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मंथन

चुनावी ग्रामर और केमिस्ट्री बनाते हैं विजेता

Swatva Desk
Last updated: January 2, 2026 1:31 pm
By Swatva Desk 326 Views
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18 Min Read
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संविधान लागू होने के बाद 13 मई 1952 को भारत के प्रथम लोकसभा गठन को लेकर आमचुनाव संपन्न हो गया था। भारत के 18 वें लोकसभा के गठन को लेकर 19 अप्रैल 2024 से शुरू आम चुनाव सात चरणों में 1 जून 20024 को संपन्न हो गया। इन 72 वर्षों की चुनावी यात्रा में राजनीति में बहुत से सकारात्मक और नकारात्मक प्रयोग हुए हैं। इन प्रयोगों को जीत-हार की केमिस्ट्री और ग्रामर के रूप में देखा जाता है। यह बहुत जटिल है और इसकी परतों को समझने और समझाने के लिए गहन शोध की आवश्यकता पड़ती है। भारत के चौथे यानी 1967 के चुनाव में कांग्रेस के एक छत्र राज के विरोध में गठबंधन की राजनीति का प्रयोग हुआ। इसमें समाजवादी, राष्ट्रवादी और साम्यवादी सभी एकसाथ हो गए थे। यह चुनावी केमिस्ट्री का प्रयोग था। भारत में चुनावी मौसम में किसी दल के विरोध या पक्ष में आंधी तूफान उठने की बात पुरानी हो गयी है लेकिन इसके बीच प्रत्याशियों के अपने प्रबंधन, छवि और नेटवर्क से भी विपरीत या अनुकूल परिस्थितियों में जीत-हार होते रहे हैं।
इसके लिए जवाहर लाल नेहरू, इंदिरा गांधी से लेकर कभी चुनाव नहीं हारने वाले लालकृष्ण आडवाणी, चुनाव हार कर भी भारत का सबसे लोकप्रिय नेता बने रहने वाले अटल बिहारी वाजपेयी, चुनावी राजनीति की अजेय योद्धा माने जाने वाले बाबू जगजीवन राम, सुमित्रा महाजन, माधव राव सिंधिया, खगपति प्रधानी, गिरीधर गमांग, पीए संगमा, शरद पावर जैसे पुराने व प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, अमित शाह जैसे वर्तमान में भारत के सत्ता के केंद्र बने राजनेताओं की संसदीय जीवन यात्रा के विविध पक्षों को समझना होगा।
भारतीय राजनीति में कई ऐसे राजनेता हैं जिन्होंने अपने जीवन का कोई भी चुनाव नहीं हारा। भारत जैसे दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में चुनाव कराना एक बहुत ही जटिल और जोखिम भरा काम है। बीच के कालखंडों में भारत में चुनावी हिंसा एक बड़ी समस्या बनकर उभरी थी। लेकिन, वर्ष 2019 एवं 2024 का लोकसभा चुनाव सात चरणों में कराया गया। बिहार और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में पूर्व की तुलना में शांतिपूर्ण चुनाव कराने में सफलता मिली है। बूथ लूट के मामले अब सामने नहीं आते।
भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू अपने जीवन का कोई भी चुनाव नहीं हारे थे। लेकिन, उनकी पुत्री को हार का सामना करना पड़ा। सत्ता शीर्ष पर आसीन नेताओं के तानाशाह हो जाने पर लाख प्रयास के बाद भी जनता विरोध में खड़ी हो जाती है। जनअवधारणा बनते ही भारत का लोक उसके विरोध में खड़ा हो जाता है। इसके बाद विरोधी दल लोक के पीछे-पीछे चलने लगते हैं। आपातकाल के बाद इंदिरा गांधी की हार से इस बात को लोग प्रमाण सिद्ध मानने लगे हैं।
