नीतीश कुमार 1 मार्च को 75 साल के हो गए। 1951 में जन्मे नीतीश आज भी बिहार की राजनीति में निर्णायक दखल रखते हैं। लेकिन समय—समय पर सार्वजनिक मंचों पर उनकी कुछ हरकतों और स्वास्थ्य को लेकर भी सवाल उठते रहे हैं। ऐसे में एकबार फिर जेडीयू नेताओं और कार्यकर्ताओं के बीच उनके पुत्र निशांत कुमार के सक्रिय राजनीति में एक्टिव होने की डिमांड होने लगी है। जदयू में एक गुट ऐसा है जो बिहार में अपनी पकड़ बनाए रखना चाहता है। उसकी पूरी इच्छा है कि निशांत कुमार राजनीति में आएं और नीतीश कुमार की जगह ले लें। ये वही गुट है जो अभी भी JDU में ताकतवर माना जाता है। इन्हें यह डर है कि कहीं नीतीश के बाद उनकी राजनीति पर ग्रहण न लग जाए। इसीलिए वे समय रहते नीतीश के बदले निशांत को पार्टी का फेस बनाना चाह रहे हैं। नीतीश के 75वें जन्मदिन के बीच राज्यसभा चुनाव ने निशांत कुमार की पॉलिटिकल एंट्री की अटकलों के साथ बिहार के सियासी माहौल को गर्म कर दिया है।
राज्यसभा चुनाव का जटिल संख्या बल
बिहार में राज्यसभा की 5 सीटों पर चुनाव होना है। संख्या बल के हिसाब से एनडीए को 4 सीटें लगभग पक्की मानी जा रही हैं। इनमें जदयू और भाजपा के दो-दो उम्मीदवार जीत सकते हैं। लेकिन, असली राजनीतिक लड़ाई 5वीं सीट को लेकर है जिसके लिए महागठबंधन भी पूरा जोर लगा रहा है। परंतु इस 5वीं सीट के लिए जटिल गणित ये है कि न तो एनडीए और न महागठबंधन के पास इस पांचवीं सीट को जितने हेतु पर्याप्त संख्या है। साफ है कि अतिरिक्त समर्थन जुटाने की कोशिश में दोनों गठबंधन लगे हैं। राज्यसभा चुनाव के इस जटिल गणित के बीच सबसे बड़ी चर्चा यह है कि जेडीयू कोटे से निशांत कुमार को राज्यसभा भेजा जा सकता है। हालांकि आधिकारिक तौर पर कुछ घोषित नहीं हुआ है लेकिन लंबे समय से पार्टी के भीतर उन्हें राजनीति में लाने की मांग उठती रही है। विधानसभा चुनाव के दौरान निशांत कई क्षेत्रों में सक्रिय भी दिखे थे। अब अगर उन्हें राज्यसभा भेजा जाता है, तो यह सक्रिय राजनीति में उनकी औपचारिक एंट्री मानी जाएगी।
परिवारवाद के खिलाफ रहे हैं नीतीश
यहीं से सबसे बड़ा सवाल उठता है जो जदयू की सियासत को 360 डिग्री घुमाने जैसा है। दरअसल, नीतीश कुमार की राजनीति का एक बड़ा आधार उनकी सादगी और परिवारवाद से दूरी रही है। बिहार में जब भी वंशवाद की चर्चा होती रही, उन्होंने खुद को उससे अलग दिखाया। उन्होंने अपने परिवार के किसी भी सदस्य को राजनीति में आगे नहीं बढ़ाया ना चुनाव लड़वाया, ना संगठन में भूमिका दी। यही वजह है कि बिहार की राजनीति में परिवारवाद लंबे समय से एक बड़ा मुद्दा रहा। लालू प्रसाद यादव का राजनीतिक परिवार जिसमें राबड़ी देवी और तेजस्वी यादव सक्रिय राजनीति में हैं, उनके निशाने पर रहे। परंतु नीतीश कुमार ने हमेशा खुद को इस मॉडल से अलग रखा। यही वजह है कि अगर वे अपने बेटे को राज्यसभा भेजते हैं, तो विपक्ष उन्हें उनके ही पुराने बयानों की याद दिलाएगा।
निशांत पर महागठबंधन की प्रतिक्रिया
निशांत कुमार की संभावित एंट्री को लेकर विपक्षी दलों की प्रतिक्रियाएं भी दिलचस्प हैं। कांग्रेस प्रवक्ता असितनाथ नाथ तिवारी ने सवाल उठाया है कि निशांत राजनीति में आए इससे किसी को क्या दिक्कत है, जेडीयू चाहे तो उन्हें भेज सकता है। लेकिन, उनके आने से क्या होगा? निशांत को बिहार की जमीनी समझ क्या है। वहीं RJD की ओर से मृत्युंजय तिवारी ने कहा कि अगर निशांत को राजनीति में आना है तो कौन रोक रहा है। वे बिलकुल आ सकते हैं और यह पूरी तरह नीतीश कुमार और जेडीयू का अपना फैसला होगा। हमारे नेता लालू यादव, राबड़ी देवी और तेजस्वी यादव ने पहले भी निशांत के राजनीति में आने की बात का समर्थन किया है। अब देखना यह है कि निशांत को राजनीति में आने से कौन रोक रहा है? वहीं दूसरी ओर भाजपा नेताओं का तर्क है कि राजनीति में शिक्षित और नई सोच वाले लोगों का आना लोकतंत्र के लिए अच्छा है। बीजेपी प्रवक्ता ने कहा कि अगर निशांत राजनीति में आते हैं तो यह बिलकुल सकारात्मक पहल होगी। निशांत पढ़े-लिखे नेता हैं, उनके अनुभव का लाभ सभी लोगों को मिलेगा।
नीतीश कुमार की मुश्किल और द्वंद्व
नीतीश कुमार राष्ट्रीय स्तर की राजनीति में सक्रिय रहे हैं और उनकी उम्र भी एक महत्वपूर्ण कारक है। ऐसे में पार्टी के भीतर नए चेहरे को आगे लाने की रणनीति बन सकती है। राज्यसभा एक सुरक्षित मंच होता है-जहां बिना सीधे चुनाव लड़े राष्ट्रीय राजनीति में प्रवेश किया जा सकता है। अगर नीतीश कुमार अपने बेटे को राज्यसभा भेजते हैं, तो उन्हें कई बड़े सवालों का सामना करना होगा। इसी सबके बीच राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि यह सिर्फ परिवारवाद का मामला नहीं, बल्कि नेतृत्व के उत्तराधिकार का संकेत भी हो सकता है। यह भी संभव है कि जेडीयू लंबे समय के राजनीतिक भविष्य को ध्यान में रखकर निर्णय लेने जा रही हो। फिलहाल सब कुछ अटकलों पर आधारित है और राज्यसभा चुनाव के प्रत्याशियों के नामांकन के अंतिम दिन ही तस्वीर साफ होगी। मगर इतना तय है कि अगर निशांत कुमार राज्यसभा जाते हैं तो यह सिर्फ एक सीट का चुनाव नहीं होगा बल्कि यह बिहार की राजनीति में एक नए अध्याय की शुरुआत होगी।