नवादा : मगध सहित देश के कई हिस्सों से नक्सलवाद लगभग खत्म हो चुका है। इसकी सबसे बड़ी वजह संगठन का वैचारिक भटकाव है। यह एक बड़ी सीख भी देता है कि समाज में स्थायी बदलाव केवल बंदूक से नहीं आता। इसके लिए जनता का भरोसा, लोकतांत्रिक रास्ता और स्पष्ट सोच जरूरी होती है। बंगाल से शुरू हुआ यह आंदोलन जब बिहार पहुंचा तो जातीय टकराव में उलझ गया। 1970 से 2003 के बीच बिहार में हुए नरसंहार बताते हैं कि नक्सलवाद अपनी मूल लड़ाई से भटक गया। अमीर-गरीब की रेखा धुंधली हो गई और हिंसा ही साधन बन गई।
जिले में नक्सलवाद का यह भटकाव सबसे ज्यादा साफ दिखा। शुरुआत में यह शोषण के खिलाफ संघर्ष था। लेकिन धीरे-धीरे यह जातीय संघर्ष में बदल गया। नरसंहार आम हो गए। गांव-गांव में खून-खराबा हुआ। इससे समाज में डर और विभाजन बढ़ा। नक्सलियों ने “वर्ग संघर्ष” के नाम पर हत्याओं को जायज ठहराया। इसे “व्यक्तिगत सफाए” की नीति कहा गया। यानी जिनको वर्ग शत्रु माना गया, उनकी हत्या को क्रांति का रास्ता समझा गया। इससे जनआंदोलन कमजोर पड़ गया। जनता का भरोसा टूटने लगा।
इसी हिंसा के जवाब में सवर्ण समुदाय के लोगों ने भी हथियार उठा लिए। रणवीर सेना जैसे संगठन बने। यह टकराव और खतरनाक हो गया। दोनों ओर से हिंसा बढ़ी। गरीब और आम लोग ही सबसे ज्यादा मारे गए। यह भी सच है कि दोनों पक्षों में हर वर्ग के लोग थे। नक्सलियों में सिर्फ दलित या पिछड़े नहीं थे। कुछ संपन्न लोग भी शामिल थे। वहीं रणवीर सेना में भी गरीब और अमीर दोनों थे। यानी संघर्ष की रेखाएं उतनी साफ नहीं थीं, जितनी बताई जाती थीं।
आंदोलन के शुरुआती नेताओं ने भी इस भटकाव को महसूस किया। कानू सान्याल ने खुले तौर पर माना कि नक्सलवाद अपने रास्ते से भटक गया है। उन्होंने हिंसा को गलत बताया। उनके लिए स्वीकार करना आसान नहीं था, क्योंकि वे खुद इस आंदोलन के प्रमुख चेहरे थे।चारु मजूमदार के नेतृत्व में आंदोलन ने कट्टर रास्ता अपनाया। चुनाव बहिष्कार और हिंसा को प्राथमिकता दी गई। आलोचना की जगह खत्म होती गई। जो असहमत थे, वे अलग कर दिए गए। इससे संगठन के भीतर ही टूट शुरू हो गई।
धीरे-धीरे नक्सली आंदोलन कई गुटों में बंट गया। आपसी अविश्वास बढ़ा। साथी ही एक-दूसरे के खिलाफ खड़े हो गए। इससे आंदोलन और कमजोर हुआ। कानू सान्याल ने पहले ही चेताया था कि जनता से कटकर कोई आंदोलन सफल नहीं हो सकता। छोटे-छोटे हिंसक दस्तों के भरोसे क्रांति संभव नहीं है। लेकिन उस समय उनकी बात को नजरअंदाज किया गया। चीन के मॉडल का भी अंधानुकरण किया गया। जबकि माओत्से तुंग ने साफ कहा था कि हर देश की परिस्थितियां अलग होती हैं। भारत में अपनी रणनीति बनानी होगी। इस सलाह को गंभीरता से नहीं लिया गया।
समय के साथ नक्सलवाद हिंसा, भ्रम और आपसी संघर्ष में उलझ गया। कई नेताओं ने बाद में माना कि हथियारों पर जरूरत से ज्यादा जोर देना बड़ी गलती थी। इससे आंदोलन जनता से दूर होता गया। एक दौर में इस आंदोलन ने युवाओं और बुद्धिजीवियों को आकर्षित किया। उन्हें लगा कि यह व्यवस्था बदलने का मजबूत रास्ता है। लेकिन जब जमीनी जुड़ाव खत्म हुआ तो इसका प्रभाव भी घट गया। आज हालात बदल चुके हैं। जो कभी लोकतंत्र को नकारते थे, वे अब उसी व्यवस्था में भागीदारी की बात कर रहे हैं। चुनाव लड़ रहे हैं। जनसंगठनों की ओर लौट रहे हैं। जाहिर है, हिंसा के सहारे बदलाव टिकाऊ नहीं होता। अगर विचारधारा जमीन से कट जाए तो वह भटक जाती है।
भईया जी की रिपोर्ट