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मंथन

चुनावी रण के अजेय योद्धा

K.K Ojha
Last updated: December 30, 2025 4:48 pm
By K.K Ojha 127 Views
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15 Min Read
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अपने स्थापना काल में ही ठोकठाक कर निश्चित की गयी रीति-नीति पर भाजपा चलती रही और चार दशकों के बाद यह विश्व की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी बन गयी है। भाजपा ने अपनी मूल पूंजी विचारधारा को सुरक्षित रखते हुए इसके साथ नयी पूंजी के निवेश की कला विकसित की। इसके सहारे अपना विस्तार किया। विस्तार के बाद भी भाजपा की आत्मा और नीति निर्देशक तत्व उसकी विचारधारा ही है। इसके आलोक में अहर्निश साधना से इसके पास प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, अमित शाह, राजनाथ सिंह, योगी आदित्य नाथ, नीतीन गडकरी, देवेंद्र फडनवीस, सुशील कुमार मोदी, प्रेम कुमार, नंद किशोर यादव, अश्विनी चौबे, जनार्दन सिंह सिग्रीवाल जैसे चुनावी रण के ऐसे अजेय योद्धाओं की बहुत लंबी सूची है जिनकी कभी किसी चुनाव में हार नहीं हुई। बिहार विधानसभा चुनाव परिणाम ने भाजपा की इस विशेषता को और पुख्ता किया है। इस मामले में भारत की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस, वामदल या समाजवादी पार्टियां, भाजपा के सामने कहीं नहीं टिकती दिखती हैं।

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स्वतंत्रता सेनानियों की यश-कीर्ति से जगमग करती कांग्रेस को कभी भारत की सत्ता का पर्याय मान लिया गया था। इंदिरा गांधी सरकार द्वारा आरोपित आपात काल के बाद 1977 के आम चुनाव में कांग्रेस का बुरा हाल हुआ था। इसके बाद कांग्रेस की अजेय वाली छवि का बुरा हाल हो गया।

भारत में कांग्रेस का विकल्प देने के प्रयास के तहत राष्ट्रीय विचारधार पर आधारित भारतीय जनसंघ की स्थापना हुई थी। जब आपातकाल की घोषणा कर भारत के लोगों के संवैधानिक अधिकार छीन लिए गए तब जनसंघ ने लोकतंत्र की रक्षा के लिए अपने अस्तितव को नवस्थापित जनता पार्टी में विलीन कर दिया था। विभिन्न विचार धाराओं के समूहों को जोड़कर बनी जनता पार्टी अपने अंतर्विरोधों के कारण मात्र तीन वर्षों में ही बिखर गयी। इसके बाद जनसंघ के राजनीतिक विचार से जुड़े लोगांे ने भारतीय जनता पार्टी की स्थापना कर आगे की राजनीतिक यात्रा शुरू कर दी।

कभी अजेय माने जाने वाली कांग्रेस अब सिमटती जा रही है। वहीं भारतीय जनता पार्टी में चुनावी रण के अजेय योद्धाओं की लंबी सूची है। यह कैसे हुआ? इस प्रश्न के उत्तर में भाजपा के लगातार फैलाव और मजबूती का राज छिपा हुआ है।

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इंदिरा गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस को हराने के बाद भारत में जनता पार्टी की सरकार बनी थी। जनता पार्टी में पूर्व कांग्रेसियों व समाजवादियों के साथ ही आरएसएस से जुड़े जनसंघ के नेताओं व कार्यकर्ताओं की बड़ी संख्या थी। जनता पार्टी में होते हुए भी उनकी अपनी पहचान थी। जनता पार्टी के कार्यकर्ता के रूप में राजनीतिक कार्यक्रम संचालन में उनकी भूमिका थी। इसके साथ ही वे आरएसएस के स्वयंसेवक के रूप में सामाजिक-सांस्कृतिक कार्यक्रमों में पूर्ववत भाग लेते रहे। कुछ ही दिनों में जनता पार्टी में विचारधारा और बड़े नेताओं के अहंकार और स्वार्थ को लेकर आंतरिक संघर्ष तेज हो गया। जनता पार्टी के एक घड़े ने दोहरी सदस्यता पर कड़ी कार्रवाई की मांग उठा दी। जनसंघ से जुड़े कार्यकर्ताओं ने आरएसएस को एक गैरराजनीतिक सांस्कृतिक संगठन बताते हुए उसके साथ अपने संबंधों को देश और समाज हित में बताया लेकिन, यह विवाद बढ़ता गया और अंततः आरएसएस के विचारधारा को मानने वाले लोगों ने जनता पार्टी को छोड़कर भारतीय जनता पार्टी की स्थापना की।

