नवादा : जैन समाज के प्रतिनिधि दीपक जैन ने बताया कि जैन धर्मावलंबियों का महापर्व पर्युषण एवं क्षमावाणी आत्मशुद्धि एवं विश्व बंधुत्व की भावना की आत्मसात करने का संकल्प लेने का पर्व है, लेकिन इस महापर्व का आयोजन अपने मूल उद्देश्यों से जुदा रहा। उन्होंने बताया कि आयोजन के नाम पर पूर्व की भांति सिर्फ परंपराओं का निर्वहन किया गया।
आत्मशुशुद्धि एवं विश्व बंधुत्व की भावना को अपने व्यवहारिक जीवन में आत्मसात करने के पवित्र संकल्प के बजाय इस आध्यात्मिक अनुष्ठान के दौरान भी सामाजिक षड्यंत्र, विद्वेष, घृणा, ईर्ष्या व अहंकार जैसे मानसिक विकारों व कलुषताओं से घिरे रहे। षड्यंत्र के तहत बगैर सर्व सहमति के बहुमत का रॉब दिखा। धार्मिक मान्यताओं के अनुरूप वर्षों से संचालित पूजा पद्धति में न केवल बदलाव किया गया, बल्कि प्रभावित सामाजिक लोगों पर इस अमान्य परंपरा को जबरन थोप। उनकी धार्मिक आस्था को ठेस भी पहुंचाई गई।
इस दौरान हृदय के काले तथाकथित सामाजिक और धार्मिक ठेकेदारों में मानसिक कलुषता शिद्दत से हावी रही। दीपक जैन ने कहा कि सत्य की नैया कभी नहीं डूबती। उन्होंने मान्यताओं का चोला पहन धार्मिक और सामाजिक विकार व कलुषता फैलाने वाले तथाकथित धार्मिक व सामाजिक ठेकेदारों से पर्वराज ‘पर्युषण व क्षमावाणी’ के मूल उद्देश्यों को आत्मसात कर अपने काले हृदय की निर्मल करने की सलाह दी है।
भईया जी की रिपोर्ट