नवादा : जिले में आंगनबाड़ी केंद्रों का हाल बेहाल है। ऐसे में तत्कालीन समाहर्ता फ़ैज़ अकरम का वह शब्द लोगों को बरवश याद आ जाता है जब उन्होंने रजौली के अमावां में राज्य सरकार द्वारा आरंभ किये गये जिले के पहले जनता दरबार में आंगनबाड़ी की शिकायत पर कहा था “मेरा वश चले तो मैं इसे हमेशा के लिए बंद कर दूं” तब उन्होंने पीडीएस की अनुज्ञप्ति को तत्काल प्रभाव से रद्द कर दिया था।

तो फिलहाल यहां हम बात कर रहे हैं
रजौली प्रखंड क्षेत्र के धमनी गांव आंगनबाड़ी केंद्र का। जंगली क्षेत्रों में अवस्थित केंद्र का। उक्त केंद्र का कभी ताला तक नहीं खुलता। आश्चर्य यह कि गांव की महिलाएं सेविका-सहायिका तक को पहचानती तक नहीं। पहचाने भी कैसे? जब केंद्र खुले और सेविका-सहायिका केंद्र आये तब तो। या फिर गांव की सेविका-सहायिका रहे तब तो। दोनों दूसरे गांव की है और उन्हें केंद्र आने में शर्मिंदगी महसूस होती है।
निरीक्षण का है प्रावधान
ऐसी भी बात नहीं है कि केंद्र का निरीक्षण का प्रावधान ही नहीं है। तीन स्तर पर निरीक्षण का प्रावधान है। निरीक्षण के लिए पर्यवेक्षिका, बाल विकास परियोजना अधिकारी व डीपीओ को तीन स्तर पर जिम्मेदारी सौंपी गई है। जहां तक जिला का सवाल है तो उनके फर्जी निरीक्षण का मामला चल रहा है। बाल विकास परियोजना अधिकारी व पर्यवेक्षिका जंगली क्षेत्रों में निरीक्षण में जायेगी ही क्यों?
उन्हें तो कार्यालय में बैठे अपने निजी लाभ से मतलब है जो सेविका खुद चलकर पहुंचा दे रही है। ऐसे में कुपोषण का शिकार बच्चे व गर्भवती महिलाओं का कुपोषण दूर हो तो कैसे? यह सबसे बड़ा सवाल है। जी हां ! ऐसा मैं नहीं बल्कि धमनी गांव की महिलाएं कह रही हैं। अब जिम्मेदारी जिला प्रशासन की है मामले संज्ञान लेते हुए कार्रवाई करें या फिर——-?

भईया जी की रिपोर्ट
