नवादा : आखिरकार “आरटीआई ” के आगे भ्रष्ट सिस्टम को झुकना पड़ा। फर्जी पीडीएस विक्रेता योगेन्द्र पासवान का अनुज्ञप्ति बड़े बुझे मन से रद्द करना पड़ा। बावजूद उक्त मामले ने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं, जिसका आज नहीं तो कल सिस्टम को जबाव तो देना ही पड़ेगा। जी हां! यहां हम बात कर रहे हैं जिले के रजौली प्रखंड अमावां पश्चिम पंचायत के फर्जी पीडीएस विक्रेता योगेन्द्र पासवान का। जिले के बहुचर्चित आरटीआई कार्यकर्ता प्रणव कुमार चर्चिल ने जब आरटीआई के तहत दस्तावेज की मांग की थी तब अधिकारियों को दस्तावेज कामधेनु गाय बनकर आ गया था।

उक्त मामले में विक्रेता योगेन्द्र पासवान की अनुज्ञप्ति को बचाने के अधिकारियों ने जमकर आर्थिक दोहन किया। यहां तक कि आरटीआई कार्यकर्ता को भी तरह तरह से परेशान करने की चालें चली। लेकिन वे भले मानने वाले या झुकने वाले कहां थे सो उन्होंने अपनी लड़ाई जारी रखी। आश्चर्य तो यह कि डीएम द्वारा गठित त्रीस्तरीय जांच कमिटी द्वारा एक नहीं दो दो बार अनुज्ञप्ति को फर्जी घोषित किये जाने और डीएम द्वारा कार्रवाई का निर्देश दिए जाने के बावजूद लम्बे अर्से तक अनुज्ञप्ति को रद्द न कर खाद्यान्न का उठाव कराया जाता रहा। प्रखंड आपूर्ति पदाधिकारी द्वारा अनुज्ञप्ति रद्द करने की अनुसंशा के एक माह से अधिक समय तक कुड़ेदान में डालकर खाद्यान्न का उठाव कराया जाता रहा।
जब राज्य खाद्यान्न सचिव ने पन्द्रह दिनों के अंदर कार्रवाई सुनिश्चित कर प्रतिवेदन की मांग की तब भी खाद्यान्न का आनन फानन में अक्टूबर के पांच तारीख को ही सबसे पहले खाद्यान्न का उठाव करा दिया गया। अब सबसे बड़ा सवाल क्या सिरदला प्रखंड अमोखरी पीडीएस विक्रेता विरेन्द्र सिंह के मामले में ऐसा हुआ था? अगर नहीं, तो योगेन्द्र पासवान मामले में क्यों? फिर सिर्फ और सिर्फ अनुज्ञप्ति रद्द करने से मामले का समाधान हो गया क्या? इन सारे सवालों का जबाब आज नहीं तो कल सिस्टम को देना ही पड़ेगा। बहरहाल अनुज्ञप्ति रद्द करने की पुष्टि आपूर्ति पदाधिकारी ने की है।
भईया जी की रिपोर्ट

