नवादा : 2020 के पटना स्नातक विधान पार्षद चुनाव में कई दमदार उम्मीदवार मैदान में थे। राजद के आज़ाद गांधी को 12,696 वोट मिले थे, जिन्हें अनंत सिंह का समर्थन मिला था। निर्दलीय रवि रंजन को 8,611 वोट मिले थे, जो अवधेश नारायण सिंह के दामाद थे और जिन्हें राजपूत समाज के एक बड़े हिस्से का समर्थन मिला था। कांग्रेस के दिलीप कुमार को 5,739 वोट मिले, जबकि पूर्व सांसद अरुण कुमार के बेटे और वर्तमान घोसी विधायक ऋतुराज कुमार को निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में 3,960 वोट मिले थे।
वहीं, भाजपा समर्थित निर्दलीय उम्मीदवार वेंकटेश शर्मा को 3,027 वोट मिले थे। उन्हें भाजपा के कई बड़े नेताओं का समर्थन प्राप्त था और उन्होंने भी मतदाता बनाने में मेहनत की थी। इन प्रमुख उम्मीदवारों के वोट जोड़ दें, तो लगभग 34,000 वोट नीरज कुमार के मुकाबले में थे। इसके बावजूद नीरज कुमार चुनाव जीत गए।
अब आज का गणित समझिए:—2020 में कुल मतदाता लगभग 1.12 लाख थे, जबकि आज यह संख्या करीब 90,000 है। अगर 50% मतदान हुआ, तो कुल वोट पड़ेंगे लगभग 45,000। अब सवाल यह है कि इस बार कौन-सा उम्मीदवार 20- 25000 वोट लाने की स्थिति में है?
दूसरी बात समझिए… रवि रंजन, ऋतुराज कुमार और वेंकटेश शर्मा को जो लगभग 15,600 वोट मिले थे, इस बार मोटे तौर पर उनमें से ज्यादातर वोट एनडीए की तरफ जाने की संभावना है। उसमें अगर नीरज कुमार के लगभग 21,000 वोट जोड़ दें, तो एनडीए का आंकड़ा करीब 36,000 तक पहुँचता दिखाई देता है। वहीं, राजद और कांग्रेस का कुल वोट लगभग 18,000 के आसपास माना जा सकता है। इसमें कुछ वोटों का फेरबदल जरूर हो सकता है, लेकिन मोटे तौर पर चुनावी तस्वीर इसी गणित के आसपास बनती दिखाई दे रही है।
फैक्टर नंबर 1:—अनंत सिंह का अनुज सिंह को समर्थन और नीरज कुमार का विरोध।
अनंत सिंह अनुज सिंह के समर्थन में हैं और नीरज कुमार का विरोध कर रहे हैं। लेकिन यह विरोध कोई पहली बार नहीं हो रहा है। पिछले दो चुनावों में भी नीरज कुमार का विरोध किया गया था, फिर भी उसका कोई खास असर नहीं पड़ा। आखिर यह स्नातक मतदाताओं का चुनाव है, जहाँ मतदाता की सोच और प्राथमिकताएँ अलग होती हैं। अनंत सिंह की लोकप्रियता अपनी जगह है, लेकिन सोशल मीडिया पर हल्ला मचाने वाले समर्थकों की संख्या को स्नातक मतदाताओं के वोटों का सीधा पैमाना नहीं माना जा सकता। सोशल मीडिया पर लोकप्रियता और चुनाव में वोट हासिल करना दो अलग-अलग बातें हैं। इसलिए केवल अनंत सिंह के समर्थन या विरोध के आधार पर चुनाव का पूरा गणित बदल जाने की उम्मीद करना सही नहीं होगा।
फैक्टर नंबर 2:—राजद से दिलीप कुमार को टिकट और लव-कुश वोटों का समीकरण -राजद ने दिलीप कुमार को टिकट देकर लव-कुश समाज के वोटों को अपने पक्ष में करने की कोशिश की है। लेकिन सवाल यह है कि क्या केवल एक विधान पार्षद सीट के लिए पूरा लव-कुश समाज अपना राजनीतिक रुख बदल देगा?
