आजादी के लिए संघर्ष के दिनों में देश भक्ति के भाव और नैतिक कर्तव्य बोध से युक्त कार्यकर्ताओं की टोली जब समाप्त होने लगी तब भारत की राजनीतिक क्षीतिज पर मार्तण्ड की तरह जगमगाने वाली कांग्रेस धीरे-धीरे निश्तेज होती चली गयी। गांव से लेकर बड़े शहरों तक आम आदमी के बीच रहने वाले इन कार्य्रकर्ताओं की टोली ही कांग्रेस की मूल शक्ति थी। बिहार में 5 जुलाई 1957 को अनुग्रहण नारायण सिन्हा, 3 जनवरी 1961 को श्रीकृष्ण सिन्हा और 28 फरवरी 1963 को डा.राजेन्द्र प्रसाद के निधन के बाद कांग्रेस का तेजी से पतन शुरू हुआ और 1967 के चुनाव में पहली बार कांग्रेस सरकार बनाने की स्थिति में नहीं रही।
बिहार विधानसभा का पहला चुनाव मार्च 1952 में हुआ था जिसमें पटना जिले के सभी सीटों से केवल कांग्रेस के प्रत्याशी ही विजयी हुए थे। मनेर सामान्य सीट से रामेश्वर प्रसाद शास्त्री, दानापुर सामान्य सीट से जगत नारायण लाल, पटना नगर पश्चिमी नौबतपुर अनुसूचित जाति सुरक्षित सीट से मुंगेरी लाल, पटना मध्य से बदरीनाथ वर्मा, पटना नगर पूर्वी से नवाबजादा सैयद एवं फतुहा से देवशरण सिंह भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के प्रत्याशी के रूप में विजयी हुए थे।
दूसरा विधान सभा चुनाव 1957 मंे हुआ जिसमें पटना जिले के नौबतपुर क्षेत्र से रामखेलावन सिंह, पटना दक्षिण से बद्रीनाथ वर्मा, पटना पूर्वी से जहार अहमद, पटना पश्चिमी से रामशरण साव, दानापुर से जगत नारायण लाल एवं विक्रम से मनोरमा देवी कांग्रेस के प्रत्यशी के रूप में विजयी हुए थे। वहीं मनेर से कम्युनिस्ट पार्टी के श्रीभगवान सिंह की जीत हुई थी। उस समय तक पटना में कम्युनिस्ट पार्टी का नेटवर्क मजबूत हो गया था।
इसके बाद 1962 में हुए तृतीय विधानसभा चुनाव में भी पटना जिले के आठ विधानसभा क्षेत्रों में से सात पर कांग्रेस का कब्जा बरकरार रहा। केवल दानापुर से सोशलिस्ट पार्टी के राम सेवक सिंह की जीत हुई थी। नौबतपुर से दासु सिन्हा, पटना दक्षिण से बद्री नाथ वर्मा, पटना पूर्वी से फिर जहरा अहमद, पटना पश्चिम से कृष्ण बल्लभ सहाय, मनेर से बुद्धदेव सिंह, बिक्रम से मनोरमा देवी एवं पालीगंज से रामलखन सिंह यादव भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के प्रत्याशी के रूप में विजयी हुए थे। इस प्रकार 1967 तक पटना में कांग्रेस का एकछत्र राज जैसा था।
फरवरी 1967 में हुए चौथे बिहार विधानसभा के चुनाव के बाद राजनीतिक परिदृश्य बदलने लगा। पटना जिले के सात विधानसभा क्षेत्रों में मात्र दो पर कांग्रेस विजयी हुई। पहली बार पटना पूर्वी से भारतीय जनसंघ के राम देव महतो विजयी हुए थे। इस चुनाव में पिछड़े वर्गों की राजनीतिक आकांक्षाएं मुखरित हुई थीं। साथ ही सत्ता के लिए सिद्धांत को तिलांजलि देते हुए बड़े नेताओं की लालच और जोड़तोड़ की राजनीति की परंपरा शुरू हुई थी। इस चुनाव में पटना दक्षिण से राम लखन सिंह यादव एवं बिक्रम से महाबीर गोप भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की टिकट से विजयी हुए थे। वहीं पटना से भारतीय जनसंघ के रामदेव महतो, पटना पश्चिम से जन क्रांति दल के एमपी सिन्हा, दानापुर से समता समाजवादी पार्टी के आरएस सिंह, मनेर से निर्दलीय आरएन सिंह एवं पालीगंज से सीपी वर्मा समता समाजवादी पार्टी के प्रत्याशी के रूप में विजयी हुए थे।