जनसंघ के समय की अपनी मूल पूंजी यानी विचारधारा पर कायम रहते हुए हजारों कार्यकर्ताओं ने फिर से एक राजनीतिक दल के रूप में संगठित होने का निर्णय ले लिया। जनसंघ से जनता पार्टी में आने वाले हजारों कार्यकर्ताओं ने एकसाथ बैठने का निर्णय लिया। भारत की राजधानी दिल्ली के विशाल फिरोज शाह कोटला स्टेडियम में 5 एवं 6 अप्रैल, 1980 को बैठक हुई जिसमें तीन हजार से अधिक कार्यकर्ताओं नेे भाग लिया। दो दिनों के विमर्श के बाद 6 अप्रैल 1980 को सर्वसम्मति से भारतीय जनता पार्टी की स्थापना की घोषणा की गई। लेकिन, जनसंघ के समय के मूल पूंजी में कुछ बाहरी निवेश की भी योजना बनी। यह चुनावी राजनीति की व्यावहारिक अवश्यकताओं को पूरा करने की दिशा में एक सशक्त कदम था। अपने राष्ट्रीय विचार के अनुकूल भारत की व्यवस्था व तंत्र को बदलने के लक्ष्य को पूरा करने के संकल्प के साथ भारतीय जनता पार्टी ने जो यात्रा शुरू की वह अनवरत जारी रही। दूसरी पीढ़ी आते-आते भारतीय जनता पार्टी में चुनावी रण के अजेय योद्धाओं की लंबी सूची तैयार होने लगी। यह अनथक, अनवरत साधना का परिणाम हैं।

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विचारधारा की मूल पूंजी के साथ भाजपा ने युग की आवश्यकता के अनुसार बाहर से निवेश करने की प्रकिया अपनी स्थापना काल से ही शुरू कर दी थी। भाजपा के नीति निर्धारकों ने नेहरू-इंदिरा के शासन काल में गढ़े गए औपनिवेशिक प्रतिमानों व अवधारणाआंे के व्यापक प्रभाव का आंकलन कर लिया था। इसके साथ ही उनके शासन काल में भारत में विदेशी शक्तियों द्वारा भारतीयों को उनके अपनों के ही विरूद्ध खड़े करने के लिए चलाये गए बौद्धिक व वैचारिक षड्यंत्र की भी जानकारी थी। उसका जनमानस पर दुष्प्रभाव का भी उन्हें अनुमान था।

अपने स्थापना के समय भारतीय जनता पार्टी ने आरएसएस से कभी नहीं जुड़े रहने वाले नेताओं को भी महत्व देने की नीति अपनायी। भाजपा के इस नीति की चर्चा, प्रसिद्ध राजनीति विज्ञानी और पत्रकार नलिन मेहता ने अपनी चर्चित पुस्तक ‘द न्यू बीजेपी’ में की है। वे लिखते हैं कि बीजेपी ने पूर्व कानून मंत्री शांति भूषण, मशहूर वकील राम जेठमलानी, सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज केएस हेगड़े और पूर्व कांग्रेस नेता सिकंदर बख्त का न सिर्फ खुले दिल से स्वागत किया बल्कि उन्हें मंच पर भी सम्मान से बैठाया। बड़ी बात ये थी कि पार्टी का संविधान बनाने वाली तीन सदस्यीय समिति के दो सदस्य संघ से बाहर के थे।’

आरएसएस के बड़े अधिकारी अक्सर कहते हैं कि हम हिंदु समाज में एक अलग संगठन नहीं हैं बल्कि संपूर्ण हिंदू समाज का संगठन है जो उसमें विलीन हो जाने को तैयार है। इसके लिए हमारे दरवाजे सभी के लिए खुले है। जैसा मिला वैसा लिया, जैसा चाहा वैसा बनाया की नीति पर हम चलते हैं। भाजपा इसी कथन को व्यवहार में उतार रही है-जैसा मिला वैसा लिया, जैसा चाहा वैसा बनाया। संभव है कि इस प्रयोग में अपेक्षित सफलता नहीं मिली हो लेकिन, भाजपा की व्यापकता तो बढ़ी ही है।