वहीं इंदिरा गांधी की हत्या के बाद भावना की लहर पर सवार राजीव गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस को भारत के मतदाताआंे ने प्रचंड बहुमत देकर विजयी बना दिया था। जब राजीव गांधी की सरकार पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे तब पांच साल में ही राजीव गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस का 1989 के चुनाव में बुरा हाल हो गया।
अब भारतीय राजनीति के ऐसे नेताओं की संसदीय जीवन यात्रा की चर्चा करते हैं जो कई बार चुनाव लड़े और विजयी होते रहे। कुछ तो ऐसे हैं जिन पर भारत में उठने वाले चुनावी लहर का भी असर नहीं हुआ।
भारत में तीसरी लोकसभा के सदस्यों को चुनने के लिए 19 से 25 फरवरी 1962 के बीच आम चुनाव हुए थे। पिछले दो चुनावों के विपरीत, प्रत्येक निर्वाचन क्षेत्र में एक ही सदस्य को चुना जाना था। कांग्रेस को चुनौती देने के लिए भारतीय जनसंघ और सोशलिस्ट पार्टी जैसे दल भी मैदान में आ गए थे। इसके बावजूद आजादी की लडाई का नेतृत्व करने वाली कांग्रेस से भारत के लोग भावनात्मक रूप से जुड़ा महसूस करते थे। ऐसे में जवाहरलाल नेहरू ने अपने तीसरे और अंतिम चुनाव अभियान में भी शानदार जीत हासिल की थी। इस चुनाव में​​ भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस को 44.7 प्रतिशत वोट मिले थे और उसने 494 निर्वाचित सीटों में से 361 सीटें जीत ली थीं। लेकिन, पिछले दो चुनावों की तुलना में इस चुनाव में कांग्रेस की जमीन थोड़ी खिसकती दिखी थी। यह मामूली अंतर था और लोकसभा में अभी भी उसके पास 70 प्रतिशत से अधिक सीटें थीं।

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Rajiv Gandhi
1962 के लोकसभा चुनाव में अटल बिहारी वाजपेयी अपने एक बयान के कारण हार गए थे। बलरामपुर लोकसभा सीट से उनका सामना कांग्रेस की सुभद्रा जोशी से था। सुभद्रा जोशी अपनी सभाओं में कहती थीं कि चुनाव जीतने के बाद वह माह के सभी तीस दिन लोगों की सेवा में जुटी रहेंगी। यह बात अटलजी तक पहुंची तो विनोदी स्वभाव वाले अटलजी ने सार्वजनिक भाषण में कह दिया कि माह में कुछ दिन महिलाएं सेवा के योग्य नहीं रहतीं तो वह सेवा कैसे करेंगी? इस टिप्पणी के बाद बलरामपुर के मतदाता अटलजी के खिलाफ हो गए और उन्हें चुनाव हरा दिया। यह घटना चुनावी राजनीति के ग्रामर यानी शब्द अनुशासन की ओर संकेत करता है। इसी प्रकार कांग्रेस के नेता मणीशंकर अयैर ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को नीच आदमी कह दिया था। उनके इस बयान को लेकर भारत के मतदाताओं पर बुरा प्रभाव पड़ा था।
