प्रशांत रंजन
उत्तर बिहार के सबसे बड़े निजी अस्पताल प्रसाद हॉस्पिटल में गुरुवार तड़के सुबह शॉर्ट सर्किट होने से आग लगी और दम घुटने के कारण आईसीयू में इलाजरत कुछ मरीजों की मौत हुई। दुर्घटना के तुरंत बाद मौके पर पहुंचे मुजफ्फरपुर के जिलाधिकारी सुब्रत सेन ने अपने दिए बयान में कहा कि तीन रोगियों (अब 06) की दम घुटने से मरने की जानकारी है। 13 शैय्या वाले आईसीयू में दो अतिरिक्त बेड लगे हुए थे, जबकि मीडिया में खबर आई कि 13 बेड वाले आईसीयू में 28 रोगियों का उपचार चल रहा था। सच किसे माना जाए? जिलाधिकारी ने यह भी कहा कि दुर्घटना में घायल अधिकतर मरीजों को अगल-बगल के अस्पतालों में इलाज कराया जा रहा है। बचाव कार्य में अस्पताल के कर्मी भी घायल हुए हैं, उनका भी उपचार चल रहा है। डीएम ने यह भी कहा कि आईसीयू के प्रभारी भी गंभीर रूप से घायल हैं, जिनका शहर के अन्य अस्पताल में इलाज चल रहा है।
मीडिया ट्रायल या पैरेलल जस्टिस?
बीते चार दिनों में सरकार की जिम्मेदार एजेंसियां अपनी गति और अपने तरीके से जांच में जुटी हैं और उधर मीडिया और सोशल मीडिया इस दुर्घटना का अलग केस ट्रायल कर रहा है। यह ट्रायल कितना गंभीर है कि दुर्घटना के बाद सोशल मीडिया पर फर्जी मौत के आंकड़े और भ्रामक जानकारी फैलाने के मामले में प्रशासन को सख्ती दिखानी पड़ी है। प्रारंभिक जांच में कई यूट्यूबर, न्यूज चैनल संचालक और ब्लॉगरों की भूमिका संदिग्ध पाई गई है। इनके खिलाफ सनहा दर्ज किया गया है। साइबर पुलिस मामले की जांच कर रही है और सोशल मीडिया पर प्रसारित सामग्री की पड़ताल की जा रही है। अधिकारियों ने लोगों से अपील की है कि बिना पुष्टि की गई जानकारी साझा न करें। मीडिया ट्रायल की पराकाष्ठा है कि जिला प्रशासन या पुलिस के आधिकारिक बयान की प्रतीक्षा किए बिना अस्पताल संचालक को फरार बताया जा रहा।
निलंबन या रद्द?
घटना के बाद अग्निशमन विभाग, स्वास्थ्य विभाग और जिला प्रशासन अपना-अपना कोटा पूरा करने में लगे हुए हैं। जिले के सिविल सर्जन ने अस्पताल का लाइसेंस निलंबित कर दिया है और 7 दिन के अंदर जिला प्रशासन ने उक्त अस्पताल को स्पष्टीकरण देने को कहा है। सिविल सर्जन कार्यालय से जारी वह आदेश लाइसेंस के निलंबन और रद्द के बीच उलझा हुआ है, क्योंकि एक ही आदेश पत्र में दोनों शब्द लिखे हुए हैं। सिविल सर्जन कार्यालय को पता भी है या नहीं कि दोनों शब्दों में क्या अंतर है, इसलिए जब जो सुविधा आया सो लिख अथवा बोल दिया!