स्थापना के समय से भाजपा से जुड़ने वाले राम जेठमलानी विभाजन के बाद सिंध से शरणार्थी के तौर पर आए थे। वहीं सिकंदर बख््त दिल्ली के मुसलमान थे। सिकंदर बख्त ने ही भारतीय जनता पार्टी के संस्थापक अध्यक्ष के तौर पर अटल बिहारी वाजपेयी के नाम का प्रस्ताव रखा था। उनके प्रस्ताव का समर्थन राजस्थान के बीजेपी नेता भैरों सिंह शेखावत ने किया था।

पार्टी के नामाकरण को लेकर भी संगठन से जुड़े कार्यकर्ताओं में ऊपर से लेकर नीचे तक विमर्श हुआ था। कुछ लोगों का सुझाव था कि पार्टी का नाम फिर से जनसंघ ही रखा जाए। लेकिन, व्यावहारिक दृष्टि से विचार के बाद पार्टी का नया नाम भारतीय जनता पार्टी रखने पर सर्वानुमति हो गयी थी।

भाजपा ने अपने स्थापना काल में ही ‘गांधीवादी समाजवाद’ को अपनी पार्टी का विचार घोषित कर दिया। पार्टी के अंदर इस वैचारिक घोषणा का विरोध भी हुआ। संघ पृष्ठभूमि वाले भाजपा के पुराने और समर्पित कार्यकर्ता ‘समाजवाद’ शब्द का विरोध कर रहे थे क्योंकि इससे कम्युनिस्टों के साथ वैचारिक मेलजोल का आभास मिलता था। भाजपा की बड़ी नेता विजयाराजे सिधिया भी इसका कड़ा विरोध कर रही थीं। कार्यकर्ता ये कहने लगे थे कि ‘गांधीवादी समाजवाद’ को अपनाकर भाजपा कांग्रेस की नकल कर रही है।

इसी बीच दिसंबर, 1980 के अंतिम सप्ताह में मुम्बई में भारतीय जनता पार्टी ने अपना पूर्ण अधिवेशन कराने का निर्णय लिया। इसमें पूरे देश से पार्टी के कार्यकर्ताओं को आमंत्रित किया गया था। उस प्रथम अधिवेशन में भाजपा के मंच पर श्यामाप्रसाद मुखर्जी और दीनदयाल उपाध्याय के चित्रों के साथ-साथ जयप्रकाश नारायण के चित्र भी लगे हुए थे। लालकृष्ण आडवाणी ने अपनी आत्मकथा ‘माई कंट्री, माई लाइफ’ में उस अधिवेशन की स्मृतियों का जिक्र करते हुए लिखा हैं कि मुम्मबई अधिवेशन तक देश भर में 25 लाख लोग भारतीय जनता पार्टी के सदस्य बन चुके थे। जनसंघ जब चरम पर था तब पार्टी के सदस्यों की संख्या 16 लाख थी। मात्र सात-आठ माह के प्रयास में 16 लाख से बढ़कर 25 लाख कार्यकर्ता का होना उत्साह वर्द्धक था। लेकिन, भाजपा के प्रमुख नेता यह जानते थे कि यह आरएसएस के मजबूत नेटवर्क व कार्यकर्ताओं के मौन प्रयास से ही संभव हुआ था। आरएसएस के स्वयंसेवकों को सहमत करते हुए भाजपा सीमोलंघन जैसे इस बदलाव की तैयारी कर रही थी।

इंडिया टुडे की 31 जनवरी, 1981 के अंक में ‘बीजेपी कन्वेंशन, ओल्ड वाइन इन न्यू बॉटल’ शीर्षक आलेख में वस्तु स्थिति के आंकलन का एक प्रयास किया गया है। उस आलेख में लिखा गया था कि बीजेपी के कुल 54,632 प्रतिनिधियों में 73 फीसदी पांच राज्यों महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, राजस्थान, उत्तर प्रदेश और बिहार से आए थे। भारी संख्या में जुटे कार्यकर्ताओं को ठहराने के लिए मुम्बई के बांद्रा रिक्लेमेशन क्षेत्र में एक अस्थायी बस्ती बसायी गयी थी।

भाजपा का प्रथम अधिवेशन 28 दिसंबर 1980 को शुरू हुआ था। अधिवेशन स्थल पर 40 हजार कार्यकर्ताओं के लिए भोजन की व्यवस्था थी। जबकि दोपहर तक 44 हजार प्रतिनिधि सभास्थल पर पहुंच चुके थे। मतलब प्रथम अधिवेशन में ही उत्साहवर्द्ध्रक सफलता मिली थी।