भारतीय जनसंघ ने अपने नेता पं. दीनदयाल उपाध्याय को 1963 में जौनपुर से लोकसभा के उपचुनाव में प्रत्याशी बनाया था। जनसंघ के कार्यकर्ता व चुनावी रणनीतिकारों ने प्रचार में उन्हें ब्राह्मण नेता बताना शुरू कर दिया। जब इस बात की जानकारी दीनदयालजी तक पहुंची तब वे दुखी हो गए। इसके बाद वे चुनावी सभाओं में कहने लगे कि यदि कोई ब्राहमण या अपनी जाति का मानकर हमें वोट देना चाहता है तो कृपा कर हमें वोट नहीं दें। दीनदयालजी का वह वक्तव्य राजनीति को संस्कारित करने का एक प्रयास था। लेकिन, उनका वह बयान चुनाव जीतने के लिए राजनीति की केमिस्टीª को ही बिगाड़ दिया। वे चुनाव हार गए थे।
भारतीय जनता पार्टी के संस्थापकों में से एक और अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में उप-प्रधानमंत्री रहे लाल कृष्ण आडवाणी ने संघ के प्रचारक के रूप में अपना सार्वजनिक जीवन शुरू किया था। प्रचारक के रूप में लंबे समय तक काम करने वाले आडवाणी जी के पास चुनाव को लेकर जनता के मिजाज को भांप लेने की क्षमता थी। इसके साथ ही उनका अपना प्रबंधन क्षमता और नेटवर्क भी था। 1970 से 89 तक वे चार बार राज्यसभा सदस्य रहे। वहीं, 1986 से लेकर 1991 तक भाजपा के अध्यक्ष भी रहे। इसके बाद 9वीं लोकसभा के लिए 1989 में वे पहली बार नई दिल्ली से चुनाव लड़े और जीत हासिल की। इसके बाद 1991 में 10वीं, 1996 में 11वीं, 1998 में 12वीं, 1999 में 13वीं, 2004 में 14वीं, 2009 में 15वीं और 2014 में 16वीं लोकसभा चुनाव में वे भाजपा के प्रत्याशी बने और भारी मतों से विजयी होते रहे। उम्र जनित अस्वस्थता के कारण वे 2019 के बाद चुनावी राजनीति से अलग हो गए। चुनावी राजनीति के वे अजेय योद्धा हैं। देश की राजनीति में भाजपा को इस शिखर तक लाने वालों में आडवाणीजी अब मार्गदर्शक है।
बिहार के आरा शहर के पास चंदवा गांव में एक दलित परिवार में 5 अप्रैल 1908 को जन्म लेने वाले बाबू जगजीवन राम मात्र 28 वर्ष की उम्र में 1936 में बिहार विधान परिषद के सदस्य बन गए थे। 1937 के चुनावों में मंत्री पद के लालच को ठुकराया और अंग्रेजों के खिलाफ आंदोलनों में सक्रिय हो गए थे। भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान गिरफ्तार कर लिए गए थे। वर्ष 1946 में संविधानसभा के सदस्य बन गए थे। यहां से उनकी संसदीय यात्रा शुरू होता है। इसके बाद 1952 के प्रथम आमचुनाव में से कांग्रेस प्रत्याशी के रूप में सासाराम क्षेत्र से चुनावी मैदान में उतरे। वर्ष 1946 से लेकर 1986 में देहांत तक, लगभग 40 वर्षों तक वे लगातार संसद के सदस्य रहे। आपातकाल के दौरान वे इंदिरा गांधी के साथ कांग्रेस में बने रहे। आपातकाल के बाद जब 1977 में आम चुनाव की घोषणा हुई तब वे ‘कांग्रेस फार डेमोक्रेसी’ का गठन कर अपने समर्थकों के साथ जनता पार्टी में शामिल हो गए। इंदिरा गांधी की कांग्रेस के विरोध में पूरे देश में चल रही लहर में भी वे लोकसभा चुनाव जीत गए। मात्र तीन वर्ष बाद ही जब जनता पार्टी के बिखरने के कारण 1980 में लोकसभा चुनाव हुआ तब वे कांग्रेस के समीप आ गए और चुनाव जीत गए। इंदिरा गांधी की हत्या के बाद पूरे भारत में कांग्रेस के पक्ष में लहर थी, उसी में 1984 में लोकसभा का आम चुनाव हुआ जिसमें अटल बिहारी वाजपेयी, चंद्रशेखर, कर्पूरी ठाकुर जैसे नेता भी चुनावहार गए थे लेकिन जगजीवन राम अपने परंपरागत सीट से चुनाव जीत गए थे। 