विचारधारा और संगठन के निर्णय को सहजता से स्वीकार करते हुए पटना साहेब विधानसभा क्षेत्र में अजेय और सबके अजीज बने रहने वाले नंद किशोर यादव अपने राजनीतिक जीवन की कठिन परीक्षाओं में उर्तीण होते रहे हैं। उनके जीवन पर समग्रता से दृष्टि डालें तो राजनीति के क्षेत्र में कार्य करने वाले कार्यकर्ताओं के लिए वे एक प्रतिमान हैं।
वर्ष 1990 के विधानसभा चुनाव के समय भारतीय जनता पार्टी ने पहले उन्हें टिकट दे दिया था, इसके बाद पार्टी ने उनसे टिकट वापस लेकर विमलेश सिंह को प्रत्याशी बना दिया। उन्होंने पार्टी को न केवल टिकट लौटाया बल्कि संगठन में पूर्ववत काम करते रहे। टिकट पाने के लिए राजनीतिक कार्यकर्ताओं के बीच गलाकाट प्रतिस्पर्धा के युग में यह सामान्य बात नहीं है। भाजपा के विमलेश सिंह प्रत्याशी बने थे। लेकिन, जनता दल के महताब लाल सिंह से वे लगभग सात हजार मतों से हार गए थे। इसके बाद 1995 के चुनाव में भाजपा ने पटना पूर्व से नंदकिशोर यादव को अपना प्रत्याशी बनाया और वे विजयी हुए। इसके बाद से वे सभी चुनाव में विजयी होते रहे।
संगठन की कसौटी पर खर्रा उतरने वाले नंदकिशोर यादव को सामाजिक-राजनीतिक यात्रा की प्रेरणा तरूणावस्था में ही एक गीत से मिली थी। स्कूल के दिनों में आरएसएस से जुड़े उनके एक मित्र और सुविख्यात वरिष्ठ पत्रकार कुमार दिनेश से उन्होंने एक गीत सुना था।
निज गौरव को निज वैभव को,
क्यों हिन्दू बहादुर भूल गए,
उपदेश दिया जो गीता में,
क्यों सुनना सुनाना भूल गए,
रावण ने सीया चुराई तो,
हनुमान ने लंका जलाई थी,
अब लाखों सीते हरी गई,
क्यों लंका जलाना भूल गए…
इस गीत के शब्द तरूण नंदकिशोर के अंतर्मन में विचार बीज बन कर ऐसा बैठा कि वे इस प्रकार के गीत गाये जाने वाले स्थान यानी आरएसएस की शाखा में नियमित जाने लगे। संघ की शाखा में मिले संस्कारों ने नंदकिशोर के आंतरिक और वाह्य व्यक्तित्व की ऐसी रचना की कि वे सबके हो गए और उनके निर्वाचन क्षेत्र के लोग उनके हो गए। पटना साहेब में मित्र, अभिभावक, चाचा, नंदू भईया जैसे आदर व स्नेह के शब्दों से उनका लोग संबोधन करते हैं।
बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के लिए भारतीय जनता पार्टी ने प्रत्याशियों के नामों की अपनी पहली सूची जारी की तो पटना साहेब से पार्टी के बड़े नेता नंदकिशोर यादव का नाम नहीं था। पटना साहेब सीट से सात बार चुनाव जीतने वाले नंद किशोर यादव का नाम नहीं होने पर सामान्य लोग भौंचक थे। भाजपा के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष, कई महत्वपूर्ण विभागों के मंत्री, बिहार में एनडीए के संयोजक और वर्तमान में बिहार विधानसभा अध्यक्ष पद पर आसीन नंद किशोर यादव की जगह पार्टी ने रत्नेश कुशवाहा जैसे बिल्कुल नये कार्यकर्ता को उम्मीदवार बना दिया। पार्टी के इस फैसले को लेकर पटना साहेब के मतदाताओं में आक्रोश मुखरित होने लगा था। परन्तु नंद किशोर यादव ने बिना देर किए बयान जारी कर संगठन के सामने आ रही विकट समस्या का समाधान कर दिया।
नंद किशोर यादव ने स्पष्ट शब्दों में कहा-मैं भारतीय जनता पार्टी के निर्णय के साथ हूं. पार्टी ने मुझे बहुत कुछ दिया है, कोई शिकायत नहीं है. नई पीढ़ी का स्वागत और अभिनंदन है। इस प्रकार वे अपनी व्यक्तिगत इच्छा और आकांक्षा को दरकिनार करते हुए संगठन के साथ खड़े हो गए। आज के दौर की राजनीति में ऐसे उदाहरण बहुत कम ही दिखते हैं।
