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मंथन

भारत के ‘अता’

Swatva Desk
Last updated: May 2, 2026 3:52 pm
By Swatva Desk 45 Views
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6 Min Read
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बिहार के 43 वें राज्यपाल का नाम लेफ्टिनेंट जनरल सैयद अता हसनैन है। इनके नाम से ही इनका एक परिचय मिल जाता है। नाम के आगे लेफ्टिनेंट जनरल लगा है यानी ये सेना के उच्च अधिकारी रहे हैं। वहीं अता शब्द का अर्थ ईश्वर की अनुकंपा, आशीर्वाद या पुरखों का सम्मान होता है। सेना के अधिकारी के पुत्र के रूप में जन्म लेने वाले अता हसनैन का पालन-पोषण सैन्य वातावरण में हुआ क्योंकि पिता सेना के अधिकारी थे। जन्म के साथ ही अनुशासन व देशभक्ति जन्मजात गुण बन कर रक्त में प्रवाहित होने लगा। बचपन से ही सेना की परंपराओं को व्यावहारिक जीवन में जीने वाले अता हसनैन ने युवावस्था में सैनिक के रूप में राष्ट्रदेव की रक्षा व सेवा को अपने जीवन का लक्ष्य बना लिया।
लेफ्टिनेंट जनरल सैयद अता हसनैन का परिवार मूलरूप से उत्तर प्रदेश के बाराबंकी के रहने वाला है। उनके पिता मेजर जेनरल सैयद महदी हसनैन लैंसडौन में कमांडेंट थे। इसके कारण लैसडौन स्थित गढ़वाल रेजीमेंट के उस छावनी से उनका भावनात्मक लगाव है। हिमालय की गोद में बसे उस मनोरम शहर से वे इस कदर प्यार करते हैं कि उसे अपना घर ही मानते हैं। वे अक्सर कहा करते है कि लैंसडौन कैंट और गढ़वाल राइफल्स अलग-अलग इकाइयां नहीं, बल्कि एक ही परिवार के हिस्से हैं।

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ले.जन. सैयद अता हसनैन बोले,भारतीय सेना जैसी, धर्म के प्रति संवेदनशील और कोई  संस्था नहीं
उनके पिता मेजर जनरल सैयद महदी हसनैन गढ़वाल राइफल्स से जुड़े रहे। उन्होंने प्रथम बटालियन के साथ द्वितीय विश्व युद्ध में हिस्सा लिया और बाद में गढ़वाल राइफल्स की चौथी बटालियन की स्थापना की। वर्ष 1964 से 1966 तक वे लैंसडौन में रेजिमेंट सेंटर के कमांडेंट भी रहे। इस प्रकार जेनरल सैयद अता हसनैन गढ़वाल राइफल्स की दूसरी पीढ़ी के अधिकारी हुए।
अपने पिता की तरह जेनरल अता भी वर्ष 1982 से लैंसडौन में एड्जुटेंट के पद पर दो वर्ष तक तैनात रहे। इसके बाद 1995 से अगले दो वर्षों तक चौथी गढ़वाल राइफल्स के कमान अधिकारी रहे। वर्ष 2011 से 2013 तक वे गढ़वाल राइफल्स और गढ़वाल स्काउट के कर्नल आफ द रेजिमेंट रहे। उनका यह कार्यकाल कई मायनों में महत्वपूर्ण माना गया। इस प्रकार इनका परिवार भारतीय सेना की गौरवशाली परंपराओं से जुड़ा रहा है।
लेफ्टिनेंट जनरल सैयद अता हसनैन का जन्म भारत की आजादी के बाद 1952 में भारतीय सेना के एक अत्यंत प्रतिष्ठित व देश के लिए समर्पित अधिकारी के पुत्र के रूप में हुआ था। अपने जीवन के 40 वर्षों तक सेना में सेवा देने वाले जनरल हसनैन ने कश्मीर में ‘हार्ट्स डॉक्ट्रिन’ प्रयोग के माध्यम से आम आदमी में विश्वास कायम करने के लिए महत्वपूर्ण कार्य किए। नैनीताल के प्रसिद्ध शेरवुड कॉलेज से विद्यालय की शिक्षा पूरी करने के बाद उन्होंने दिल्ली के सेंट स्टीफंस कॉलेज से इतिहास में स्नातक किया। उन्होंने लंदन के किंग्स कॉलेज से भी शिक्षा प्राप्त की।

