीराम कर्मभूमि न्यास ने स्थानीय मठ-मंदिरों व विभिन्न संस्थाओं के सहयोग से उनके स्वागत व सहयोग का कार्यक्रम तैयार किया था।
सिद्धाश्रम बक्सर को वैश्विक बक्सर बनाने का हमारा संकल्प आगे चलता रहेगा। वामन भगवान की जन्मभूमि के विकास के लिए अनुकूल वातावरण तैयार हो गया है। सिद्धाश्रम बक्सर में पराक्रमी श्रीराम की विराट प्रतिमा निर्माण का संकल्प अभी पूरा नहीं हो सका है। मेरा विश्वास है कि निश्चित समय आने पर परमात्मा की कृपा से वह संकल्प भी पूर्ण होगा। वैसे मुख्यमंत्री श्री सम्राट चौधरी की सरकार ने वामन भगवान की जन्मभूमि को जेल की चहारदीवारी से बाहर निकाल कर सैकड़ों वर्ष पुराने कलंक को मिटा दिया है। अब अनुकूलता की स्थिति है जिसमें अयोध्या व काशी की तरह ही भगवान श्रीराम की अभ्युदय यात्रा का यह आदि तीर्थ अपने प्राचीन गौरव को प्राप्त करेगा।
(बातचीत पर आधारित)
