नवादा : जिले के रोह प्रखंड में एक चिंताजनक तस्वीर सामने आ रही है। जिस उम्र में बच्चों के हाथों में बल्ला, फुटबॉल और किताबें होनी चाहिए, उस उम्र में कुछ बच्चे सुलेशन, बॉनफिक्स और सिगरेट जैसे नशे की गिरफ्त में आते दिख रहे हैं। गांवों के खेल मैदानों से लेकर खंडहरों और सुनसान बगीचों तक फैलती यह प्रवृत्ति अब अभिभावकों, शिक्षकों और समाज के लिए गंभीर चिंता का विषय बन चुकी है। शाम के समय गांव के खेल मैदानों में बच्चों की किलकारियां और खेलकूद की रौनक दिखनी चाहिए,लेकिन रोह प्रखंड के कई गांवों में तस्वीर बदलती नजर आ रही है।
मैदान के कोनों और सुनसान जगहों पर किशोरों के समूह सिगरेट पीते और सुलेशन-बॉनफिक्स जैसे रासायनिक पदार्थों का सेवन करते दिखाई पड़ रहे हैं। सबसे चिंताजनक बात यह है कि इनमें कुछ बच्चे महज 10 से 12 वर्ष की उम्र के बताए जा रहे हैं। ग्रामीण बताते हैं कि कुछ साल पहले तक शाम होते ही गांव के मैदान बच्चों और युवाओं से भरे रहते थे। क्रिकेट, फुटबॉल और कबड्डी जैसे खेलों में युवाओं की सक्रिय भागीदारी दिखती थी लेकिन अब कई स्थानों पर खेल की जगह नशे ने ले ली है। स्थानीय लोगों का कहना है कि छोटे बच्चे बड़े लड़कों की नकल करते हुए उसी रास्ते पर बढ़ने लगे हैं, जिससे समस्या और गंभीर होती जा रही है।
ग्रामीणों के अनुसार नाबालिग लड़कों को सार्वजनिक स्थानों पर सिगरेट पीते देखना अब आम बात होती जा रही है। कई लोगों ने उन्हें समझाने का प्रयास किया, लेकिन विवाद और टकराव के डर से अधिकांश लोग अब हस्तक्षेप करने से बचते हैं। इस चुप्पी ने समस्या को और गहरा कर दिया है। रोह क्षेत्र के कई गांवों में पुराने जर्जर मकान, खाली भवन और सुनसान बगीचे किशोरों के जमावड़े का केंद्र बनते जा रहे हैं। स्थानीय लोगों का दावा है कि इन जगहों पर अक्सर बच्चों और युवाओं को सुलेशन तथा बॉनफिक्स जैसे पदार्थों का नशा करते देखा जाता है। कम कीमत और आसान उपलब्धता के कारण नाबालिग भी इन पदार्थों तक आसानी से पहुंच जा रहे हैं।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार सुलेशन, बॉनफिक्स और अन्य रासायनिक पदार्थों को लगातार सूंघना शरीर और मस्तिष्क दोनों के लिए बेहद नुकसानदायक हो सकता है। इससे फेफड़ों, तंत्रिका तंत्र और मानसिक विकास पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है। कम उम्र में पड़ने वाली यह लत भविष्य में बड़े नशे की ओर धकेल सकती है। कई अभिभावकों ने नाम नहीं छापने की शर्त पर बताया कि उनके बच्चों के व्यवहार में अचानक बदलाव देखने को मिल रहा है। पढ़ाई में रुचि कम हो रही है, चिड़चिड़ापन बढ़ रहा है और कई बार पैसों को लेकर घर में विवाद भी होने लगे हैं। एक अभिभावक ने कहा कि सबसे ज्यादा पीड़ा तब होती है जब अपना बच्चा गलत रास्ते पर जाता दिखाई देता है और उसे रोकने का कोई प्रभावी उपाय नजर नहीं आता।
रोह प्रखंड में नशा मुक्ति और काउंसलिंग की कोई स्थानीय व्यवस्था नहीं होने की बात सामने आ रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि समय पर परामर्श और उपचार की सुविधा नहीं मिलने से समस्या लगातार बढ़ सकती है। इसके साथ ही स्कूलों, पंचायतों और सार्वजनिक स्थलों पर नशा विरोधी जागरूकता अभियान भी पर्याप्त स्तर पर नहीं दिख रहे हैं। जिम्मेदार कौन? जब गांव के लोग समस्या को महसूस कर रहे हैं, अभिभावक चिंतित हैं और बच्चे धीरे-धीरे नशे की ओर बढ़ रहे हैं, तब कई सवाल खड़े हो रहे हैं। क्या शिक्षा व्यवस्था पर्याप्त जागरूकता पैदा कर पा रही है? क्या स्वास्थ्य विभाग और प्रशासन इस समस्या को गंभीरता से ले रहे हैं? क्या समाज अपनी जिम्मेदारी निभा रहा है?
देश के भविष्य माने जाने वाले बच्चे यदि कम उम्र में नशे की गिरफ्त में आ रहे हैं तो यह केवल कुछ परिवारों की समस्या नहीं, बल्कि पूरे समाज के लिए चेतावनी है। जिस उम्र में बच्चों को खेल, शिक्षा और संस्कारों से जुड़ना चाहिए, उस उम्र में यदि वे नशे की ओर बढ़ रहे हैं तो इसके दूरगामी परिणाम बेहद गंभीर हो सकते हैं। रोह प्रखंड से सामने आ रही यह तस्वीर बताती है कि अब केवल चिंता जताने से काम नहीं चलेगा। प्रशासन, स्कूल, अभिभावक और समाज को मिलकर ठोस पहल करनी होगी, ताकि बचपन को नशे की गिरफ्त से बचाया जा सके और अगली पीढ़ी को सुरक्षित भविष्य दिया जा सके।
भईया जी की रिपोर्ट