अस्पताल बंद करना सामाधान नहीं
उधर इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (आईएमए) की मुजफ्फरपुर जिला इकाई ने शनिवार को 150 डॉक्टरों की बैठक बुलाई और इस निलंबन का विरोध किया। आईएमए ने आईसीयू में ड्यूटी पर देना डॉ. पंकज कुमार की गिरफ्तारी का विरोध किया इसके अलावा जांच पूरी हुए बिना और अस्पताल की ओर से स्पष्टीकरण लिए बिना अस्पताल के लाइसेंस निलंबन को अवैधानिक बताया। साथ ही यह सुझाव भी दिया कि अस्पताल के क्षतिग्रस्त हिस्से को सील कर अन्य हिस्सों में रोगियों का उपचार फिर से शुरू कर दिया जाना चाहिए। आईएमए ने यह भी चेतावनी दी है कि अगर एक सप्ताह के अंदर उसकी मांगे नहीं मानी गईं, तो राज्यव्यापी आंदोलन करेगा। यह सच है कि आईएमए अपनी डॉक्टर बिरादरी का ही पक्ष लेगा। लेकिन यह भी सच है कि आगजनी के हादसे के कारण पूरे अस्पताल के लाइसेंस को रद्द कर देना समस्या का निवारण नहीं है। देश के अस्पतालों में आगजनी की कई घटनाएं हुईं हैं। लेकिन, किसी भी मामले में अस्पताल को बंद कर देने का कैंपेन सोशल मीडिया पर नहीं चला, जो कि इस मुजफ्फरपुर मामले में दिख रहा है। बाकायदा लंबे पोस्ट और वीडियो डाले जा रहे हैं कि अस्पताल पर बुलडोजर चला देना चाहिए, कि अस्पताल मालिक के घर को जमीनदोज कर देना चाहिए। इस तालि’बा’नी तरीके से हम कहां पहुंच जाएंगे? अस्पताल को बंद कर देना समाधान नहीं हो सकता।
अस्पताल और आग… सबसे बड़ी वजह शॉर्ट सर्किट
15 वर्ष पूर्व कोलकाता के निजी AMRI अस्पताल में भयंकर आग लगी थी, जिसमें 93 रोगियों की जलकर मौत हो गई थी। शीर्ष प्रबंधन पर केस हुआ, निदेशक जेल गए और फिर अंततः 2 साल बाद अस्पताल संचालन की अनुमति कलकत्ता उच्च न्यायालय के आदेश पर बहाल हुई। पिछले साल झांसी और जयपुर के सरकारी अस्पतालों में आग लगने से बच्चों की दर्दनाक मौत हुई। 2 साल पहले दिल्ली और गुजरात के अस्पताल में आग लगने से बच्चों की मौतें हुई। पिछले दो माह में विश्व के दूसरे सबसे बड़े अस्पताल पटना के पीएमसीएच के नए भवन में में चार बार आग लगने की घटना हो चुकी है। इसके अलावा भी अस्पतालों में आग लगे और वहां रोगियों के मरने की घटनाएं इस देश में हुई हैं जब फिलहाल यहां वर्णित नहीं है। अस्पतालों में आग लगने के अलावा निजी अस्पतालों द्वारा चिकित्सीय लापरवाही की घटनाएं भी हर दिन मीडिया में प्रकाशित होती हैं। पिछले वर्ष ही पटना के एक बड़े निजी अस्पताल में दिनदहाड़े गोली चलने की घटना हुई, इस अस्पताल में बिहार सरकार के पूर्व मंत्री के इलाज में चिकित्सीय लापरवाही हुई जिसका मंत्री ने कराहते हुए वीडियो जारी किया था। फिर भी वह अस्पताल बंद हो गया क्या? ऐसी भी खबरें प्रकाशित होती हैं कि निजी अस्पताल मरीज के शव को रखकर पैसे देने के लिए दबाव बना रहा है। ऐसे मामलों में प्रशासन हस्तक्षेप करता है और मामले को सुलझाता है। लेकिन, अस्पताल बंद नहीं कर दिया जाता। पिछली गर्मी में अहमदाबाद में एअर इंडिया का विमान हवा में ही जल उठा, तो क्या एअर इंडिया की सेवाएं बंद कर दी गईं?