1952 में पहले लोकसभा चुनाव में जीत हासिल करने के बाद 1984 तक लगातार आठ बार सांसद रहे। जगजीवन राम आम मतदाता के मूड और राजनीतिक परिर्वतनों का पूर्वानुमान लगाने में सक्षम थे। इसके साथ ही अपने कटु विरोधियों के प्रति भी कभी उनके मुख से अपशब्द या कठोर शब्द नहीं निकलते थे। अपने व्यवहार से वे सभी जाति व वर्ग में अपने स्थायी समर्थकों की बड़ी टोली तैयार कर ली थी जो पार्टी की सीमा से ऊपर उठकर उनके साथ होती थी। इस प्रकार जगजीवन राम राजनीति के क्षेत्र में होने वाले परिवर्तनों के अनुसार केमिस्ट्री और ग्रामर गढ़ने की कला में दक्ष थे। लोकसभा सदस्य रहते हुए 1986 में उनका देहांत हुआ था। उनकी अंत्येष्टी में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी उनके गांव चंदवा आए थे।

ग्वालियर, मध्य प्रदेश के आखिरी महाराजा जीवाजीराव सिंधिया के बेटे माधवराव नौ बार लोकसभा सांसद रहे और कभी चुनाव नहीं हारे। पहली बार उन्होंने 1971 में गुना लोकसभा क्षेत्र से केवल 26 वर्ष की उम्र में जीत हासिल की। फिर 1977 में इमरजेंसी हटने के बाद इसी सीट से निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में सांसद बने। 1980 में उन्होंने कांग्रेस पार्टी की सदस्यता ली और तीसरी बार भी गुना से जीते। 1984 में उन्हें बिल्कुल अंतिम वक्त में ग्वालियर से उम्मीदवारी दी गई और उस वक्त उन्होंने भाजपा के अटल बिहारी वाजपेयी को भारी अंतर से शिकस्त दी। इसके बाद उन्होंने कभी गुना और कभी ग्वालियर से लोकसभा चुनाव लड़ा और हमेशा जीते। सिंधिया 5वीं से लेकर 11वीं लोकसभा तक जीतते रहे। उनके जीत का प्रमुख कारण उनका अपना जीवंत नेटवर्क था।
खगपति प्रधानी
ओडिशा के नौरंगपुर लोकसभा क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करने वाले खगपति प्रधानी नौ बार लगातार लोकसभा का चुनाव जीतते रहे। अत्यंत पीछड़े क्षेत्र में 15 जुलाई 1922 को जन्म लेने वाले प्रधानी ने इस क्षेत्र के लोगों की समस्या के लिए अपना सम्पूर्ण जीवन अर्पित कर दिया था। कांग्रेस प्रत्याशी के रूप में वे वर्ष 1967 में पहली बार चुनाव लड़े और जीते थे। इसके बाद 1971, 1977, 1980, 1984, 1989, 1991, 1996 और वर्ष 1998 के लोकसभा चुनाव में लगातार विजयी होते रहे। कांग्रेस पार्टी के नेता प्रधानी 9 बार लोकसभा सदस्य निर्वाचित हुए और लोकसभा सदस्य के रूप में ही 1999 में उनका देहांत हो गया था।
पीए संगमा
पुर्नो अगिटोक संगमा यानी पीए संगमा का जन्म आजाद भारत में 1 सितंबर 1947 को पूर्वोत्तर भारत में एक अत्यंत गरीब परिवार में हुआ था। लोकसभा स्पीकर रहे संगमा 1988 से लेकर 1990 तक मेघालय के मुख्यमंत्री भी रहे थे। 1977 में मेघालय की तुरा सीट से छठे लोकसभा चुनाव में जीत हासिल करने के बाद से लेकर 2014 तक 16वीं लोकसभा में वह कभी नहीं हारे। 4 मार्च 2016 को हृदय रोग के चलते भारतीय राजनीति के इस अध्याय का अंत हो गया। विनोदी स्वभाव वाले पीए संगमा का अपने मतदाताओं के साथ जो जीवंत संबंध था वह उन्हें कभी चुनाव नहीं हारने दिया।
