नवादा : दीपावली का त्योहार नजदीक आते ही जिले में रौनक बढ़ने लगी है। बाजारों में खरीदारी की तैयारी है, तो दूसरी ओर स्थानीय कुम्हार और मूर्तिकार अपने हुनर से त्योहार को खास बनाने में जुटे हैं। कोई मिट्टी के दीये तैयार कर रहा है, तो कोई लक्ष्मी-गणेश की आकर्षक मूर्तियों को अंतिम रूप दे रहा है। आधुनिक दौर में चाइनीज लाइट और मशीन से बने सामान की बढ़ती मांग के बीच जिले के कारीगर अपनी पारंपरिक कला को बचाए रखने की कोशिश कर रहे है।

शंकर पंडित और उनकी पत्नी सरिता देवी मिट्टी के दीये बनाने में जुटे हैं। दोनों पारंपरिक तरीके से हाथों से दीये तैयार करते हैं। सरिता देवी इन दीयों को लेकर मोहल्ले और आसपास के घरों तक पहुंचती हैं, ताकि लोग सीधे उनसे खरीदारी कर सकें। वह 80 रुपये प्रति सैकड़ा की दर से दीये बेच रही हैं। उनका प्रयास है कि कम कीमत पर हर परिवार तक मिट्टी के दीये पहुंचें और दीपावली पर घरों में पारंपरिक रोशनी हो। आधुनिक सजावटी लाइटों के बीच उनका यह काम मिट्टी के दीयों की परंपरा को बनाए रखने की कोशिश है।
राज मूर्ति कला केंद्र भी दीपावली की तैयारियों में व्यस्त है। गणेश पंडित की ओर से संचालित इस केंद्र की शुरुआत वर्ष 2008 में हुई थी। यहां तैयार होने वाली मूर्तियों की मांग प्रखंडों और झारखंड के कोडरमा तक है। केंद्र में ग्राहकों के बजट के अनुसार मूर्तियां उपलब्ध हैं। यहां 10 रुपये से लेकर 1100 रुपये तक की मूर्तियां थोक दर पर मिल रही हैं। यही वजह है कि त्योहार के मौके पर खुदरा और थोक खरीदार यहां पहुंच रहे हैं।
पुराने बस स्टैंड से बाजार रोड की ओर स्थित कुम्हारटोली में भी मूर्तिकारों के यहां काम तेजी से चल रहा है। प्रदीप कुमार, कृष्णा पंडित, सुरेंद्र पंडित, अनिल पंडित, पूनम देवी, सचिन पंडित, दयानंद पंडित और अजय पंडित लक्ष्मी-गणेश की छोटी-बड़ी मूर्तियां तैयार कर रहे हैं। कारीगरों ने बताया कि मूर्तियां 2 हजार से 20 हजार रुपये तक की कीमत में तैयार की जा रही हैं। यह काम उनके परिवारों में पीढ़ियों से होता आ रहा है। उपरटंडा, हरदिया, कुम्हरुआ, चौथा, मलियातरी, दिबौर और धमनी समेत कई इलाकों के पूजा पंडालों से मूर्तियों के ऑर्डर मिले हैं। अब उन्हें अंतिम रूप देने का काम चल रहा है।

जिले के कुम्हारों और मूर्तिकारों के लिए दीपावली सिर्फ एक त्योहार नहीं, बल्कि सालभर की मेहनत का फल पाने का अवसर भी है। दीये और मूर्तियां तैयार करने से इन परिवारों की आजीविका जुड़ी है। साथ ही उनकी कला स्थानीय परंपरा को भी आगे बढ़ा रही है। बाजारों में आधुनिक सजावटी सामान की मौजूदगी के बावजूद ये कारीगर मिट्टी और अपने हाथों के हुनर पर भरोसा बनाए हुए हैं। उनके बनाए दीये और मूर्तियां घरों व पूजा पंडालों की सजावट का हिस्सा बनेंगी। इससे स्थानीय कारीगरों को काम और आमदनी मिलेगी, वहीं जिले की पारंपरिक कला को भी नई पहचान मिलेगी।
भईया जी की रिपोर्ट