लव-कुश समाज का एक बड़ा हिस्सा नीतीश कुमार को अपना नेता मानता रहा है। अब निशांत कुमार को भविष्य के नेतृत्व के रूप में देखने वाले लोगों और एनडीए के राजनीतिक समीकरण को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। एक विधान पार्षद सीट के लिए पूरा लव-कुश समाज अपने भविष्य के मुख्यमंत्री निशांत कुमार और वर्तमान मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी का राजनीतिक करियर दाँव पर क्यों लगाएगा? क्या समाज के लोग केवल एक विधान परिषद सीट के लिए अपने बड़े राजनीतिक भविष्य और नेतृत्व की संभावनाओं को नुकसान पहुँचाना चाहेंगे? ऐसा होना आसान नहीं दिखता। हाँ, कुछ लोग इधर-उधर जा सकते हैं, कुछ वोटों का फेरबदल भी हो सकता है, लेकिन कुछ अपवादों को छोड़कर पूरे समाज के वोट एकमुश्त ट्रांसफर हो जाएंगे, यह मान लेना भी सही नहीं है।
फैक्टर नंबर 3:—अनुज सिंह और जनसुराज की भूमिका
अनुज सिंह खुद चुनाव लड़ने के इच्छुक नहीं थे, लेकिन उन्हें झाँसा देकर चुनाव लड़वाया गया। आखिर उन्हें चुनाव लड़वाने वालों का असली मकसद क्या है? राजनीतिक समीकरण को देखें, तो ऐसा लगता है कि उन्हें चुनावी मैदान में उतारने वालों की नजर नवादा लोकसभा सीट पर है। इस विधान परिषद चुनाव के बहाने नवादा लोकसभा क्षेत्र में अपनी राजनीतिक जमीन तैयार करने और भविष्य के चुनाव की तैयारी शुरू करने का मौका मिल सकता है। ऐसे में अनुज सिंह को चुनाव लड़वाना एक बड़ी रणनीति का हिस्सा हो सकता है। अनुज सिंह को आगे करके नवादा लोकसभा सीट की तैयारी हो रही है और इस पूरे खेल में अनुज सिंह महज़ एक मोहरा बनकर रह गए हैं। अब सबसे महत्वपूर्ण बात समझिए।
इस चुनाव में केवल लोकप्रियता, पैसा या बड़े नेताओं का समर्थन ही काम नहीं आता। मजबूत संगठन, जमीनी नेटवर्क, पुराने कार्यकर्ताओं की मेहनत और मतदाताओं को मतदान केंद्र तक लाने की क्षमता भी उतनी ही जरूरी है। यही वजह है कि एनडीए और राजद जैसे स्थापित दलों के उम्मीदवारों को संगठनात्मक बढ़त मिल सकती है। केवल फेसबुक और सोशल मीडिया पर समर्थकों का शोर देखकर किसी उम्मीदवार की वास्तविक चुनावी ताकत का अंदाजा लगाना बड़ी भूल हो सकती है।
सोशल मीडिया पर हजारों लोग किसी के समर्थन में पोस्ट कर सकते हैं, लेकिन उनमें से कितने लोग वास्तव में स्नातक मतदाता हैं और कितने मतदान करने पहुँचेंगे, यह सबसे बड़ा सवाल है? चुनावी मैदान में नारे लगाने और वास्तव में वोट दिलाने के बीच बहुत बड़ा अंतर होता है। इसलिए भावनाओं में बहकर, किसी की लोकप्रियता देखकर या किसी के बड़े-बड़े दावों पर भरोसा करके फैसला मत कीजिए। पहले चुनाव का गणित समझिए, पुराने नतीजों को देखिए, उम्मीदवारों की जमीनी ताकत और संगठन को समझिए, फिर अपनी राय बनाइए। क्योंकि चुनाव फेसबुक की पोस्ट, कमेंट और लाइक से नहीं, मतदान केंद्र पर पड़े वोटों से जीता जाता है।
भईया जी की रिपोर्ट
