पटना : बिहार विधानसभा के बजट सत्र के दौरान सोमवार को उस समय एक बेहद दिलचस्प नजारा देखने को मिला, जब सदन में तीखी राजनीतिक नोक-झोंक की जगह बिहार की पारंपरिक मिठाइयों पर चर्चा होने लगी। मौका था तारांकित प्रश्नों का, लेकिन चर्चा का केंद्र बन गई बाढ़ की ‘खोभिया लाई’ और बड़हिया का ‘रसगुल्ला’। बहस की शुरुआत बाढ़ से भाजपा विधायक डॉ. सियाराम सिंह ने की।
उन्होंने अपने क्षेत्र की प्रसिद्ध “खोभिया लाई” की विशिष्टता का जिक्र करते हुए इसे अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाने और जीआई (Geographical Indication) टैग देने की मांग उठाई। उन्होंने तर्क दिया कि यह मिठाई न केवल स्वादिष्ट है, बल्कि इसकी अपनी एक ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पहचान है। विधायक की मांग पर चुटकी लेते हुए उपमुख्यमंत्री विजय कुमार सिन्हा भी चर्चा में कूद पड़े। उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा कि अगर बाढ़ की लाई को सम्मान मिल रहा है, तो बड़हिया के प्रसिद्ध रसगुल्ले को कैसे भुलाया जा सकता है?
उप मुख्यमंत्री विजय कुमार सिन्हा ने बड़हिया के रसगुल्ले के लिए भी जीआई टैग की वकालत की। इसके बाद तो मानो सदन में मिठाइयों की झड़ी लग गई; अलग-अलग क्षेत्रों के विधायकों ने अपने-अपने इलाके के लड्डू और स्थानीय पकवानों के नाम गिनाने शुरू कर दिए। माहौल को और हल्का-फुल्का बनाते हुए उपमुख्यमंत्री ने एक अनूठा सुझाव दिया।
उन्होंने कहा कि “क्यों न विधानसभा परिसर में एक दिन बिहार की सभी प्रसिद्ध मिठाइयों की प्रदर्शनी लगाई जाए? इससे सभी माननीय सदस्यों को राज्य की खाद्य विविधता का स्वाद चखने का मौका मिलेगा।” इस सुझाव पर पूरा सदन ठहाकों से गूंज उठा। उद्योग मंत्री दिलीप जायसवाल ने भी इस विषय पर जवाब देते हुए प्रक्रियात्मक पहलुओं पर जानकारी दी।
मालूम हो कि जीआई टैग किसी खास भौगोलिक क्षेत्र की विशिष्ट पहचान वाले उत्पाद को दिया जाता है। बिहार की शाही लीची, जर्दालू आम, कतरनी चावल और मगही पान को पहले ही यह दर्जा मिल चुका है। अब विधायकों की इस पहल से राज्य की मिठाइयों (जैसे मनेर का लड्डू, सिलाव का खाजा आदि के बाद अन्य स्थानीय व्यंजन) के लिए भी वैश्विक बाजार के रास्ते खुल सकते हैं।