लेफ्टिनेंट जनरल सैयद अता हसनैन (सेवानिवृत्त) ने बिहार के राज्यपाल के रूप  में शपथ ली
सैयद अता हसनैन को भारतीय सैन्य अकादमी, देहरादून के चौथे बटालियन, गढ़वाल राइफल्स में कमीशन किया गया। बाद में उन्हें उसी बटालियन का कमांड दिया गया। हसनैन ने वर्ष 1988-90 के दौरान श्रीलंका में ऑपरेशन पवन में भाग लिया। इसके बाद 1990-91 में पंजाब में आतंकवाद विरोधी अभियान संचालन में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका थी। 1990 के दशक में कर्नल के रूप उन्होंने मोजाम्बिक और रवांडा में संयुक्त राष्ट्र के अभियान में उल्लेखनीय कार्य किया। इसके बाद एक ब्रिगेडियर के रूप में, उन्होंने जम्मू और कश्मीर में नियंत्रण रेखा पर व अतिसंवेदनशील उरी शहर के पास जो सेवाएं दी उसकी प्रशंसा हुई। बाद में इन्होंने जम्मू और कश्मीर के बारामूला में 19 इन्फैन्ट्री डिवीजनों का नेतृत्व मेजर जनरल के रूप में किया। इसके बाद लेफ्टिनेंट जनरल के रूप में, हसनैन को भोपाल स्थित भारतीय सेना के अत्यंत घातक सुदर्शन चक्र कोर का जनरल ऑफिसर कमांडिंग की अत्यंत महत्वपूर्ण जिम्मेदारी दी गयी। इसके बाद अक्टूबर, 2010 में कश्मीर भेजा गया। उन्होंने नागरिकों की शिकायतों, चिंताओं और कष्टों के निवारण के साथ ही आतंकी संगठनों द्वारा बनाए गए भ्रम व भय के वातावरण को समाप्त करने का जो प्रयास किया वह अद्भुत माना जाता है। उनकी योजना के कारण सेना वहां के लोगों के करीब पहुंचने लगी। वहां उनके ‘हर्ट्स डिक्ट्रीन’ की कल्पना और योजना के कारण कश्मीर में सुरक्षा परिदृश्य में सुधार हुआ। नागरिकों के सहयोग से घुसपैठ और आतंकवादियों के विरूद्ध आपरेशन में पूर्व की तुलना में बहुत अधिक सफलता मिलने लगी। कश्मीर में अपने कार्यकाल के दौरान उन्होंने संघर्ष की दिशा में एक बौद्धिक दृष्टिकोण आधारित कुछ प्रयोग किए। वस्तुतः आतंकियों की बड़ी ताकत भ्रम और भय से पीड़ित सामान्य नागरिक थे। उनके इस प्रयोग से सामान्य आदमी को आतंकियों के षड्यंत्र का अहसास होने लगा और वे उनसे दूर होने लगे। वे जम्मू-कश्मीर की राज्य सरकार के सुरक्षा सलाहकार भी रहे हैं। 9 जून 2012 को, लेफ्टिनेंट जनरल हसनैन ने नई दिल्ली स्थित सेना मुख्यालय में सैन्य सचिव कां पदभार संभाला। उन्हें भारत के राष्ट्रपति द्वारा छह और सेना प्रमुख द्वारा दो पुरस्कारों से सम्मानित किया गया है।

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