बाढ़ (पटना) ।। सत्यनारायण चतुर्वेदी ।। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की कर्मभूमि और अतिप्राचीन अनुमंडल बाढ़ में शहीदों के सम्मान में आयोजित कार्यक्रम “एक शाम शहीदों के नाम” महज एक सरकारी खानापूरी बनकर रह गया। अनुमंडल प्रशासन द्वारा पानी की तरह पैसा बहाने के बावजूद नगर के ‘सबेरा सिनेमा हॉल’ में आयोजित इस कार्यक्रम में जनता, बुद्धिजीवियों और पत्रकारों की अनुपस्थिति ने प्रशासन के दावों की पोल खोल कर रख दी है। स्थिति यह थी कि लाखों खर्च कर बाहर से बुलाए गए कलाकारों के सामने श्रोताओं के अभाव में खाली कुर्सियां प्रशासन के कुप्रबंधन पर सवाल खड़े कर रही थीं।
शहीदों के सम्मान में आयोजित इस भव्य शाम के लिए प्रशासन ने नोडल पदाधिकारियों की तैनाती की थी और भारी भरकम बजट खर्च किया था। लेकिन संवादहीनता और प्रचार-प्रसार के अभाव के कारण हॉल में सन्नाटा पसरा रहा। स्थानीय लोगों का आरोप है कि प्रशासन कुछ गिने-चुने लोगों के प्रभाव में आकर जमीनी कार्यकर्ताओं और पत्रकारों की अनदेखी कर रहा है, जिससे सरकारी आयोजनों का उपहास उड़ रहा है।
नगर परिषद के सभापति संजय कुमार उर्फ गायमाता ने प्रशासन पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि उन्हें इस कार्यक्रम की सूचना तक नहीं दी गई। उन्होंने सवाल उठाया कि जब नगर के प्रथम नागरिक को ही आमंत्रित नहीं किया गया, तो आम जनता तक सूचना कैसे पहुँचती? यह शहीदों के प्रति प्रशासनिक उदासीनता और अहंकार का जीता-जागता प्रमाण है।
संयोगवश उसी दिन क्षेत्र के नामचीन विधायक अनंत कुमार सिंह उर्फ छोटे सरकार जेल से बाहर आने के बाद जनता से मिलने निकले थे। उनके काफिले में जहां 250 से अधिक गाड़ियां और हजारों की स्वतः स्फूर्त भीड़ उमड़ी, वहीं दूसरी ओर अनुमंडल प्रशासन शहीदों के नाम पर मुट्ठी भर लोग भी जुटा पाने में असमर्थ रहा। यह तुलना क्षेत्र में चर्चा का विषय बनी हुई है कि एक तरफ जनसमर्थन का सैलाब था और दूसरी तरफ सरकारी तंत्र की विफलता।
स्थानीय नागरिकों और पत्रकारों का कहना है कि अनुमंडल प्रशासन और एनटीपीसी प्रबंधन जैसे संस्थान अक्सर पीएम, सीएम और मंत्रियों के नाम का हवाला देकर सूचनाएं साझा करने में लोकतंत्र के चौथे स्तंभ (मीडिया) को दरकिनार कर देते हैं। बिना किसी पूर्व तैयारी बैठक या जन-संवाद के आयोजित इस कार्यक्रम ने शहीदों के सम्मान को बढ़ाने के बजाय उसे हास्यास्पद बना दिया। सरकारी धन का यह दुरुपयोग निंदनीय है। जब जनता और स्थानीय जनप्रतिनिधियों को ही इस गौरवशाली कार्यक्रम से नहीं जोड़ा गया, तो ऐसे भव्य आयोजन का अर्थ ही क्या रह जाता है?
सत्यनारायण चतुर्वेदी की रिपोर्ट