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मनोरंजन

ये निर्माण नहीं आसान… पर्दे के पीछे पसीना, तब जमाना होता दिवाना

अगर हर निर्माता प्रोडक्शन के कार्य को थैंकलेस कहकर फिल्म निर्माण छोड़ दे, तो फिर किसी फिल्म अभिनेता का अस्तित्व भी नहीं रहेगा। प्रोडक्शन ही वह मंच सजाता है, जिस पर अभिनेता अपना जलवा दिखाते हैं। वे प्रोडक्शन विधा को साध नहीं सके, केवल इसलिए उसे थैंकलेस कहना कहीं से भी न्यायोचित नहीं जान पड़ता. . . .

Prashant Ranjan
Last updated: June 30, 2026 6:28 pm
By Prashant Ranjan 643 Views
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8 Min Read
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प्रशांत रंजन

पिछले महीने में भारतीय फिल्म उद्योग में दो घटनाएं घटीं। एक पूर्णकालिक अभिनेता रीतेश देशमुख ने अपने निर्माण और निर्देशन में ‘राजा शिवाजी’ फिल्म रिलीज की और दूसरे पूर्णकालिक अभिनेता सैफ अली खान ने अपनी निर्माण कंपनी इलुमनाती फिल्म्स को 17 साल तक चलाने के बाद अंतत: बंद कर दी।

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प्राय: देखा गया है कि पूर्णकालिक अभिनेता जब निर्माण और निर्देशन का काम संभालते हैं तो विरले ही सफल हो पाते हैं। इस कड़ी में राज कपूर, गुरु दत्त व मनोज कुमार आदर्श उदाहरण रहे हैं। बाद के दिनों में कमल हासन व ऋषभ शेट्टी श्रेष्ठ उदाहरण है जिन्होंने सफल अभिनय करियर के अलावा बतौर निर्माता निर्देशक भी कई सफल फिल्में दी हैं। सतीश कौशिक भी ऐसे फिल्मकार रहे हैं जिन्होंने बतौर अभिनेता भी लोकप्रियता प्राप्त की। वहीं एक दूसरा वर्ग है जो पूर्णकालिक अभिनेता है लेकिन यदा-कदा फिल्म निर्माण और निर्देशन की कमान संभाली। सुनील दत्त इस श्रेणी में अग्रणी हैं। बाद में सनी देओल, अजय देवगन, नाना पाटेकर, अनुपम खेर, नसीरुद्दीन शाह ऐसे नाम हैं जिनकी प्रसिद्धि समाज में केवल अभिनेता के रूप में है, क्योंकि बतौर फिल्मकार इन्होंने कोई विशेष छाप नहीं छोड़ी है। हालांकि, रीतेश देशमुख ने बतौर निर्माता-निर्देशक अपनी हालिया फिल्म राजा शिवाजी से मराठी सिनेमा में सौ करोड़ी फिल्म देने का कीर्तिमान अवश्य स्थापित किया है, तथापि एक स्थापित फिल्मकार के रूप में उनकी पहचान ठोस होनी बाकी है।

प्राय: होता है कि स्थापित, पूर्णकालिक व लोकप्रिय अभिनेता जब पार्टटाइम के लिए निर्देशक की कुर्सी पर बैठते हैं, तो उनके ऊपर उनकी ही अभिनेता वाला सम्मोहन हावी रहता है। परिणाम होता है कि उस फिल्म में जिस पात्र को व​ह निर्देशक-सह-अभिनेता निभा रहा होता है, उसे वह सर्वाधिक फोकस में रखना चाहता है। कथा से अधिक स्वयं की हीरो वाली छवि चमकाने में फंस जाता है।

असल में सिनेमा का शिल्प इतना बृहद है कि इसमें एक साथ दो भिन्न विधाओं को साध पाना टेढ़ी खीर है और इसीलिए अपवादों को छोड़ दें तो कैमरे के सामने रहकर अभिनय का जलवा बिखेरने वाले लोग जब कैमरे के पीछे निर्देशक की कुर्सी पर बैठते हैं तो सफलता की संभावना अल्प हो जाती है। तिस पर भी यदि निर्देशन के साथ-साथ निर्माण का भी बोझ कंधे पर हो, तब तो यह और भी कठिन हो जाता है। अभिनेता सैफ अली खान ने इसी इंटरफेस पर आकर हाथ खड़े कर दिए।

