प्रशांत रंजन
दि केरल स्टोरी2 अपने शीर्षक के अनुरूप लवजिहाद की उसी बात को आगे बढ़ाती है, जिसे तीन साल पहले दि केरल स्टोरी में सुदीप्तो सेन के शुरू की थी। इस बार एक के स्थान पर तीन अलग कहानियों के माध्यम से यह अपनी बात कहती है। ये तीनों प्रेम कहानियां है, जिनमें एक ही समानता है कि लड़के मुसमान हैं और लड़कियां हिंदू। यही एक समानता पूरी फिल्म की जमीन तैयार करती है।
इन प्रेम कहानियों की शुरुआत मासूमियत से होती है, जैसा कि सभ्यता के पतन पर आधारित सभी नैतिक कहानियों में होता है। जोधपुर में एक लड़की नाच रही है और एक आदमी उसकी तारीफ करते हुए वीडियो बना रहा है। वह उसे शादी का प्रस्ताव देता है। वह उसके धर्म को पुरानी देवी-देवता पूजा बताकर उसकी आलोचना करता है। वह एक्साइटिंग वीडियो के ज़रिए धन-दौलत का वादा करता है। इन्फ्लुएंसर लड़की अपने माता-पिता से कहती है, “मेरे फोन को मत छुओ। यह मेरी निजता है। यह मेरा करियर है।” कोच्चि में एक शादीशुदा आदमी अपनी प्रेमिका को भरोसा दिलाता है कि वह अपनी पत्नी को तलाक दे देगा और वह “धर्म परिवर्तन जैसी बातों में विश्वास नहीं करता।” जबलपुर में एक मुसलमान युवक हिंदू होने का नाटक करता है, और उस हिंदू युवती के साथ खड़े होने का वादा करता है जो भाला फेंक खेल में भारत का प्रतिनिधित्व करना चाहती है।
फिर सच्चाई सामने आती है कि हर एक मुस्लिम पुरुष पात्र एक सोची-समझी साज़िश का हिस्सा है। यह फ़िल्म अपने पूरे कथानक में कभी डिप्लोमैटिक नहीं होना चाहती और इसलिए एक भी किरदार ‘सच्चा मुसलमान’ वाला रखने में विश्वास नहीं करती है। एक भी ऐसा मुस्लिम किरदार नहीं दिखाती जिसमें कोई हिचक, कोई पेचीदगी या कोई इंसानियत हो। फिल्म मोटे और ठेठ ढंग से एक ऐसी दुनिया के बारे में बताती है जहाँ हर मुस्लिम— चाहे वह मर्द हो, औरत हो या बुज़ुर्ग—एक ऐसी खतरनाक साज़िश का पुर्जा है जो उन महत्वाकांक्षी, बेबाक हिंदू लड़कियों को निशाना बनाती है, और उन पिताओं को भी, जिन्होंने उन पर भरोसा करने की हिम्मत की।
उनमें से एक युवक एक कार्यालयनुमा स्थान पर मिशनरत दिखाई देता है। कार्यालय की दीवार पर ‘गज़वा-ए-हिंद 2047’ के बैनर चस्पा हैं। नक्शे हैं। रणनीति पर चर्चा है। बिना कोई भाव दिखाए बोले गए संवाद: “हम एक भी कुंवारी हिंदू लड़की को नहीं छोड़ेंगे।” “2047 तक भारत में शरिया लागू हो जाएगा।” “हम यूरोप की जनसांख्यिकी बदल रहे हैं।” वहाँ रेट कार्ड भी हैं। एक दलित महिला के लिए छह लाख। एक ब्राह्मण के लिए बारह लाख। यानी संकेतों के माध्यम से भी फिल्म कई जगह बात कहती है।
हिंदू लड़कियों को पीटा जाता है, बलात्कार किया जाता है, कैद किया जाता है, जबरन गोमांस खिलाया जाता है, बांधा जाता है, वेश्यावृत्ति के लिए मजबूर किया जाता है और यहां तक कि मार भी डाला जाता है। इस दुनिया में मुस्लिम महिलाएं मूकदर्शक नहीं हैं। वे उत्साहपूर्वक इसमें शामिल हैं। वे यातना पर मुस्कुराती हैं। वे संगठित रूप से बुर्का पहनकर भागने के रास्ते रोक देती हैं। कोई रिश्तेदार नहीं है जो विरोध करे। कोई पड़ोसी नहीं है जो सतर्क रहे। बस एक सुनियोजित, योजनाबद्ध क्रूरता है।