निजी अस्पताल भारत की मजबूरी
दुर्घटना की त्वरित और निष्पक्ष जांच होनी चाहिए और इसके लिए नीचे से लेकर ऊपर तक जो भी जिम्मेदार व्यक्ति है, उस पर कार्रवाई होनी चाहिए और विधि सम्मत दंड मिलना चाहिए। असल बात तो यह है कि इस देश में किसी दुर्घटना अथवा चिकित्सीय लापरवाही के बाद हर निजी अस्पताल को बंद करना सरकार अफोर्ड नहीं कर सकती, क्योंकि सरकार की स्वास्थ्य व्यवस्था ऐसी नहीं है जो 150 करोड़ की जनसंख्या वाले इस भारी-भरकम देश के बीमारों का इलाज कर सके। संयुक्त राष्ट्र के आदर्श नियम के अनुसार प्रति 1000 की जनसंख्या पर एक चिकित्सक होना चाहिए जबकि बिहार में प्रति 30 हज़ार व्यक्ति पर एक सरकारी चिकित्सक है। ऐसे में जनता और सरकार को झक मारकर निजी अस्पताल और निजी चिकित्सकों की शरण में रहना ही है, अन्य कोई विकल्प नहीं है। आयुष्मान भारत योजना सबसे बड़ा साक्ष्य है कि सरकार भी चाहती है कि इस देश में निजी अस्पताल न केवल चलें बल्कि फले-फुलाएं। इस योजना के माध्यम से सरकार संकेत करती है कि सरकारी अस्पताल आपके इलाज के लिए पर्याप्त नहीं है, आप निजी अस्पताल में जाकर इलाज कराएं। हम आपका बीमा कर देते हैं और प्रीमियम आपके बदले में हम भरेंगे। भारत में निजी अस्पतालों को लेकर एक और विरोधाभासी बात है। एक आम और प्रचलित धारणा है कि निजी अस्पताल इलाज करने वाले लोगों को लूटते हैं। तब भी कुछ निजी अस्पतालों में न केवल मरीजों की भीड़ रहती है, बल्कि आयुष्मान योजना के तहत सरकार भी उन अस्पतालों को क्लीनचीट देती है।
12 साल से सरकार क्या कर रही थी?
अब फिर से मुजफ्फरपुर वाली घटना पर आते हैं। दुर्घटना के दो दिन बाद मुजफ्फरपुर नगर निगम के नगर आयुक्त, कार्यपालक अभियंता, अमीन जैसे लोग अस्पताल की नवी के लिए पहुंचे और अस्पताल से निर्माण के नक्शे की मांग की। अस्पताल प्रबंधन के पास नक्शा नहीं होने की खबर चली। 12 वर्ष पहले जब अस्पताल बन रहा था, तो इसके नक्शे की एक कॉपी नगर निगम के कार्यालय में होगी, कम से कम वह कॉपी तो मिलनी चाहिए। बड़ा प्रश्न आया है कि यह अस्पताल विगत 12 वर्षों से बिना किसी विवाद के संचालित है और अगर इस अस्पताल के निर्माण में बिल्डिंग बायलॉज का उल्लंघन हुआ है तो यह बात आगजनी के बाद सरकार को क्यों पता चल रही है? यहां यह उल्लेख करना आवश्यक है कि 2014 में इस अस्पताल का उद्घाटन बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री ने किया था। जिस अस्पताल का उद्घाटन मुख्यमंत्री करने जा रहे हैं, उसमें उसके नक्शे और सुरक्षा मानकों की जानकारी कम से कम जिला प्रशासन को होना चाहिए और अगर यह नहीं है तो यह प्रशासनिक विफलता है। निर्दोष लोगों के दर्दनाक मौत होने के बाद नगर निगम अस्पताल से नक्शा मांग रहा है। अगर हर साल जिम्मेदारी पूर्वक ऑडिट की प्रक्रिया होती तो नक्शा मांगने की नौबत ही नहीं आती। हर मामले की तरह इस बार भी सरकार लक्षणों का इलाज करना चाह रही है। उदाहरण के लिए कुछ साल पहले पटना के नेपाली नगर में सरकार बुलडोजर से लोगों के घर गिराने लगी, यह कहते हुए कि यह अवैध निर्माण है। तब भी सवाल यही था कि पिछले 40 वर्षों में जब नेपाली नगर, दीघा, आशियाना, राजीव नगर में एक के बाद एक मकान बन रहे थे, तो इन वर्षों में नगर विकास विभाग व नगर निगम के अधिकारी क्या कर रहे थे? और जब लाखों की आबादी कई दशक से वहां रहने लगी तब एक दिन सरकार की नींद खुलती है और सरकार बुलडोजर लेकर पहुंच जाती है। मुजफ्फरपुर में भी घटना के बाद अस्पताल का नक्शा खोजने का काम इसी लाक्षणिक उपचार के संकेत है।
रुटीन वर्क के लिए ट्रिगर प्वाइंट चाहिए?
