कई नदियों के बीच बसे एक गांव ‘दरियापुर’ में आम के पेड़ के साये में चलने वाले पाठशाला के छात्र का नामांकन भागलुपर शहर के प्रसिद्ध मारवाड़ी पठाशाला में होता है। यहां राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शायं शाखा में देश के लिए सर्वस्व अर्पण का संस्कार मिलता है। इसी बीच 1966 में मुजफ्फरपुर में पुलिस ने आंदोलन कर रहे छात्रों पर गोली चला दी थी जिसमें एक छात्र और एक कालेज शिक्षक की मौत हो गयी थी। उस समय बिहार में कांग्रेस की सरकार थी और उस सरकार के मुख्यमंत्री केबी सहाय थे। उस घटना के लिए लोग केबी सहाय को जिम्मेदार मान रहे थे क्योंकि उन्होंने दोषी पुलिस अधिकारियों के विरूद्ध कार्रवाई नहीं की थी। इसके कारण उनके विरोध में छात्रों का आंदोलन फूट पड़ा था। मारवाड़ी पाठशाला के छात्रों में भी यह बात फैल गयी थी कि मुख्यमंत्री केबी सहाय अत्याचारी पुलिस अधिकारियों को बचा रहे हैं। यदि यह व्यक्ति मुख्यमंत्री बना रहा तो और अत्याचार होगा। माड़वारी पाठशाल के छात्रों के बीच भी मुजफ्फरपुर की घटना से जुड़ा पर्चा पहुंच गया था।ं उस पर्चा को पढ़ने के बाद आक्रोशित तरूण अश्विनी कुमार चौबे उस घटना के विरोध में आयोजित जुलूस में शामिल हो गए, पकड़े गए और दिनभर थाने की हाजत में बंद रहे। स्कूल से निकाले गए लेकिन केबी सहाय के विरोध में चल रहे उस आंदोलन में अपनी सहभागिता को उचित ठहराते रहे। बाद में विद्यार्थी परिषद से जुड़कर छात्र राजनीति और जेपी आंदोलन के अग्रगण्य नेता बने। राजनीतिक कार्यकर्ता के रूप में भाजपा में करीब बीस वर्षों तक सतत कार्य करने के बाद 1995 में भागलपुर विधानसभा क्षेत्र से भाजपा के प्रत्याशी बने और विजयी हुए। विधायक के रूप में संसदीय राजनीति की यात्रा शुरू करने वाले अश्विनी कुमार चौबे को 2014 में भाजपा ने बक्सर संसदीय क्षेत्र से चुनावी मैदान में उतारा। यहां भी उन्होंने राजद के कद्दवर नेता जगदानंद सिंह को भारी मतों से पराजित किया। अश्विनी कुमार चौबे का नाम भी उन नेताओं की सूची में शामिल है जिन्हें अपने जीवन में किसी भी चुनाव में हार का सामना नहीं करना पड़ा।
जेपी आंदोलन के समय से शुरू संघर्ष की यात्रा में संगठन करना और लोकसंग्रह की अद्भुत कला इनमें विकसित हुई। वैसे तो भागलपुर में आरएसएस का कार्य आजादी के पूर्व से ही शुरू हो गया था। वहां संघ का मजबूत नेटवर्क था जो संकट के समय समाज की सहायता में खड़ा हो जाता था। लेकिन, राजनीतिक रूप से कांग्रेस वहां मजबूत स्थिति में थी।
बिहार विधानसभा के प्रथम चुनाव 1952 में हुए थे जिसमें पूरे भागलपुर जिले की सभी सीटों से कांग्रेस के प्रत्याशी ही विजयी हुए थे। कहलगांव से कांग्रेस के रामजनम महतो, भागलपुर शहर से कांग्रस के सत्यंेद्र नारायण अग्रवाल, भागलपुर मुफस्सिल से कांग्रेस के ही सैयद मकबूल अहमद विजयी हुए थे।
इसी प्रकार 1957 के द्वितीय विधानसभा चुनाव में भी भागलपुर शहर से कांग्रेस के सत्येंद्र नारायण अग्रवाल फिर से विजयी हुए थे। इसबार के चुनाव में भागलपुर जिले के गोपालपुर एवं बिहपुर विधानसभा क्षेत्र से भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के प्रत्याशियों की जीत हुई थी।
इसके बाद 1962 के तृतीय विधानसभा चुनाव में भागलपुर जिले की सभी सीटों पर कांग्रेस का फिर से कब्जा हो गया। भागलपुर शहर से लगातार तीसरी बार कांग्रेस के सत्येंद्र नारायण अग्रवाल विधायक निर्चाचित हुए।
