अरवल – बिहार की बदहाल शिक्षा व्यवस्था, बढ़ती बेरोजगारी, प्रतियोगी परीक्षाओं में धांधली, फीस वृद्धि, विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता पर हमले और छात्र-युवाओं के लोकतांत्रिक अधिकारों पर बढ़ते दमन के खिलाफ Gen Z Rising–बिहार चैप्टर के तहत आज अरवल में शिक्षा सुधारो कन्वेंशन का आयोजन किया गया। कन्वेंशन की अध्यक्षता इन्कलाबी नौजवान सभा के जिलाध्यक्ष-सह-जिला पार्षद शाह शाद ने की। कन्वेंशन में बड़ी संख्या में स्कूली छात्र और नौजवान शामिल हुए।
कन्वेंशन को माले के पूर्व विधायक महानंद सिंह, माले के प्रभारी कुमार परवेज़, जिला सचिव जितेंद्र यादव, RYA के शाह शाद, रमाकांत टुन्ना, नीतीश कुमार, अमन, इरफान, रुस्तम, मनीष, कादिर और अरबाज सहित अन्य वक्ताओं ने संबोधित किया। इस दौरान शिक्षा और रोजगार के सवालों पर आगे के आंदोलन की रणनीति पर चर्चा की गई। कन्वेंशन में आइसा की संयोजन समिति का गठन किया गया तथा नीतीश कुमार को सर्वसम्मति से संयोजक चुना गया।
माले के पूर्व विधायक महानंद सिंह ने कहा कि बिहार के हर विश्वविद्यालय और शिक्षण संस्थान से सवाल उठ रहे हैं, लेकिन सरकार शिक्षा और युवाओं के भविष्य को पूरी तरह नजरअंदाज कर रही है। सरकारी स्कूलों की जर्जर स्थिति का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि कई स्कूलों में पर्याप्त कक्षाएं, कंप्यूटर और प्रयोगशालाएं तक उपलब्ध नहीं हैं। उन्होंने कहा कि मिड-डे मील में गड़बड़ी, स्कूलों के बंद होने और शिक्षकों की कमी से लेकर बुनियादी सुविधाओं के अभाव तक, बिहार की शिक्षा व्यवस्था गहरे संकट में है।
कुमार परवेज़ ने कहा कि पिछले कई महीनों से देशभर में शिक्षा और रोजगार के सवालों पर व्यापक आंदोलन चल रहा है। जंतर-मंतर के आंदोलन से लेकर बिहार के गांवों और जिलों तक छात्रों और युवाओं की आवाज पहुंच रही है। उन्होंने कहा कि केवल केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे से शिक्षा व्यवस्था नहीं सुधरेगी, बल्कि पूरे शिक्षा तंत्र की जवाबदेही तय करनी होगी। उन्होंने कहा कि सेशन में देरी, समय पर डिग्री नहीं मिलना, फीस वृद्धि, परीक्षाओं में गड़बड़ी और घूसखोरी जैसे सवालों के साथ-साथ सरकारी स्कूलों की बदहाली भी गंभीर मुद्दा है। उन्होंने बताया कि दरभंगा में एक ऐसा स्कूल भी सामने आया है, जहां पहली से बारहवीं तक की पढ़ाई के लिए महज चार कमरे हैं।
अन्य वक्ताओं ने कहा कि स्कूली शिक्षा से लेकर उच्च शिक्षा तक बिहार की पूरी व्यवस्था को सरकार ने बदहाल कर दिया है। परीक्षाएं समय पर नहीं हो रही हैं और रोजगार के सवाल को लगातार निजी कंपनियों के हवाले किया जा रहा है। सरकार स्कूल और कॉलेज खोलने के नाम पर केवल इमारतों को भगवा रंग में रंगने में लगी है, जबकि लाइब्रेरी, प्रयोगशालाएं और अन्य बुनियादी सुविधाएं नदारद हैं। वक्ताओं ने कहा कि रोजगार की स्थिति इतनी खराब है कि बिहार के युवा बड़े पैमाने पर पलायन करने को मजबूर हैं। कई जगह नौकरी दिलाने के नाम पर युवाओं से पैसे की वसूली की शिकायतें सामने आ रही हैं। चार कमरों में डिग्री कॉलेज चलाना बिहार के युवाओं के भविष्य के साथ मजाक है।
देवेंद्र कुमार की रिपोर्ट