अधिवेशन स्थल पर अटल बिहारी वाजपेयी को सजी हुई खुली जीप में लाया गया था। शिवाजी पार्क तक चार किलोमीटर के रास्ते को भव्यता के साथ सजाया गया था। स्थानीय लोगों और हिंदु राष्ट्रवाद की भावना को मूर्त रूप देने के लिए मराठी सैनिक की वेशभूषा में एक व्यक्ति घोड़े पर सवार होकर सबसे आगे चल रहा था। उसके पीछे ट्रकों का एक काफिला था, ट्रकों पर दीनदयाल उपाध्याय और जय प्रकाश नारायण के चित्र लगे हुए थे। इस शोभायात्रा के माध्यम से भाजपा यह संदेश दे रही थी कि उसके पास भी बड़े जनाधार वाले नेता हैं। उनकी विचार यात्रा में जेपी भी अब शामिल हो गए हैं। यानी भाजपा लोहिया-जेपी के अनुयायियों को जोड़ने की दिशा में कदम बढ़ा चुकी थी। आरएसएस के केंद्रीय अधिकारी भाऊराव देवरस की उपस्थिति संघ के स्वयंसेवकों की आशांका को निर्मूल करने के लिए काफी थी।

अधिवेशन में अटल बिहरी वाजपेयी ने इसे और स्पष्ट करते हुए कहा था कि बीजेपी के समाजवाद का आशय दीनदयाल उपाध्याय के ‘जनकल्याणवाद’ और ‘एकात्म मानववाद’ से है। अधिवेशन के अंतिम दिन 30 दिसंबर की रात अपने भाषण में वाजपेयी ने घोषणा की थी कि बीजेपी ने बाबा साहब आंबेडकर के समता सिद्धांत को अपना लिया है। उन्होंने अपनी पार्टी की ‘सकारात्मक धर्मनिरपेक्षता’ की अवधारणा भी स्पष्ट की थी।

इसके साथ ही अटल बिहारी वाजपेयी ने कहा था कि ‘जनता पार्टी’ टूट गई है लेकिन हम जयप्रकाश नारायण के सपनों को कभी टूटने नहीं देंगे।

स्थापना के एक वर्ष बाद ही अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली भाजपा को लगा कि उन्हें संघ के साये से बाहर आना चाहिए। स्वयंसेवकों द्वारा स्थापित विविध संगठन स्वयं को संघ का आनुषांगिक संगठन मानते है। भाजपा भी स्वयं को आरएसएस का एक आनुषांगिक संगठन मानता हैं। संघ और भाजपा के बीच भावनात्मक और संगठनात्मक संबंध का आधार संगठन मंत्री व्यवस्था है। जब अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली भाजपा अपनी स्थापना के कुछ ही दिनों बाद अन्य राजनीतिक दलों की तरह खुले वैचारिक वातावरण में काम करने की इच्छा व्यक्त की तब संघ ने अपने प्रचारकों को भाजपा के दायित्व से वापस बुला लिया था। संयोगवश 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद पूरे भारत में कांग्रेस के पक्ष में एक भावनात्मक लहर चल पड़ी। उसी लहर में आमचुनाव हुआ जिसमें अटल बिहारी वाजपेयी सहित भाजपा के सभी बड़े नेता हार गए। भाजपा मात्र 2 सीटों वाली पार्टी बनकर रह गयी थी। भाजपा पुनः अपने वैचारिक अधिष्ठान की और लौटी। अपनी मूल राष्ट्रीय विचारधार पर कायम रहते गठबंधन की राजनीति के सहारे सत्ता के शीर्ष तक पहुंची। नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा ने अपने दम पर बहुमत हासिल किया। कभी अटल बिहारी वाजपेयी ने वह सपना देखा था। उनके जीवन में ही नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा ने उसे साकार कर दिखाया।

भाजपा के प्रथम अधिवेशन के समापन भाषण में अटल बिहारी वाजपेयी ने कहा था – ‘‘पश्चिमी घाट पर समुद्र के किनारे खड़े होकर मैं भविष्य के बारे में विश्वास के साथ कह सकता हूं कि अंधेरा छंटेगा, सूरज निकलेगा और कमल खिलेगा।

TAGGED: अमित शाह, अश्विनी चौबे, इंदिरा गांधी, जनार्दन सिंह सिग्रीवाल, देवेंद्र फडनवीस, नंद किशोर यादव, नीतीन गडकरी, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, प्रेम कुमार, योगी आदित्य नाथ, राजनाथ सिंह, सुशील कुमार मोदी
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