हाल ही में संपन्न बांकीपुर विधानसभा क्षेत्र के चुनाव परिणाम ने पूरे भारत में यह संदेश दिया है कि भारतीय लोकतंत्र में जनता मालिक है, बंधुआ मजदूर नहीं। जनता मालिक को जो संदेश देना था वह दे दिया, उस संदेश का अलग—अलग मतलब निकाला जा रहा है। यह चुनाव परिणाम लोतांत्रिक व्यवस्था में चुनाव को पश्चिमी चश्में से देखने व उसके अनुसार जीत—हार की रणनीति तैयार करने के पेशे में दक्ष माने जाने वाले नए राजनीतिक खिलाड़ी प्रशांत किशोर के लिए एक अवसर जैसा है। इस अवसर का उपयोग ये अपने तरीके से करने लगे हैं।

नौकरशाहों के साथ फोटो से ब्रांडिंग
विधायक पीके ने बिहार की राजधानी पटना की ट्रैफिक की समस्या को लेकर पिछले दिनों पुलिस महानिदेशक और मुख्य सचिव जैसे अधिकारियों से मिले थे। कल वे पटना की समस्या को सुधारने के लिए योजना पर विमर्श के लिए एकसाथ कई बड़े अधिकारियों से मिले। उसका फोटो जारी किया और इसके बाद जो नैरेटिव गढ़ने का अभियान सोशल मीडिया पर चलाया जा रहा है उसकी ध्वनि यह है कि पीके बिहार के सभी नेताओं से अलग बहुत महान और क्षमतावान हैं।
छवि गढ़ने ओर श्रेय लेने के इस अति के कारण पटना की स्थिति सुधारने के इस प्रयास के बीच में ही दुर्घटनाग्रस्त हो जाने की आशंका है। क्योंकि, सरकार की टेंढ़ी नजर होते ही सारे अधिकारी उनसे दूरी बनान लगेंगे। पीके को जानने वाले कहते हैं कि वे जिस पेशे से राजनीति में आये हैं वहां व्यक्ति का चेहरा चमकाना उसके स्वभाव का अंग हो जाता है।
डाटा का खेल नहीं राजनीति
किसी राजनीतिक दल के लिए चुनावी रणनीति तैयार करना, डाटा के आधार पर योजना बनाना, चुनाव के समय तेजी से बदल रहे माहौल में सूचनाओं को एकत्रित करना और उनका मतदाताओं का मन बदलने में उपयोग करना, मनगढ़ंत नैरेटिव या किसी के कथन की मिसकोटिंग जैसी बातों से चुनाव को प्रभावित करने जैसी क्रियाओं में दक्ष बड़ी टीम का नेतृत्व करने वाले प्रशांत किशोर अब स्वयं राजनीति में उतर चुके हैं। राजनीति केवल डाटा विश्लेषण और ब्रांडिंग का खेल नहीं बल्कि संगठन शिल्प के आधार पर लोकसंग्रह व लोक की सामूहिक शक्ति के प्रकटीकरण की कला भी है। जिसमें कार्यकर्ता की मुख्य भूमिका होती है। पीके की जनसुराज नामक पार्टी में कार्यकर्ता नहीं बल्कि पेउ स्टाफ होते हैं। भारत जब पूरी तरह से अमेरिका या पश्चिमी देशों के रंग में रंग जायेगा तब पेड स्टाफ के बल पर पार्टियां सता में आयेंगी। शायद अभी दिल्ली दूर है।
बीजेपी के गढ़ में जीत
बिहार विधान सभा चुनाव 2025 में प्रशांत किशोर की पार्टी जन सुराज 238 सीट पर लड़ी और 236 सीट पर उसकी जमानत जब्त हो गई। लोग कहने लगे थे कि पीके की राजनीति खत्म, अब बिहार छोड़ देगा। परंतु 9 महीने बाद 2026 में बांकीपुर उपचुनाव में पीके ने भारतीय जनता पार्टी को उसके सबसे सुरक्षित गढ़ यानी बांकीपुर में 19 हजार से अधिक वोटों से हरा दिया।

भाजपा को सबक सीखने में मिली जीत
बांकीपुर की जनता ने पीके की लोकप्रियता की वजह से उन्हें वोट नहीं दिया। बल्कि बांकीपुर की जनता ने उस बीजेपी को सबक सिखाने के लिए वोट दिया जो अपनी रीति—नीति से भटककर एक इवेंट कंपनी जैसा व्यवहार करने लगी है। बीजेपी को अपने कंघे पर बैठाकर यहां तक पहुंचाने वाले उसके समर्थकों व शुभचिंतकों को ऐसा लगने लगा कि यह राजनीतिक दल अपने जनता मालिक को अपना बंधुआ मजदूर समझने की भूल करने लगा है। विकल्पहीनता में वे पीके को अपना वोट देने के लिए मजबूर हुए।
जनता के मूढ को भांपने में चतुर पीके की टोली ने —’कुत्ता-बिल्ली को भी खड़ा कर देंगे तो जीत जाएंगे’ वाले बयान को वायरल कराया। पीके के लोग इसे परिणाम का एक बड़ा कारण मान सकते हैं, लेकिन सच्चाई यह है कि लोगों ने इस चुनाव के माध्यम से भाजपा नेतृत्व को एक संदेश देने का निर्णय ले लिया था। इसका लाभ पीके को मिला।
प्रशांत किशोर अब बिहार विधान सभा के सदस्य हैं। बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के दौरान वे बिहार की समस्या और बेरोजगारी दूर करने, अपना और अपने बच्चों का भविष्य सुरक्षित करने के नाम पर जन सुराज को वोट देने की अपील कर रहे थे। हड़बड़ी में उन्होंने 10 हजार लोगों को नौकरी देने की बात कही है। कुछ माह में ही उनके इस घोषणा पर लोग विचार करने लगेंगे।

बिहार की जनता बेवकूफ नहीं है। 2025 में पीके को हराया। बांकीपुर उपचुनाव 2026 में बीजेपी को हराया। बीजेपी को हराने में पीके जीत गए। असली परीक्षा अब है, क्या 10 हजार युवा को नौकरी दिला पायेंग? समस्या समाधान का उनकी योजना परिणाम तक पहुंचेगी? यदि नहीं तो भविष्य आज ही स्पष्ट है।
