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देश-विदेश

भारतीय संस्कृति का प्राणतत्त्व है योग : कुलपति

Amit Dubey
Last updated: June 22, 2026 12:57 pm
By Amit Dubey 298 Views
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7 Min Read
योग दिवस, भारतीय संस्कृति, प्राणतत्त्व, योग, कुलपति, संस्कृत विवि
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भारतीय संस्कृति की अनादि परंपरा में योग केवल शारीरिक व्यायाम नहीं, बल्कि जीवन को संतुलित, अनुशासित और आध्यात्मिक ऊंचाइयों तक ले जाने वाली समग्र जीवन-पद्धति है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसी योग-दर्शन को वैश्विक मंच पर प्रतिष्ठित करते हुए इसे विश्वकल्याण के आंदोलन का स्वरूप प्रदान किया है। उनके सतत प्रयासों के परिणामस्वरूप अंतरराष्ट्रीय योग दिवस आज विश्वभर में मानव स्वास्थ्य, मानसिक शांति और सांस्कृतिक समन्वय का प्रतीक बन चुका है। योग के माध्यम से भारत ने एक बार पुनः विश्व को “सर्वे भवन्तु सुखिनः” का संदेश दिया है। ये बातें अंतरराष्ट्रीय योग दिवस पर आयोजित योगा कार्यक्रम में लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विवि के कुलपति ने कही। एलबीएस संस्कृत विवि एवं संस्कृत अकादमी दिल्ली सरकार के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित “स्वस्थ आयु के लिए योग” आयोजन में बड़ी संख्या में लोगों ने भाग लिया।

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कार्यक्रम की अध्यक्षता एलबीएस संस्कृत विवि के कुलपति प्रो मुरलीमनोहर पाठक ने की। अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में प्रो. पाठक ने कहा कि योग भारत की ऋषि-परंपरा का ऐसा अमूल्य उपहार है, जो मानव जीवन को शारीरिक स्वास्थ्य, मानसिक संतुलन और आत्मिक ऊर्जा प्रदान करता है। उन्होंने योग के इतिहास, उसके दार्शनिक आधार, वैज्ञानिक महत्व तथा व्यावहारिक उपयोगिता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि वर्तमान समय की जटिल जीवनशैली, तनाव और स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों के बीच योग मानवता के लिए आशा का सबसे विश्वसनीय मार्ग बनकर उभरा है। उन्होंने विद्यार्थियों और युवाओं का आह्वान करते हुए कहा कि योग को केवल एक दिवस का उत्सव न मानकर जीवन का स्थायी संस्कार बनाया जाए। उन्होंने संस्कृत और योग को भारतीय ज्ञान-परंपरा के दो ऐसे स्तंभ बताया जो मानवता को संतुलित और मूल्यनिष्ठ जीवन का मार्ग दिखाते हैं।

कार्यक्रम के मुख्य वक्ता एवं स्वदेशी जागरण मंच के अखिल भारतीय सह-संगठन मंत्री श्री सतीश कुमार ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि योग दीर्घायु, निरोगी जीवन और स्वस्थ समाज की आधारशिला है। उन्होंने कहा कि आज संयुक्त राष्ट्र के सदस्य देशों सहित विश्व के अधिकांश राष्ट्र योग दिवस मना रहे हैं, जो भारत की सांस्कृतिक शक्ति और आध्यात्मिक विरासत की वैश्विक स्वीकृति का प्रमाण है। उन्होंने कहा कि योग केवल स्वास्थ्य का विषय नहीं, बल्कि राष्ट्र की आर्थिक, सामाजिक और मानवीय शक्ति को सुदृढ़ करने का माध्यम भी है। उनके अनुसार, बढ़ती स्वास्थ्य समस्याओं और महँगी चिकित्सा व्यवस्था के युग में योग सबसे सरल, सुलभ और प्रभावी उपाय है।

इस मौके पर कुलसचिव प्रो. पवन कुमार शर्मा ने योग के शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक लाभों का उल्लेख करते हुए कहा कि योग व्यक्ति के व्यक्तित्व को संतुलित, सकारात्मक और अनुशासित बनाता है। उन्होंने नियमित योगाभ्यास को स्वस्थ जीवन की अनिवार्य आवश्यकता बताया।वित्त अधिकारी श्री संतोष कुमार श्रीवास्तव ने अपने संबोधन में कहा कि स्वस्थ शरीर ही जीवन की वास्तविक पूँजी है। योग इस अमूल्य पूँजी की सुरक्षा का सर्वोत्तम माध्यम है तथा प्रत्येक व्यक्ति को इसे अपने दैनिक जीवन का अंग बनाना चाहिए।

