नवादा : नाबालिग से दुष्कर्म के बहुचर्चित मामले में पटना हाईकोर्ट से बरी हुए पूर्व राज्य मंत्री राजबल्लभ यादव की मुश्किलें एक बार फिर बढ़ती नजर आ रही हैं। बिहार सरकार ने हाईकोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देते हुए विशेष अनुमति याचिका (SLP) दाखिल की है। शुक्रवार को शीर्ष अदालत में मामले पर सुनवाई हुई। सुनवाई के बाद अगली सुनवाई के लिए करीब दो सप्ताह का समय निर्धारित किया गया है। ऐसे में अब अगली सुनवाई पर सभी की निगाहें टिकी हैं। राजबल्लभ यादव के हाईकोर्ट से बरी होने के बाद जहां उन्हें कानूनी राहत मिली थी, वहीं बिहार सरकार के सुप्रीम कोर्ट पहुंचने से करीब एक दशक पुराना यह मामला एक बार फिर चर्चा में आ गया है।
6 फरवरी 2016 को सामने आया था मामला
नाबालिग से दुष्कर्म के आरोपों से जुड़ा मामला 6 फरवरी 2016 को सामने आया था। इसके बाद 9 फरवरी 2016 को प्राथमिकी दर्ज की गई थी। मामले में राजबल्लभ यादव ने बाद में न्यायालय में सरेंडर किया था। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद उन्हें नवंबर 2016 से जेल में रहना पड़ा था। मामला सामने आने के बाद यह राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में रहा था। उस समय राजबल्लभ यादव नवादा से विधायक थे और राजनीतिक रूप से राजद के प्रभावशाली माने जाते थे।
2018 में विशेष अदालत ने सुनाई थी उम्रकैद की सजा
मामले की सुनवाई के बाद विशेष अदालत ने 15 दिसंबर 2018 को राजबल्लभ यादव को दोषी करार दिया था। इसके बाद 21 दिसंबर 2018 को उन्हें उम्रकैद की सजा सुनाई गई थी। निचली अदालत के इस फैसले के खिलाफ हाईकोर्ट में अपील की गई थी। लंबे समय तक मामला न्यायिक प्रक्रिया में रहा और आखिरकार अगस्त 2025 में पटना हाईकोर्ट ने निचली अदालत के फैसले को पलटते हुए राजबल्लभ यादव को बरी कर दिया था।
हाईकोर्ट के फैसले के बाद मिली थी राहत
पटना हाईकोर्ट ने उपलब्ध साक्ष्यों और मामले के विभिन्न पहलुओं पर विचार करने के बाद राजबल्लभ यादव को बरी किया था। हाईकोर्ट से राहत मिलने के बाद उनकी रिहाई का रास्ता साफ हुआ था। अब बिहार सरकार ने हाईकोर्ट के इसी फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है। राज्य सरकार की ओर से दाखिल एसएलपी में हाईकोर्ट के फैसले के विभिन्न बिंदुओं पर आपत्ति जताई गई है।
पीड़िता की गवाही को लेकर सरकार की अहम दलील
सुप्रीम कोर्ट में बिहार सरकार की ओर से रखी गई महत्वपूर्ण दलीलों में पीड़िता की गवाही का मुद्दा भी शामिल है। सरकार का कहना है कि मामले में पीड़िता की गवाही को विश्वसनीय मानते हुए उस पर विचार किया जाना चाहिए। राज्य सरकार का तर्क है कि यदि पीड़िता की गवाही भरोसेमंद पाई जाती है, तो केवल अन्य परिस्थितियों के आधार पर उसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। सरकार ने इसी आधार पर हाईकोर्ट के फैसले पर पुनर्विचार की मांग की है।
मैट्रिक प्रमाणपत्र से उम्र निर्धारण पर सवाल
राज्य सरकार ने पीड़िता की उम्र निर्धारित करने के लिए उसके मैट्रिक प्रमाणपत्र को भी महत्वपूर्ण दस्तावेज बताया है। सरकार का कहना है कि यह दस्तावेज निचली अदालत की कार्यवाही में मौजूद था और आरोपी पक्ष की ओर से इसे फर्जी नहीं बताया गया था। सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के समक्ष सवाल उठाया है कि जब उम्र निर्धारण से जुड़ा दस्तावेज रिकॉर्ड में मौजूद था, तो केवल मेडिकल रिपोर्ट के आधार पर उम्र के संबंध में निष्कर्ष निकालना कितना उचित था?
मेडिकल रिपोर्ट को लेकर भी सरकार ने जताई आपत्ति
सरकार ने हाईकोर्ट के फैसले में संदर्भित महिला डॉक्टर की मेडिकल रिपोर्ट को लेकर भी सवाल उठाया है। राज्य सरकार का दावा है कि जिस रिपोर्ट पर हाईकोर्ट के फैसले में भरोसा किया गया, वह कथित तौर पर अदालत के समक्ष विधिवत पेश नहीं की गई थी और कोर्ट रिकॉर्ड का हिस्सा भी नहीं थी। सरकार ने इसी बिंदु को आधार बनाते हुए सुप्रीम कोर्ट के समक्ष सवाल उठाया है कि न्यायिक रिकॉर्ड का हिस्सा नहीं रहे किसी दस्तावेज के आधार पर आरोपी को राहत देना कितना उचित था?
दो सप्ताह बाद फिर होगी सुनवाई
सुप्रीम कोर्ट में हुई सुनवाई के बाद मामले को आगे की सुनवाई के लिए करीब दो सप्ताह बाद सूचीबद्ध किया गया है। ऐसे में अगली सुनवाई महत्वपूर्ण मानी जा रही है।फिलहाल पटना हाईकोर्ट से मिली राहत के खिलाफ बिहार सरकार की चुनौती सुप्रीम कोर्ट के समक्ष है। अब शीर्ष अदालत सरकार की दलीलों और हाईकोर्ट के फैसले से जुड़े कानूनी पहलुओं पर क्या रुख अपनाती है, इस पर सभी की नजरें टिकी हैं।
भईया जी की रिपोर्ट