नंद किशोर यादव बिहार में भाजपा की पुरानी पीढ़ी के नेताओं में शामिल हैं। युवावस्था में ही उन्हें भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष की जिम्मेदारी दी गयी थी। तब सुशील कुमार मोदी, अश्विनी चौबे, नवीन किशोर सिन्हा और प्रेम कुमार जैसे नेता उनके समकालीन थे। समकक्ष या उम्र में थोड़े ही अंतर के साथ अध्यक्ष पद की जिम्मेदारी को सफलता पूर्वक निर्विवाद निर्वहन बड़ी बात थी। अपने सौम्य व्यक्तित्व व व्यवहार कुशलता से उन्होंने भाजपा संगठन के विस्तार और मजबूत बनाने में अहम भूमिका निभायी। उस दौर में बिहार भाजपा के सर्वमान्य नेता कैलाशपति मिश्रा थे। जनसंघ के समय से संगठन में अपना सर्वस्व न्योछार करने वाली पुरानी पीढ़ी की जगह नयी पीढ़ी को दायित्व देने के उस कालखंड में नंद किशोर यादव का अध्यक्ष के रूप में काम करना उतना आसान नहीं था। उस परिस्थिति में नंद किशोर यादव ने अध्यक्ष पद की गरिमा को न केवल अक्षुण रखा बल्कि अपने समन्वयकारी व्यवहार से उसको विस्तार दिया।
नंद किशोर यादव के अध्यक्षीय काल में बिहार में लालू प्रसाद यादव और राबड़ी देवी का शासन था। अपराध, भ्रष्टाचार के विरोध में भाजपा सड़क और सदन से लेकर न्यायालय तक संघर्ष कर रही थी। सरकार का विरोध करने वालों पर हमले भी होते थे। उस दौर में पार्टी के सामान्य कार्यकर्ताओं के मनोबल को बनाये रखने की विशेष जिम्मेदारी अध्यक्ष की ही थी।
नंद किशोर यादव ने अपने जीवन में व्यक्ति के उपर विचारधारा और संगठन को रखा। यही कारण था कि सामान्य कार्यकर्ता उनसे हृदय से जुड़े रहे। सामान्य मतदाता उनके स्थायी समर्थक बन गए थे। ऐसे में उनका चुनाव मतदाता स्वयं लड़ते थे। नीतीश कुमार के साथ उनके व्यक्तिगत संबंध बहुत अच्छे हैं लेकिन 2013 में जब नीतीश कुमार ने पहली बार भाजपा से गठबंधन तोड़ा, तब नंद किशोर यादव को विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष बनाया गया, तब उन्होंने विधानसभा में नीतीश कुमार को कई बार ऐसा घेरा था कि वे असहज हो गए थे। इससे पहले यह पद लंबे समय तक सुशील कुमार मोदी के पास था।
भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष, मंत्री, विधानसभा अध्यक्ष जैसे महत्वपूर्ण पदांे की जिम्मेदारी संभालने के बावजूद अपने निर्वाचन क्षेत्र के लोगों से उनका सीधा व जीवंत संबंध हमेशा बना रहा। शादी-विवाह, निधन जैसे सुख-दुख के अवसरों पर वे अपने लोगों के साथ खड़े रहते हैं। काफी व्यस्तता के बावजूद चौबीस घंटे में कम से कम एक घंटा वे अपने क्षेत्र के लोगों के लिए रखते थे। निर्धारित समय पर बिना किसी सूचना के कोई भी उनसे मिल सकता है। यह उनके जीवन व सिस्टम का अहम हिस्सा बन चुका है।
संगठन के संस्कार के साथ, लोकजीवन में आने वाली समस्याओं के समाधान के लिए संघर्ष की यात्रा में निर्मित उनके व्यकितत्व में कुछ ऐसी विशेषताएं है जो प्रबल झंझावत के समय भी उन्हें स्थिर रखा। आपातकाल के विरोध में जेपी आंदोलन में वे शामिल थे। उस समय शादी हो गयी थी, गौना की बारी आयी तब पुलिस हाथ में हथकड़ी लगाकर उन्हें गिरफ्तार कर ले गयी। ऐसी विषम परिस्थिति में उनके पिता लोटा लेकर ससुराल गए और पत्नी किरण की विदाई कराकर घर लाए। ये परीक्षा की घड़ी थी। जीवन की ऐसी कई परीक्षाओं में उर्तीण होने वाले नंद किशोर यादव राजनीति के क्षेत्र में कार्य करने वाले कार्यकर्ताओं के लिए एक प्रतिमान हैं।