सुमित्रा महाजन
सुमित्रा महाजन यानी भारतीय संसद की इकलौती ऐसी लोकसभा सदस्य जो लगातार आठ बार चुनाव जीतती रहीं। मध्य प्रदेश की इंदौर लोकसभा सीट का प्रतिनिधित्व करने वाली सुमित्रा महाजन अपने मतदाताओं के बीच ताई नाम से प्रसिद्ध हैं। उन्होंने अपने व्यवहार, सामाजिक दृष्टि, सेवा भाव और समर्पण के माध्यम से भारत की चुनावी राजनीति में एक आदर्श जनप्रतिनिधि के लिए मानक गढ़ा है। उम्र के कारण 2019 में वह चुनावी राजनीति से अलग हो गयीं। मानव संसाधन, संचार, पेट्रोलियम समेत कई महत्वपूर्ण मंत्रालय संभाल चुकी महाजन 2014 की लोकसभा की सबसे वरिष्ठ महिला सांसद थीं। मीरा कुमार के बाद वह लोकसभा की दूसरी अध्यक्ष हुई। उन्हें एक सक्षम लोकसभा अध्यक्ष माना जाता है। 1989 पहली बार लोकसभा सांसद बनने वाली सुमित्रा महाजन, 1991, 1996, 1998, 1999, 2004, 2009 और 2014 की 16वीं लोकसभा तक एक बार भी नहीं हारीं।
शरद पवार
1999 में कांग्रेस से अलग होने के बाद नेशनलिस्ट कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) की स्थापना करने वाले शरद पवार कई बार महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री रह चुके हैं। बीसीसीआई और आईसीसी के अध्यक्ष रह चुके शरद पवार ने 1984 में पहली बार महाराष्ट्र के पुणे की बारामती सीट से आठवें लोकसभा चुनाव में जीत हासिल की। इसके बाद 2009 तक लगातार सांसद बनते रहे और शिकस्त नहीं खाई। विरोधियांें को भी साध लेने की कला के कारण वे चुनावी राजनीति के अजेय योद्धा बने रहे।
के. एच. मुनियप्पा
कर्नाटक के कोलार लोकसभा क्षेत्र से आने वाले केएच मुनियप्पा कांग्रेस पार्टी के अजेय सांसद जाने जाते थे। वे 1991 में 10वें लोकसभा चुनाव के बाद 1996, 1998, 1999, 2004, 2009 और फिर 2014 के 16वें लोकसभा चुनाव तक लगातार सात बार जीते। भारत सरकार में माइक्रो, स्मॉल एंड मीडियम एंटरप्राइजेज के केंद्रीय राज्य मंत्री रह चुके मुनियप्पा डा. मनमोहन सिंह सरकार में भी मंत्री रहे। नरेंद्र मोदी के समय में इनका चुनावी केमिस्ट्री और ग्रामर दोनों गड़बड़ा गया और वे 2019 में चुनाव हार गए।
सुल्तान सलाहुद्दीन ओवैसी
तेलंगाना तत्कालीन आंध्र प्रदेश के कद्दावर मुसलिम नेता सुल्तान सलाहुद्दीन ओवैसी ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन पार्टी से जुड़े रहे हैं। इंदिरा लहर में वे पहली बार 1984 में आठवें लोकसभा चुनाव में जीत हासिल किए। इसके बाद 1999 में 13वें लोकसभा चुनाव तक विजयी होते रहे। वर्ष 2004 में संन्यास लेने तक लगातार छह बार लोकसभा चुनाव में जीत दर्ज की।
अनंत गीते
अनंत गंगाराम गीते महाराष्ट्र से शिवसेना के सदस्य थे। केंद्रीय मंत्री गीते छह बार लगातार सांसद रहे। 1996 में 11वें लोकसभा चुनाव में जीतने के बाद 2014 के 16वें लोकसभा चुनाव तक लगातार जीतते रहे हैं। चुनावी केमिस्ट्री बिगड़ने के कारण 2024 का चुनाव वे हार गए।

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