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गुरुकुल रावलधाम, बहरोड़ (राजस्थान) के स्वामी सच्चिदानंद सरस्वती ने योग और स्वास्थ्य के आध्यात्मिक पक्ष को स्पष्ट करते हुए कहा कि योग केवल शरीर को नहीं, बल्कि मन और आत्मा को भी परिष्कृत करता है। उन्होंने कहा कि योग आत्मानुशासन, संयम और आत्मबोध का मार्ग है। दिल्ली विश्वविद्यालय की प्रो. लक्ष्मी मिश्रा ने विद्यार्थियों के जीवन में योग की भूमिका पर प्रकाश डालते हुए कहा कि नियमित योगाभ्यास से स्मरणशक्ति, एकाग्रता, मानसिक क्षमता और आत्मविश्वास में उल्लेखनीय वृद्धि होती है। उन्होंने युवाओं को योग अपनाने की प्रेरणा दी।गुरुकुल गौतम नगर के प्रधानाचार्य आचार्य योगेश कुमार ने योग को भारतीय संस्कृति का प्राणतत्त्व बताते हुए कहा कि योग व्यक्ति को अपने वास्तविक स्वरूप से परिचित कराता है और जीवन में संतुलन स्थापित करता है। राजस्थान विश्वविद्यालय के विजिटिंग फैकल्टी सदस्य निपुण ने कहा कि योग ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की सांस्कृतिक प्रतिष्ठा को नई ऊँचाइयाँ प्रदान की हैं। उन्होंने योग को विश्व समुदाय के लिए भारत की सबसे महत्वपूर्ण सांस्कृतिक देन बताया। शैलजानंद मिश्र ने पतंजलि योगसूत्रों के महत्व को रेखांकित करते हुए कहा कि योग का वास्तविक स्वरूप अनुशासित जीवन, आत्मसंयम और उच्च मानवीय मूल्यों से जुड़ा हुआ है।आचार्य सुंदर शास्त्री ने योग के महत्व को सांस्कृतिक और आध्यात्मिक भावभूमि से जोड़ते हुए अपने भजन के माध्यम से उपस्थित जनसमूह को भारतीय संस्कृति की गहन अनुभूति कराई।

कार्यक्रम के आयोजक, छात्र कल्याण अधिष्ठाता एवं योग विज्ञान विभागाध्यक्ष प्रो. मार्कण्डेय नाथ तिवारी ने अपने उद्बोधन में कहा कि योग को जन-जन तक पहुँचाना समय की आवश्यकता है। उन्होंने योग को स्वस्थ, जागरूक और आत्मनिर्भर समाज के निर्माण का आधार बताया।कार्यक्रम के सफल आयोजन में डॉ. हर्ष शुक्ला, प्रियंका पाण्डेय तथा कलावती आर्य का उल्लेखनीय योगदान रहा। धन्यवाद ज्ञापन डॉ. हरि राम मीणा ने प्रस्तुत किया तथा कार्यक्रम का संचालन एवं संयोजन डॉ. रमेश कुमार ने प्रभावपूर्ण ढंग से संपन्न किया। इस अवसर पर विश्वविद्यालय के शिक्षकगण, अधिकारी, कर्मचारी, शोधार्थी एवं विद्यार्थी बड़ी संख्या में उपस्थित रहे। इस कार्यक्रम में विश्वविद्यालय के सहायक अभियंता श्री अजनी कुमार राय की विशेष उपस्थिति रही।यह आयोजन केवल अंतरराष्ट्रीय योग दिवस का उत्सव नहीं था, बल्कि भारतीय ज्ञान-परंपरा, सांस्कृतिक चेतना और वैश्विक मानव कल्याण के प्रति भारत की प्रतिबद्धता का सशक्त उद्घोष था। कुलपति प्रो. मुरलीमनोहर पाठक के दूरदर्शी नेतृत्व में आयोजित यह कार्यक्रम इस सत्य को पुनः स्थापित करने में सफल रहा कि योग केवल भारत की विरासत नहीं, बल्कि सम्पूर्ण मानवता के उज्ज्वल भविष्य का पथप्रदर्शक है।

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