चौथे विधानसभा चुनाव, 1967 में कांग्रेस की पकड़ ढीली हुई। भागलपुर शहर से पहली बार जनसंघ के विजय कुमार मित्रा निर्वाचित हुए थे। भागलपुर जिले के गोपालपुर विधानसभा क्षेत्र से भाकपा के एम. सिंह निर्वाचित हुए थे। वही बिहपुर से भारतीय जनसंघ के ज्ञानेश्वर प्रसाद यादव जीते थे। इसी प्रकार सुल्तानगंज से प्रजा समाजवादी पार्टी के बीपी शर्मा एवं अमरपुर से संघता समाजवादी पार्टी के एसएन सिंह विजयी हुए थे। त्रिशंकु विधानसभा के कारण मात्र दो साल बाद ही 1969 में चुनाव कराया गया जिसमें भागलपुर से जनसंघ के विजय कुमार मित्र एवं नाथ नगर से चुंनचुन यादव जीते थे।
इसके बाद 1972 में हुए विधानसभा चुनाव में भागलपुर से फिर जनसंघ के विजय कुमार मित्रा की जीत हुई थी। इसके साथ ही अमरपुर से पहली बार जनसंघ के प्रत्याशी जनार्दन यादव भी विजयी हुए थे।
आपातकाल के बाद 1977 में हुए चुनाव में भारतीय जनसंघ का विलय जनता पार्टी में हो गया था। इस चुनाव में जनसंघ के कार्यकर्ता विजय कुमार मित्रा जनता पाटी की टिकट पर चुनाव लड़े और विजयी हुए थे। इस प्रकार 1967 के बाद हुए चार चुनावों में भागलपुर से जनसंघ की जीत हुई थी। लेकिन, मात्र तीन साल में ही जनता पार्टी के बिखरने और सरकार गिर जाने के बाद 1980 के चुनाव में भागलपुर शहर से भाजपा हार गयी थी। केंद्र में फिर से इंदिरा कांग्रेस की सरकार बनने के बाद राज्यों में राष्ट्रपति शासन लगाकर निर्वाचित सरकारों को अपदस्थ कर दिया गया था। तेरह वार्षांे बाद भगलपुर शहर से कांग्रेस के शिव चंद्र झा जीत गए थे। वर्ष 1980 में संजय गांधी ने चुनावी राजनीति में धन और बाहुबल का दुरूपायोग शुरू कर दिया था।
इंदिरा गांधी की हत्या के बाद 1985 के चुनाव में हिंसा का नंगा नृत्य शुरू हो गया था। नालंदा के निर्दलीय प्रत्याशी महेंद्र प्रसाद, मसौढ़ी के कांग्रस प्रत्याशी जनेश्वर प्रसाद एवं हटिया के आपीएफ समर्थित निर्दलीय प्रत्याशी विष्णु महतो की हत्या कर दी गयी थी। मतदान के दौरान हिंसा में 69 लोगों की जानें गयी थीं। उस चुनाव में कांग्रेस को 196, लोकदल को 46 एवं भाजपा को 16 स्थानों पर जीत हुई थी। भागलपुर में कांग्रेस के शिव चंद्र झा फिर विजयी हुए थे।
दस वर्ष बाद 1990 में फिर राजनीतिक महौल बदला। जनता दल और भाजपा के ढ़ीलाढ़ाला गठबंधन ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस को पराजित किया। भागलपुर शहर से भाजपा के वयोवृद्ध नेता विजय कुमार मित्रा फिर विजयी हुए। इसके बाद 1995 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने युवा नेता अश्विनी कुमार चौबे को भागलपुर से मैदान में उतारा।
भागलपुर से तरूणावस्था में ही सरकार के अत्याचार के विरोध में संघर्ष की अपनी यात्रा शुरू करने वाले अश्विनी कुमार चौबे भागलपुर से भारी मतों से विजयी हुए थे। 1995 में शुरू हुई इनकी यात्रा बिना किसी रूकावट के आग बढ़ती रही। भागलुपर से वे सभी चुनाव जीतते रहे। इसी बीच भाजपा ने उन्हें बक्सर लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र से मैदान में उतारा। वहां भी वे 2014 एवं 2019 के लोकसभा चुनाव में विजयी हुए। वर्ष 2024 के चुनाव में भाजपा ने उन्हें टिकट नहीं दिया। इस चुनाव में उन्होंने पार्टी के लिए स्टार प्रचारक के रूप में काम किया।