बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव में 30 साल पुराने गढ़ के ढहने के बाद भाजपा ने अपनी हार का पोस्टमार्टम शुरू कर दिया है। पार्टी की समीक्षा बैठक में माना गया कि वह जन सुराज के संस्थापक प्रशांत किशोर के नैरेटिव का प्रभावी जवाब देने में विफल रही। बांकीपुर की हार के बाद बीते दिन भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष और मुख्यमंत्री की उपस्थिति में हुई कारणों की समीक्षा का लब्बोलुआब यही रहा कि भाजपा बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव में जन सुराज पार्टी के संस्थापक प्रशांत किशोर के नैरेटिव का प्रभावी ढंग से मुकाबला नहीं कर सकी। नतीजा यह हुआ कि पार्टी को इस सीट पर हार का सामना करना पड़ा। लेकिन क्या मात्र यही एक कारण रहा और क्या पार्टी अपनी इस हार से कोई सबक सीखने के मूड में है भी कि नहीं।
सबक नहीं सीखा तो आगे भयंकर परिणाम
दरअसल, बीते दिन पटना के भाजपा कार्यालय में बांकीपुर उपचुनाव में मिली करारी शिकस्त के बाद आयोजित समीक्षा बैठक में यह बात प्रमुखता से सामने आई कि वे लोग जनसुराज के नैरेटिव वार का मुकाबला ठीक से नहीं कर पाए। बैठक में यह भी माना गया कि हाल के वर्षों में यह पार्टी की सबसे बड़ी चुनावी हारों में से एक है। समीक्षा के दौरान यह भी स्वीकार किया गया कि स्थानीय मतदाताओं की नाराजगी और उनके रुझान को समय रहते गंभीरता से नहीं लिया गया, जो हार का एक बड़ा कारण बना। इसके साथ ही समीक्षा बैठक में यह भी बात सामने आया कि 50 से अधिक विधायक जिनको ग्राउंड पर लगाया गया था वो नहीं निकले। हालांकि, बैठक में किसी नेता या पदाधिकारी के खिलाफ कार्रवाई का फैसला नहीं लिया गया, लेकिन समीक्षा रिपोर्ट तैयार कर पार्टी नेतृत्व के पास दिल्ली भेज दी गई है।
कार्यकर्ताओं के फीड बैक पर रिपोर्ट तैयार
बैठक में प्रदेश अध्यक्ष एवं मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी समेत पार्टी के सभी वरिष्ठ पदाधिकारी मौजूद रहे। इस दौरान कार्यकर्ताओं से मिले फीडबैक के आधार पर तैयार समीक्षा रिपोर्ट पेश की गई। रिपोर्ट में माना गया कि पार्टी ने अपने पारंपरिक गढ़ बांकीपुर में मतदाताओं और कार्यकर्ताओं के रुझान को गंभीरता से नहीं लिया। वहीं, जन सुराज पार्टी के संस्थापक प्रशांत किशोर ने अपेक्षाकृत कमजोर संगठन होने के बावजूद अपनी टीम के साथ बेहतर समन्वय स्थापित किया और भाजपा के खिलाफ प्रभावी नैरेटिव खड़ा करने में सफल रहे। समीक्षा में यह भी स्वीकार किया गया कि पार्टी उस नैरेटिव का समय रहते प्रभावी जवाब नहीं दे सकी।
‘कुत्ता-बिल्ली’ विवाद पर चुप्पी रही भारी
बैठक में विशेष रूप से ‘कुत्ता-बिल्ली’ वाले बयान का मुद्दा भी उठा। नेताओं का कहना था कि भाजपा के किसी भी नेता ने ऐसा बयान नहीं दिया था, लेकिन चुनाव प्रचार के दौरान पार्टी इस आरोप का उतनी मजबूती और आक्रामकता से खंडन नहीं कर सकी, जितना किया जाना चाहिए था। नेताओं ने माना कि जिस तरह हार के बाद पार्टी ने इस मुद्दे पर अपना पक्ष मजबूती से रखा, वैसा रुख चुनाव के दौरान अपनाया जाता तो स्थिति अलग हो सकती थी। हालांकि, पटना साहिब के सांसद रविशंकर प्रसाद समेत कई वरिष्ठ नेताओं ने चुनाव प्रचार के दौरान इस आरोप का खंडन किया था, लेकिन समीक्षा बैठक में यह राय सामने आई कि पार्टी का जवाब अधिक आक्रामक और व्यापक होना चाहिए था। बैठक में यह भी चर्चा हुई कि बांकीपुर से भाजपा प्रत्याशी नीरज कुमार सिन्हा को पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन का पूरा समर्थन प्राप्त था। ऐसे में राज्य इकाई प्रचार के दौरान इस मुद्दे को अपेक्षित आक्रामकता के साथ उठाने से कुछ हद तक बचती रही।