-जापानी मेहमान इस मिट्टी की सोंधी खुशबू और ग्रामीण जीवन की आत्मीयता को दुनिया तक पहुंचाएंगे
नवादा : फाल्गुन की मदमस्त बयार इस बार केवल खेतों और खलिहानों को ही नहीं महका रही बल्कि उसने दूर देश से आए मेहमानों को भी नवादा की धरती तक खींच लाया है।होली के रंग और ढोलक की थाप के बीच जब जापानी पर्यटक जिले के अकबरपुर प्रखंड अंतर्गत पिरौंटा गांव पहुँचे तो गांव के लोग अपने बीच विदेशी मेहमानों को पाकर मानो खुशी से फूले नहीं समा रहे हैं।
इस बार की होली में जापानी टीवी स्टार कायो वाकाटाबे,गायक ताकेरू और मशहूर शेफ आसामी पिरौंटा गांव के विशेष अतिथि बने हुए हैं। इन विदेशी मेहमानों की मेज़बानी का दायित्व गांव के ही निवासी और दिल्ली उच्च न्यायालय के अधिवक्ता श्री रंजन कुमार निभा रहे हैं।रंजन कुमार ने ग्रामीण पर्यटन का एक ऐसा मॉडल विकसित किया है जिसका उद्देश्य गांव के जीवन को एक गहन और जीवंत सांस्कृतिक अनुभव के रूप में प्रस्तुत करना है। ग्रामीण पर्यटन की इस अवधारणा में आगंतुकों की गतिविधियाँ गैर-शहरी क्षेत्रों में आयोजित होती हैं,जहाँ प्रकृति के निकट वास्तविक अनुभव, कृषि-आधारित जीवन शैली और स्थानीय संस्कृति को केंद्र में रखा जाता है।इसका उद्देश्य केवल पर्यटन को बढ़ावा देना ही नहीं बल्कि ग्रामीण समुदायों के लिए सतत आय के अवसर उत्पन्न करना है।
चूँकि ग्रामीण पर्यटन अपेक्षाकृत कम खर्चीला होता है,इसलिए यह पर्यटकों को किसी स्थान पर अधिक समय तक ठहरने के लिए भी प्रेरित करता है। आज के समय में पर्यटन का विविधीकरण समय की आवश्यकता बन गया है।अंतरराष्ट्रीय पर्यटक प्रकृति के साथ सार्थक जुड़ाव और बिना किसी बनावट के पारंपरिक जीवन का अनुभव करना चाहते हैं। बिहार में अत्यंत समृद्ध सांस्कृतिक विरासत है,किंतु दुर्भाग्यवश हम उसके प्रचार-प्रसार में अक्सर संकोच करते हैं जबकि आज की दुनिया में लोग अलग और पारंपरिक अनुभवों को अधिक पसंद करते हैं। संगीत को अक्सर दुनिया की एकमात्र सार्वभौमिक भाषा कहा जाता है और नवादा के इस छोटे से गांव में यह भावना सचमुच जीवंत हो उठी।
खेतों के बीच जब ढोल की थाप गूँज रही थी और होली के रंग हवा में घुलकर वातावरण को रंगीन बना रहे थे, तभी जापान से आए कलाकारों का यह समूह गांव की सादगी भरी शैली में इस पर्व को मनाने के लिए यहाँ पहुँचा।उन्होंने शहरी सुविधाओं और आराम को पीछे छोड़कर ग्रामीण जीवन की सहजता और उत्सव की वास्तविक भावना को अपनाया। यह तिकड़ी—अभिनेता कयो वाकाटाबे, गायक ताकेरू और शेफ आसामी—अभिनय,संगीत और पाक-कला के अनोखे संगम का प्रतिनिधित्व करती है लेकिन पिरौंटा गांव की मिट्टी में कदम रखते ही उनके सारे औपचारिक परिचय जैसे मिट गए और केवल उत्सव का रंग और लय शेष रह गई। ढोलक की थाप इतनी मोहक थी कि मेहमान स्वतः ही उत्सव के रंग में बह गए।
धोती और पारंपरिक परिधान पहने हुए सुदूर पूर्व से आए ये मेहमान स्थानीय लोकधुनों पर पूरे उत्साह के साथ झूमकर नाचे और गांव के लोगों के साथ कदम से कदम मिलाकर आनंद और उल्लास का एक सहज और आत्मीय आदान-प्रदान किया। यह आयोजन किसी मंचित प्रदर्शन की तरह नहीं था बल्कि एक स्वाभाविक और जीवंत उत्सव के रूप में आकार लेता गया। जापानी मेहमान ढोलक की गूँजती थापों पर हँसते, तालियाँ बजाते और झूमते रहे। इस अवसर पर मशहूर शेफ आसामी ने भी अपने पाक-कला के औज़ारों को एक ओर रख दिया।इस बार उन्होंने ग्रामीण व्यंजन बनाने के बजाय उनका आनंद लिया। लकड़ी से जलने वाले मिट्टी के चूल्हों पर धीमी आँच में पकाया गया भोजन मिट्टी और धुएँ की सुगंध से भरपूर था।
खाने की मेज़ों को छोड़कर मेहमान आराम से मिट्टी के फर्श पर बैठ गए और गुड़, रेशेदार कच्चे आटे तथा सरसों के तेल से बने पारंपरिक व्यंजनों का स्वाद लेते हुए ग्रामीण जीवन की सादगी का आनंद उठाने लगे। पत्तों की दोना-पत्तल और मिट्टी के बर्तनों में परोसे गए इस देहाती भोजन ने मेहमानों पर गहरी छाप छोड़ी। दरअसल यह पूरा आयोजन केवल एक सांस्कृतिक उत्सव भर नहीं बल्कि ग्रामीण पर्यटन को बढ़ावा देने की एक महत्वपूर्ण पहल है।इस पहल के माध्यम से नवादा की मिट्टी, यहां की संस्कृति, लोकगीत, भोजन और जीवन शैली को दुनिया के सामने प्रस्तुत करने की कोशिश की जा रही है।
होली के रंगों से सजी इस अनूठी मुलाकात ने यह संदेश दिया है कि जब दुनिया तेज़ी से आधुनिकता की ओर बढ़ रही है तब भी गांव की मिट्टी,लोक संस्कृति और सरल जीवन शैली में ऐसी आत्मीयता छिपी है जो दूर-दराज़ देशों के लोगों को भी अपनी ओर आकर्षित कर सकती है। फाल्गुन की यह मदमस्त बयार शायद इसी लिए दूर देश से आए मेहमानों को नवादा तक ले आई,ताकि वे इस मिट्टी की सोंधी खुशबू और भारतीय ग्रामीण जीवन की आत्मीयता को अपने साथ दुनिया तक पहुँचा सकें।
भईया जी की रिपोर्ट