नवादा : बिहार की राजनीति इस समय एक बहुत बड़े मोड़ पर खड़ी है। हाल के घटनाक्रमों ने ऐसे सवाल खड़े कर दिए हैं कि किसी को समझ नहीं आ रहा कि कौन किसके साथ है और आने वाले दिनों में राजनीति किस करवट बैठेगी। एक तरफ राजपूत समाज के बड़े नेता आनंद मोहन जी का जेडीयू को लेकर खुला रुख सामने आ रहा है, तो दूसरी तरफ भूमिहार समाज के बड़े नेता अनंत सिंह जी भी बागी तेवर में दिखाई दे रहे हैं। अनंत सिंह जी ने जेडीयू के ही उम्मीदवार नीरज कुमार के खिलाफ खुलकर जन सुराज के अनुज सिंह का समर्थन किया है।

इस विवाद को सुलझाने की जिम्मेदारी संजय झा जी ने ललन सिंह पर थोप दिया है। अब सवाल यह है कि क्या यह सिर्फ दो नेताओं के बीच का विवाद है या जेडीयू के अंदर कुछ बड़ा बदलाव चल रहा है? क्या ललन सिंह जी के युग का अंत होने वाला है? क्योंकि अगर अनंत सिंह और आनंद मोहन जैसे बड़े चेहरे एक साथ एक दिशा में निकलते हैं, तो निश्चित रूप से बिहार की सवर्ण राजनीति के समीकरणों पर उसका असर पड़ सकता है। लेकिन इसका वास्तविक राजनीतिक असर कितना होगा, यह आने वाला समय ही बताएगा। दूसरा बड़ा सवाल—क्या अब वह जेडीयू बची है, जिसे नीतीश कुमार जी ने इतने वर्षों तक अपने तरीके से चलाया? क्या नीतीश कुमार जी वाली जेडीयू अब धीरे-धीरे बदल रही है?
और अब सबसे बड़ा सवाल—क्या निशांत कुमार जेडीयू को संभाल पाएंगे या आने वाले समय में पार्टी के भीतर कोई नया राजनीतिक समीकरण बनेगा? निशांत कुमार की सक्रियता भी हाल के दिनों में बढ़ी है। राजनीति में चर्चाएं तो बहुत होती हैं। टिकट और मंत्री पद को लेकर भी तरह-तरह की बातें और आरोप सुनने को मिलते हैं, लेकिन जब तक कोई ठोस प्रमाण सामने न हो, उन्हें सच मान लेना ठीक नहीं होगा।
फिलहाल इतना जरूर है कि जेडीयू के अंदर अनंत सिंह-नीरज कुमार विवाद ने पार्टी की अंदरूनी राजनीति को चर्चा के केंद्र में ला दिया है। अब देखना दिलचस्प होगा कि आने वाले दिनों में जेडीयू अपने पुराने समीकरणों को संभालती है, नेतृत्व का नया चेहरा सामने आता है, या फिर बिहार की राजनीति में कोई ऐसा बड़ा बदलाव होता है जिसकी आज सिर्फ चर्चा हो रही है। बिहार की राजनीति है साहब… यहां कब कौन किसके साथ खड़ा हो जाए, कोई नहीं जानता।

भईया जी की रिपोर्ट