आजादी के बीस वर्षों बाद 1967 में कांग्रेस बिहार में सत्ता से हटी थी। बिहार विधानसभा में कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी थी, लेकिन उसके पास बहुमत नहीं था। संयुक्त समाजवादी पार्टी, सीपीआई, जन क्रांति दल और प्रजा समाजवादी जैसी पार्टियों के गठबंधन को जनसंघ ने सहयोग किया तब जाकर पहली बार गैरकांग्रेसी सरकार बनी थी। कांग्रेस के बाद दूसरी सबसे बड़ी पार्टी संयुक्त समाजवादी पार्टी थी। उसके नेता कर्पूरी ठाकुर मुख्यमंत्री पद के दावेदार थे, लेकिन अन्य पार्टियां तैयार नहीं थीं। ऐसी स्थिति में, सभी पार्टियांे ने मिलकर कामाख्या नारायण सिंह द्वारा स्थापित जन क्रांति दल के महामाया प्रसाद सिन्हा को मुख्यमंत्री बनाने का निर्णय लिया। उनके साथ कर्पूरी ठाकुर बिहार के प्रथम उपमुख्यमंत्री बने थे। गठबंधन की यह सरकार मात्र एक साल में ही गिर गयी थी। इसके बाद कांग्रेस के साथ मिलकर समाजवादी बीपी मंडल ने सरकार बनायी। वे बिहार के पहले पिछडा मुख्यमंत्री थे। यह सरकार मात्र 50 दिनों तक चली। इसके बाद लोकतांत्रिक कांग्रेस के भोला पासवान शास्त्री के नेतृत्व में सरकार बनी। वे बिहार के पहले दलित मुख्यमंत्री थे। भोला पासवान शास्त्री की सरकार मात्र 4 महीने में ही कालकवलित हो गयी।
मात्र दो वर्ष में ही बिहार विधानसभा भंग हो गयी। इसके बाद 1969 में मध्यावधि चुनाव हुआ जिसमें बिहार की राजधानी पटना में कांगेस की स्थिति पूर्व की तरह मजबूत नहीं हुई थी। पटना जिले के सात में से तीन सीटों पर ही कांग्रेस विजयी हुई थी। पटना दक्षिण से राम नंदन सिंह, दानापुर से बुध देव सिंह और मनेर से महावीर गोप कांग्रेस के विधायक निर्वाचित हुए थे। वहीं पटना पूर्व जनसंघ के रामदेव महतो पुनाः विजयी हुए थे। वहीं पटना पश्चिम से भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के एके सेन विजयी हुए थे। वहीं बिक्रम खदेरन सिंह भारतीय क्रांति दल एवं पालीगंज से चंद्रदेव प्रसाद वर्मा संयुक्त समाजवादी पार्टी से विजयी हुए थे।
इस चुनाव में भी किसी दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला था। गठबंधन और जोड़तोड़ की राजनीति में बिहार में मात्र तीन वर्षों में ही पांच सरकारें बनीं और गिरीं। पहली सरकार हरिहर सिंह के नेतृत्व में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की बनी जो 26 फरवरी 1969 से लेकर 22 जून 1969 तक मात्र 116 दिनों तक चली थी। दूसरी सरकार लोकतांत्रिक कांग्रेस के भोला पासवान शास्त्री के नेतृत्व में बनी जो 22 जून 1969 से लेकर 4 जुलाई 1969 यानी 12 दिन तक चली। 4 जुलाई 1969 से लेकर 16 फरवरी 1970 तक 227 दिन यानी सात माह तक बिहार कार्यवाहक मुख्यमंत्री के हवाले रहा। इसके बाद भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (आर) के दारोगा प्रसाद राय की सरकार बनी जो 16 फरवरी 1970 से 22 दिसंबर 1970, 309 दिन यानी दस माह तक चली। इन्होंने पिछड़ों के आरक्षण के लिए आयोग बनाकर बिहार की राजनीति की दिशा मोड़ दी थी। इसके बाद संयुक्त समाजवादी पार्टी के कर्पूरी ठाकुर की सरकार बनी जो 22 दिसंबर 1970 से लेकर 2 जून 1971 तक यानी 162 दिनों तक चली। इसके बाद फिर लोकतांत्रिक कांग्रेस के भोला पासवान शास्त्री मुख्यमंत्री बने। उनकी सरकार 2 जून 1971 से लेकर 9 जनवरी 1972 तक यानी 221 दिनों तक चली।
निश्तेज कैसे हुई कांग्रेस