प्रसाद हॉस्पिटल की घटना के बाद जिले के 13 निजी नर्सिंग होम को सील किया गया। पटना में भी पांच निजी नर्सिंग होम को फायर सेफ्टी के मानकों का पालन नहीं करने के कारण सील किया गया। फायर सेफ्टी की जांच के लिए क्या अग्निशमन विभाग और स्वास्थ्य विभाग अस्पताल में उन मरीजों के मरने का इंतजार कर रहा था? जो रुटीन वर्क है, उसके लिए भी सरकारी बाबू को कोई ट्रिगर प्वाइंट चाहिए? आज अग्निशमन विभाग और सिविल सर्जन कह रहे हैं कि अस्पताल में फायर सेफ्टी का ध्यान नहीं रखा गया था। वार्षिक फायर ऑडिट और अन्य सेफ्टी ऑडिट करने की जवाबदेही सिविल सर्जन, अग्निशमन विभाग और जिला प्रशासन को है, तो वे जिम्मेदार लोग हर साल अस्पतालों में जाकर ऑडिट के नाम पर क्या करते हैं? एक जांच इसकी भी होनी चाहिए। यह अब जगजाहिर सत्य है कि स्वास्थ्य विभाग सरकारी अस्पतालों के भरोसे राज्य के सभी रोगियों का उपचार नहीं कर सकता है, तो विभाग को निजी अस्पतालों के नियामक की भूमिका में ही कम से कम इमानदारी से काम करना चाहिए। राज्य में सिविल सर्जनों की क्या छवि है, यह किसी से छिपी नहीं है।
साख बनायी है, तो उसे बनाए रखे अस्पताल प्रबंधन
एक निजी अनुभव की बात। मेरे पैतृक गाँव से सबसे बड़ा निजी अस्पताल यही है, जहां एक घंटे में पहुंचा जा सकता है। स्वाभाविक है कि विगत 12 वर्षों में कई परिजनों व परिचितों का उपचार यहां होता रहा है। कुछेक मौकों पर मुझे भी जाना पड़ा है। कम से कम तीन बार जाने का ध्यान आता है। इस दौरान अभी तक एक बार भी इस अस्पताल की ओर से कुछ ऐसा नहीं किया गया जिससे परेशानी हुई हो। हां, निजी अस्पताल है इसलिए हरेक काम के लिए पैसा लगता ही लगता है। ऐसे वीडियो भी वायरल हैं, जिनमें स्थानीय लोग कह रहे हैं कि कोरोना काल में सबसे अधिक लोगों की जान बचाने वाला यही अस्पताल है। जिले के लोग इस अस्पताल को लाइफलाइन कहते हैं। फिर भी इस दुर्घटना में अस्पताल को क्लीनचीट नहीं दे रहा हूं। कोई क्लीनचीट दे भी नहीं सकता, क्योंकि तकनीकी चूक हो अथवा मानवीय भूल, किसी भी परिस्थिति में रोगियों की मौत को जस्टिफाई नहीं किया जा सकता। यह गारंटी भी नहीं दे सकता कि इस अस्पताल में जाने से आपकी शर्तिया इलाज हो जाएगी। हो सकता है अगली बार मेरे ही साथ अनहोनी हो जाए! लेकिन, विगत 12 वर्षों में प्रसाद हॉस्पिटल ने अपने परफॉर्मेंस से उत्तर बिहार में अपनी साख बनाई है। इसका सबसे बड़ा साक्ष्य है कि इससे पहले कभी यह अस्पताल विवादों में नहीं रहा। शहर के सबसे अधिक मरीजों की भीड़ वाला अस्पताल कोई ऐसे ही नहीं बन जाता। प्रसाद हो या कोई अन्य अस्पताल, वह कभी नहीं चाहेगा कि उसके यहां लापरवाही से किसी की जान चली जाए और उसका करोड़ों का इन्फ्रा बर्बाद हो जाए।
प्रतिष्ठा बनाने में वर्षों खप जाते हैं, लेकिन क्षण भर में वह लुंठित हो जाती है। अब यह अस्पताल प्रबंधन के ऊपर है कि भविष्य में भी इसकी वही साख बनी रहनी चाहिए। यह मुजफ्फपुर समेत पूरे उत्तर बिहार के हित में होगा।
(ओपिनियन पोस्ट: यह लेखक के निजी विचार हैं)