नीतीश कुमार एनडीए के निर्विवाद नेता हैं। उन्होंने अपनी इच्छा से खुद बिहार के सीएम का पद छोड़ा था। उनको ऐसा करने के लिए बीजेपी ने नहीं कहा था। बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने बीते दिन हुए एक कार्यक्रम के दौरान ये खुलासा करते हुए विपक्षी दलों की ओर से सरकार बदलने की कोशिश और इसको लेकर लगाई जा रही अटकलों का साफ—साफ जवाब दिया। मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने स्पष्ट कहा कि नीतीश कुमार ने अपनी इच्छा से सीएम पद से इस्तीफा दिया था। उन्हें ऐसा करने के लिए कहा नहीं गया था और न ही उन पर ऐसा कोई दबाव था। पटना में बीती शाम हुए एक मीडिया इवेंट में उन्होंने आगे कहा कि नीतीश कुमार भले ही अब राज्यसभा सांसद हैं, लेकिन अब भी वह बिहार एनडीए के निर्विवाद और सर्वमान्य नेता हैं और इस बात को लेकर किसी तरह का विवाद नहीं है।

सम्राट चौधरी ने कहा कि नीतीश कुमार ने अपनी मर्जी से सीएम पद छोड़ा था। हमने उन्हें ऐसा करने के लिए नहीं कहा। नीतीश यह मानते थे कि अटल बिहारी वाजपेयी ने ही उन्हें पहली बार सीएम बनने का मौका दिया। जबकि भाजपा के विधायकों की संख्या उनसे अधिक थी। अब उसी तरह का भाव नीतीश कुमार ने जताया है। वर्ष 2000 में जब पहली बार नीतीश कुमार सीएम बने थे तो किसी को बहुमत नहीं मिला था। तब भाजपा ने समर्थन दिया और नीतीश कुमार सीएम बने थे। तब उनकी समता पार्टी होती थी, लेकिन बहुमत साबित न हो पाने के चलते यह सरकार एक सप्ताह तक ही चल सकी। भाजपा ने नीतीश कुमार का हमेशा समर्थन किया है और वह भी हमेशा साथ रहे।
मुख्यमंत्री ने कहा कि नीतीश कुमार का आशीर्वाद तो लालू यादव की आरजेडी को भी मिला था। लालू यादव यदि बिहार का सीएम बने तो इसके लिए भी उन्हें भाजपा का आभारी होना चाहिए। लालू के सीएम बनने क समय दलित नेता राम सुंदर दास काफी मजबूत थे। लेकिन उनकी जगह पर लालू यादव नेता बने क्योंकि उनकी सरकार को भाजपा का ही बाहर से समर्थन मिला था। जनता दल के विधायकों की मीटिंग में नेता चुना जाना था। लालू प्रसाद यादव के मुकाबले करीबी अंतर से राम सुंदर दास हार गए थे। कई राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि ऊंची जाति के विधायकों ने लालू यादव का समर्थन कर दिया था। बता दें कि सम्राट चौधरी भी एक समय में आरजेडी में थे और उन्हें रबड़ी देवी की सरकार में मंत्री बनने का चांस मिला था।
