– भारत की अवधारणा पर 22वीं विजयश्री स्मृति व्याख्यानमाला आयोजि
Patna : कुछ लोग भारत को कमजोर या विखंडित करने के उद्देश्य से वैचारिक सभाओं का आयोजन करते हैं, किंतु भारत की मूल आत्मा समावेशी और उदार रही है। भारत ने कभी किसी धर्म या उसके अनुयायियों का विरोध नहीं किया, बल्कि सदैव सभी आस्थाओं और परंपराओं को सम्मान दिया है। भारत वह देश है जहाँ पुरुष और नारी को समान दृष्टि से देखा जाता है। यहाँ ईश्वर को भी नर और नारी—दोनों रूपों में स्वीकार किया जाता है, जो भारतीय संस्कृति की व्यापकता और आध्यात्मिक उदारता का प्रतीक है।
उक्त बातें बी.डी. कॉलेज, मीठापुर में आयोजित 22 वीं विजयश्री स्मृति व्याख्यानमाला में “भारत की अवधारणा” विषय पर मुख्य वक्ता के रूप में प्रसिद्ध विचारक एवं चिंतक रामाशीष सिंह (वाराणसी) ने सभा को संबोधित करते हुए कहा। उन्होंने कहा कि भारतीय परंपरा में विभिन्न धर्मों, संप्रदायों और समुदायों के बीच आपसी सम्मान और सह-अस्तित्व की भावना रही है। देश ने सदैव सभी संप्रदायों के आचार्यों और उत्तराधिकारियों को सम्मान दिया है और सामाजिक समरसता को प्राथमिकता दी है। उन्होंने उपस्थित जनसमूह से आह्वान किया कि भारत की सांस्कृतिक एकता, आध्यात्मिक विरासत और सामाजिक सद्भाव को बनाए रखने के लिए सभी को सकारात्मक भूमिका निभानी चाहिए। कार्यक्रम में देश के विभिन्न शिक्षाविदों, चिंतकों एवं गणमान्य अतिथियों ने भाग लिया।
मुख्य अतिथि के रूप में भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान की चेयरपर्सन प्रो॰ (डाॅ॰) शशि प्रभा कुमार ने अपने संबोधन में कहा कि भारत कोई जमीन का टुकड़ा नहीं, बल्कि हमारी माता है और हम उसके पुत्र हैं। यह देवभूमि है, जहाँ मानवता ही सबसे बड़ा धर्म है। व्याख्यानमाला का उद्घाटन पाटलीपुत्र विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो॰ उपेन्द्र प्रसाद सिंह ने किया। उन्होंने कहा कि भारत अपनी विशेषताओं के कारण पुनः विश्वगुरु बनने की दिशा में अग्रसर है। विशिष्ट अतिथि के रूप में मगध विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो॰ एस.पी. शाही ने भारत की गौरवशाली परंपरा का उल्लेख करते हुए कहा कि यह धरती त्याग और भोग, दोनों की भूमि है। आशीर्वचन देते हुए रामकृष्ण मिशन आश्रम, मुजफ्फरपुर के सचिव स्वामी भावात्मानंद जी ने कहा कि भारत आत्मबल से नहीं, बल्कि आत्मज्ञान से विश्व विजयी बनेगा।
वहीं, विषय प्रवेश करते हुए भारत विकास विकलांग न्यास के संस्थापक महासचिव पद्मश्री (डाॅ॰) बिमल कुमार जैन ने उपस्थित जनों से ‘इंडिया’ के स्थान पर ‘भारत’ कहने का संकल्प लेने का आह्वान किया। उन्होंने वर्ष 2047 तक विकसित भारत के निर्माण में योगदान देने की अपील की। कार्यक्रम में सभी अतिथियों का स्वागत कॉलेज की प्राचार्या प्रो॰ रत्ना अमृत ने पुष्पगुच्छ एवं अंगवस्त्र भेंटकर किया। स्मृतिशेष विजयश्री का जीवन परिचय प्रो॰ वीणा अमृत ने प्रस्तुत किया। विवेक माथुर ने प्रो॰ शशि प्रभा कुमार का जीवन परिचय दिया तथा भारत विकास एवं संजय आनंद विकलांग अस्पताल की सेवाओं की जानकारी दी।
इस अवसर पर पूर्व केंद्रीय मंत्री डाॅ॰ संजय पासवान, पूर्व कुलपति के.सी. सिन्हा, अरुण कुमार सिन्हा, प्रो॰ रत्ना चौधरी, डाॅ॰ नंदिनी मेहता, डाॅ॰ वीणा अमृत, डाॅ॰ पूनम सिंह, डाॅ॰ राजेश कुमार सिन्हा एवं प्रो॰ श्यामल किशोर सहित कई विद्वानों को अंगवस्त्र भेंटकर सम्मानित किया गया। सभा के अंत में पूर्व चेयरमैन, भारतीय दार्शनिक अनुसंधान परिषद, भारत सरकार प्रो॰ (डाॅ॰) रमेशचन्द्र सिन्हा ने धन्यवाद ज्ञापन करते हुए सभी अतिथियों के प्रति आभार व्यक्त किया। कार्यक्रम का संयोजन प्रो॰ (डाॅ॰) दिवाकर कुमार पाण्डेय ने किया तथा कॉलेज की ओर से धन्यवाद ज्ञापन डाॅ॰ सिकंदर जमील ने किया। कार्यक्रम की शुरुआत वंदे मातरम् तथा समापन राष्ट्रगान के साथ हुआ।