बिहार में पंचायत चुनाव परिसीमन कार्य पूरा होने के बाद ही कराया जाएगा। यह जानकारी मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने एक ग्राम संवाद कार्यक्रम के दौरान खुद दी। उन्होंने कहा कि राज्य में परिसीमन का काम निर्वाचन आयोग की ओर से कराया जा रहा है। इसलिए पंचायतों के नये परिसीमन के बाद ही अब बिहार में पंचायत चुनाव कराए जायेंगे। इसके साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि अब जन प्रतिनिधियों से उनके निर्वाचन कार्यकाल के दौरान 5 वर्षों के GDP का हिसाब लिया जाएगा। मुख्यमंत्री ने कहा कि अब जिला परिषद, प्रखंड प्रमुख और मुखिया से जिला, प्रखंड और ग्राम पंचायत के जीडीपी के बारे में पूछा जाएगा। उन्हें अपने कार्यकाल के पांच सालों में जीडीपी में हुई बढ़ोतरी के बारे में बताना होगा।
सीएम ने कहा कि जनप्रतिनिधियों से सरकार अब यह सवाल करेगी कि आखिर 5 सालों में कितना जीडीपी बढ़ा। उन्होंने बताया कि पंचायतों के परिसीमन के लिए 7500 की आबादी का मानक तय किया गया है। मतलब आबादी के आधार पर पंचायतों की सीमाओं को नए सिरे से व्यवस्थित किया जाएगा। अभी बिहार में कई पंचायतें भौगोलिक और आबादी के लिहाज से काफी बड़ी हैं, इसलिए परिसीमन बहुत जरूरी है। इस दौरान मुख्यमंत्री ने अपने गांव का उदाहरण देते हुए कहा कि जिस गांव से वह आते हैं, उसकी आबादी करीब 20 हजार है। इसके बावजूद उसके साथ तीन अन्य गांव भी जुड़े हुए हैं और सभी मिलकर एक ही पंचायत का हिस्सा हैं।
मुख्यमंत्री ने कहा कि परिसीमन के बाद पंचायतों के आकार और प्रशासनिक व्यवस्था को आसानी से समझा जा सकता है और इससे सरकारी योजनाओं को लागू करने में काफी सहूलियत होगी। अभी बिहार में पंचायतों की सीमाएं काफी बड़ी हैं। सरकार ने इसको लेकर निर्वाचन आयोग से भी जिक्र किया है। इसके बाद सीएम ने पंचायत प्रतिनिधियों की भूमिका को लेकर भी अपनी बात रखी और कहा कि आमतौर पर लोग मानते हैं कि देश में सबसे बड़ी ताकत प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री और जिलाधिकारी के पास होती है। लेकिन जमीनी स्तर पर सबसे महत्वपूर्ण भूमिका मुखिया की होती है। मुखिया के पास सबसे अधिक काम होता है और मुखिया का चुनाव लड़ना भी आसान नहीं होता। वार्ड और मुखिया के चुनाव में स्थानीय स्तर पर रिश्ते और सामाजिक समीकरण भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।