इस बीच माता-पिता बेबस होकर हाथ-पैर मारते हैं। वे पुलिस के पास जाते हैं। वकीलों के पास। वे अपनी बेटी के नाबालिग होने का सबूत देने वाले डॉक्यूमेंट दिखाते हैं। जवाब? “कानून, यानी धर्म बदलने का संवैधानिक अधिकार, उनके साथ है।” लगता है, डेमोक्रेसी भी इस साज़िश में शामिल है। दूसरे हिंदुओं को इकट्ठा करने की कोशिशें पहले तो नाकाम हो जाती हैं। “हिंदू हज़ार साल से बंटे हुए हैं,” मतलब: एकता की बहुत ज़रूरत है। मुसलमानों के खिलाफ़ एकजुट हों।
तीन वर्ष पूर्व जब दि केरल स्टोरी आई थी, तो मुट्ठीभर वामपंथी गिरोह के लोगों ने उस प्रोपैगैंडा कहकर कॉर्नर करना चाहा था, लेकिन निर्देशक सुदीप्तो सेन व निर्माता विपुल शाह ने ताल ठोककर न केवल साक्ष्य प्रस्तुत किए थे, बल्कि वितंडा कर रहे लोगों को फिल्म के खिलाफ अदालत में जाने की चुनौती दी थी। ऊपर से मात्र 15 करोड़ रुपए में बनी उस फिल्म ने 20 गुना अधिक कमाई कर निर्माता—निर्देशक के विश्वास को पुष्ट किया था, साथ ही साथ विरोधियों को करारा जवाब भी मिल गया था। अब इसके सीक्वल यानी ‘दि केरल स्टोरी2’ में भी लगभग यही पैटर्न देखने को मिला। बल्कि रिलीज के पहले इस फिल्म को अदालती चक्कर भी काटने पड़े। सीक्वल में निर्माता विपुल शाह ने निर्देशन का दायित्व कामख्या नारायण सिंह को दिया।
इस सीक्वल को पहली फ़िल्म से ज़्यादा व्यापक बनाने का प्रयास हुआ। इसलिए तीन भिन्न पात्रों के स्वतंत्र कहानियां रखी गईं और तीनों में लवजिहाद के वैचारिक नरेटिव के धागे में पिरोया गया। लेकिन, दुर्भाग्य से बड़ा बनाने का प्रयास फिल्म को बौनी बनाकर रख दी। वैचारिक नरेटिव का यह धागा एक मनका बनाने के बजाय त्रिकोण बना गई और एक सामुच्य के रूप में फिल्म बिखर गई। तीनों पात्रों के हर चरण को तीन बार दिखाने एक पर्दे पर एकरसता उत्पन्न होती है। इससे पटकथा में कसावट कम हो गई। पहले भाग में सुदीप्तो सेन ने एक ही कथा को पूरी फिल्म का अभिकेंद्र बनाए रखा था और इसी कारण तमाम विरोध के बावजूद वह फिल्म 300 करोड़ रुपए पीट लिए था। नवेले निर्देशक कामख्या नारायण सिंह इस मामले में चूक गए। इसका बैकग्राउंड स्कोर ज़्यादा दमदार है। डार्क मूड के लिए कलर टोन का उपयोग तार्किक है।
इसमें गुस्सा ज़्यादा बेहतर ढंग से पेश किया गया है। बुलडोज़र सिक्वेंस उस गुस्से का आदर्श है। दोनों ही फ़िल्मों में, इल्ज़ाम चुपके से और फिर ज़ोर-शोर से खुद हिंदू परिवारों पर ही डाल दिया जाता है। लड़कियां इसलिए जाल में फंस जाती हैं, क्योंकि उन्हें अपने धर्म की शिक्षा मज़बूती से नहीं दी गई थी। क्योंकि उनके पिता बहुत ज़्यादा खुले विचारों वाले थे। क्योंकि उनके घर परंपराओं से बहुत ज़्यादा कटे हुए थे। हालांकि इन विसंगतियों के बावजूद फिल्म अपने तरीके से समाधान देती है, जब बुलडोज़र अपनी ज़ोरदार एंट्री करता है, मुस्लिम अपराधियों को पुलिस थानों में बेरहमी से पीटा जाता है। “हिंदू समाज जाग उठा है,” फ़िल्म ऐलान करती है। संगठित होइए। एकजुट होइए। ताल ठोककर यही संदेश फिल्म देती है।