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वे अभिनय करते हुए इतने वर्षों में नहीं समझ पाए कि अभिनेता के मुकाबले निर्माता-निर्देशक कई गुना अधिक परिश्रम करते हैं। विशेषकर हिंदी सिने उद्योग में जहां, कुछ फिल्म सितारों के नखरों के आगे निर्माता-निर्देशक गिड़गिड़ाते रहे हैं। ऐसी घटनाएं खबरों के रूप में फिल्म पत्रकारिता का मजबूत कंटेंट रहा है। लेट-लतीफी के लिए हिंदी फिल्मी सितारे कुख्यात रहे हैं। समय सारिणी की ऐसी-तैसी करना वे गर्व समझते रहे। सेट तैयार कर कैमरा, लाइट, प्रॉप्स, जूनियर कलाकार आदि से ओके करने के बाद पलक-पांवड़े बिछाकर वैनिटी वैन से फिल्म स्टार के निकलने का इंतजार किया जाता है। सितारे अल्ट्रा लग्ज्यूरी वैनिटी वैन में नायिका के साथ अथवा अकेले आराम फरमाते हैं। बीच में थोड़ी देर के लिए निकलकर डायलॉग बोल देना और फिर वापस वैनिटी वैन में चले जाना। बाकी, सेट पर आग लगे या कोई घायल हो जाए, वे अपने कंफर्ट जोन में रहना पसंद करते हैं। हालांकि, सारे सितारे ऐसे नहीं होते। लेकिन, अधिकतर होते हैं, वरना खबरें अनायास नहीं बनतीं।

कंपनी बंद करते हुए सैफ ने कहा कि फिल्म प्रोडक्शन का काम काफी थकाऊ और थैंकलेस है। फिल्म प्रोडक्शन का काम थकाने वाला है, यह तो सही है। लेकिन इस कार्य को ‘थैंकलेस’ कहना सैफ का सिनेमा शिल्प के प्रति समर्पण के अभाव का संकेत है, क्योंकि अगर हर निर्माता प्रोडक्शन के कार्य को थैंकलेस कहकर फिल्म निर्माण छोड़ दे, तो फिर किसी फिल्म अभिनेता का अस्तित्व भी नहीं रहेगा। प्रोडक्शन ही वह मंच सजाता है, जिस पर अभिनेता अपना जलवा दिखाते हैं। वे प्रोडक्शन विधा को साध नहीं सके, केवल इसलिए उसे थैंकलेस कहना कहीं से भी न्यायोचित नहीं जान पड़ता।

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सन् 2009 में जब सैफ ने दिनेश विजन के साथ मिलकर इल्यूमिनती फिल्म की शुरुआत की, तो अपने बैनर के तले बनने वाली सारी फिल्मों में उनका फोकस अभिनय पर अधिक रहता था और फिल्म प्रोडक्शन का अधिकतर बहार दिनेश विजन उठाते थे। यही कारण है कि 2014 तक जब तक दिनेश विजन सैफ के साथ रहे, तब तक इल्यूमिनती फिल्म ने लव आजकल, कॉकटेल और गो गोवा गॉन जैसी हिट फिल्में दीं। दोनों में अनबन होने के बाद दिनेश इल्यूमिनती फिल्म से अलग होकर मैडॉक फिल्म नाम की स्वतंत्रत फिल्म कंपनी खोली और फिर ‘स्त्री’ जैसी फिल्मों के माध्यम से कॉमेडी—हॉरर का ऐसा ब्रह्मांड रचा कि एक के बाद एक कई सुपरहिट फिल्में देने लगी। मिमि व छावा जैसी हिट फिल्में भी मैडॉक वालों के खाते में है। वहीं दूसरी ओर दिनेश के अलग होते ही इल्यूमिनती फिल्म का प्रोडक्शन कमजोर पड़ गया और उसके बाद एक दो फ्लॉप फिल्में देने के बाद कंपनी स्टैंडबाई मोड में चली गई। दिनेश के अलग होते ही इल्यूमिनती की चमक खत्म सी हो गई। इन घटनाओं से स्पष्ट होता है की फिल्म निर्माण कंपनी का मालिक होते हुए भी सैफ का ध्यान केवल अभिनय पर होता था और उनकी कंपनी ने जितनी हिट फिल्में दीं, उसके पीछे दिनेश का विजन और परिश्रम था।

जहां तक अभिनेताओं द्वारा प्रोडक्शन कंपनी के संचालन करने का प्रश्न है तो करीब-करीब हर बड़ा अभिनेता एक प्रोडक्शन कंपनी को प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से संपोषित करता है। इस कड़ी में शाहरुख खान की रेड चिलीज, आमिर खान की आमिर खान प्रोडक्शंस, सलमान खान की सलमान खान फिल्म्स, अक्षय कुमार की केप ऑफ गुड फिल्म्स, जॉन अब्राहम की जेए एंटरटेनमेंट, अजय देवगन की अजय देवगन फिल्म्स इत्यादि हैं। यह सारे अभिनेता प्रोडक्शन कंपनी के संचालन के लिए प्रबंधन और विपणन के कुशल विशेषज्ञों को फुल टाइम नौकरी पर रख लेते हैं अथवा किसी पारिवारिक सदस्य को यह जिम्मेदारी देते हैं और स्वयं अपने बैनर में भी अथवा दूसरे के बैनर में भी अपने मूल काम यानी अभिनय पर ध्यान देते हैं और इस प्रकार संतुलन बनाकर उनका अभिनय करियर और प्रोडक्शन कंपनी दोनों चलते रहता है। सैफ यही संतुलन बनाने में चूक गए। रीतेश प्रयासरत हैं, उन्हें ऑल दि बेस्ट।

TAGGED: film production, ritesh deshmukh, Saif Ali Khan
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