यूनेस्को के संविधान की प्रस्तावना में यह स्पष्ट कहा गया है कि चूँकि युद्ध मनुष्य के मन में उत्पन्न होते हैं, इसलिए शांति की रक्षा भी मनुष्य के मन में ही की जानी चाहिए। हिंसा, नफरत, अहंकार और डर जैसी भावनाएं पहले मनुष्य के मन में आती हैं, जिसके बाद बाहर लड़ाइयां या युद्ध शुरू होते हैं। सिद्धाश्रम के वामन भगवान मानव मन को चैतन्यता प्रदान करने वाले देव है। इस प्रकार सिद्धाश्रम के वामन भगवान सर्वनाशी युद्ध का स्थायी समाधान हैं।

भगवान विष्णु के प्रथम मनुज अवतार वामन देव की प्रचंड तपस्या से जो स्थान सिद्धता को प्राप्त किया वही सिद्धाश्रम है। वर्तमान काल में इसे बक्सर नाम से हम जानते हैं। वामन भगवान ने बिना किसी अस्त्र-शस्त्र का प्रयोग किए बिना महान प्रतापी बलिराज के मन को चैतन्यता प्रदान कर देव संस्कृति की रक्षा कर दी थी। मन को विकृति से मुक्त करने की क्षमता या विज्ञान ही भारत की सौम्य शक्ति यानी सॉफ्ट पावर है। वामन देव का सिद्धाश्रम भारत की सौम्य शक्ति का केंद्र रहा है।
बिहार के मुख्यमंत्री श्री सम्राट चौधरी के विशेष प्रयास से वामन भगवान की जन्मभूमि जेल की चहारदीवारी से मुक्त हो गयी। यह घटना वामन भगवान की जन्मभूमि के विकास का शुभारंभ माना जा सकता है। दूसरे शब्दों में यह भारत की सौम्य शक्ति का विश्वभर में स्थापित होने के अभियान का मंगलाचरण हो सकता है। इससे भारत के गौरव की पुनर्स्थापना के इतिहास की शुरूआत हो रही है जिसमें बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी का नाम स्वर्णाक्षरों में अंकित होगा।
आधुनिक समय में शक्तिशाली देशों की सेनाएं और उनके विभिन्न तंत्र लक्षित देश के नागरिकों की दिमाग को प्रभावित करने की रणनीति पर काम कर रहे हैं। इसे विचारों का युद्ध कहा जाता है। वर्तमान का यह युद्ध नकारात्मक है। मानव के समक्ष अस्तित्व संकट खड़ा करने वाला है। हमारे वामन भगवान ने यह कार्य सतयुग के अंत और त्रेतायुग के प्रारंभ यानी दोनों युगों के संधीकाल में करके दिखाया है। वामन भगवान ने जो मार्ग दिखाया था वह सकारात्मक और सात्विक है जिससे मानव सहित सृष्टि के सभी जीवों, पादपों और प्रकृति की रक्षा हुई थी।

पुराणों को सृष्टि का इतिहास माना गया है। वामन पुराण में वामन भगवान की यश-कीर्ति व धर्म की रक्षा से संबंधित कथाओं का वर्णन है। मानव समाज के उत्थान व पतन का वर्णन करने वाले वामन पुराण में देवर्षि नारद की मुख्य भूमिका रही है।
कई स्थानों पर नारद जी ने ही ऋषियों व राजाओं को भगवान विष्णु के वामन अवतार की कथा सुनायी है और उनकी महिमा का विस्तार से वर्णन किया है। भगवान विष्णु के सभी अवतारों के उद्देश्यों, धर्म की स्थापना और लीलाओं का लोक-कल्याण के लिए तीनों लोकों में प्रचार करने का कार्य नारद जी ने किया है। मनुज अवतारों में प्रथम वामन अवतार की कथा नारद स्वयं बताते हैं जबकि रामावतार की कथा वे महर्षि बाल्मीकि के प्रश्नों का उत्तर देकर उनसे कहवाते हैं।

नारदजी भगवान वामन के संदर्भ में कहते हैं कि उन्हांेने किसी का वध नहीं किया और समस्या का समाधान करा दिया। इस प्रकार वामन भगवान का मार्ग ही संघ की प्रमुखता वाले इस कलिकाल में मानव के लिए सबसे ज्यादा उपयोगी है।
वामन अवतार की कथा राजा बलि से जुड़ी है, जो भक्त प्रह्लाद के पोते थे। देवर्षि नारद का प्रह्लाद और उनके परिवार से गहरा आध्यात्मिक संबंध व संवाद रहा है। नारद जी ने ही पूर्वकाल में प्रह्लाद को भगवत भक्ति का मार्ग और ज्ञान दिया था।

वामन पुराण में राजा चित्रसेन और देवर्षि नारद का संवाद भोग से योग की ओर बढ़ने और तीर्थ-महिमा के सूक्ष्म ज्ञान का अत्यंत सुंदर आख्यान है।
राजा चित्रसेन एक वैभवशाली और प्रजापालक राजा थे। सब कुछ प्राप्त होने के बाद भी उनके मन में यह प्रश्न निरंतर कौंधता था कि इस नश्वर संसार के राज-पाट और भोग-विलास का अंतिम उद्देश्य क्या है? एक दिन जब देवर्षि नारद वीणा बजाते हुए उनके राजमहल में पधारे, तो राजा ने उनका भावपूर्ण स्वागत किया। उनके चरण पखारने के बाद अपने मन की व्यथा प्रकट की।
हे देवर्षि! मानव जीवन अत्यंत दुर्लभ है, किंतु व्यक्ति संसार के मायाजाल और भोग-विलास में उलझकर इसे व्यर्थ गंवा देता है। कृपा कर मुझे बताइए कि मन की शांति और परमगति प्राप्त करने का सबसे सरल मार्ग कौन सा है?
नारद जी ने राजा चित्रसेन के विवेक की सराहना की और उन्हें आध्यात्मिक साधना के तीन मुख्य स्तंभ बताए। नारद जी ने स्पष्ट कहा कि केवल नदियों में स्नान करने से ही शुद्धि नहीं होती। जब तक मनुष्य का मन सत्य, अहिंसा, दया और निष्काम भाव से युक्त नहीं होता, तब तक बाह्य स्नान निष्फल है।
अहंकार के साथ दिया गया दान व्यर्थ होता है। सुपात्र को, बिना किसी प्रतिफल की आशा के, नम्रतापूर्वक दिया गया दान ही अक्षय पुण्य देता है। नारद जी ने राजा को कुरुक्षेत्र, सरस्वती तट और विभिन्न पावन तीर्थों की महिमा बताते हुए कहा कि सत्संग और तीर्थों के दर्शन मनुष्य के जन्म-जन्मांतर के संस्कारों को शुद्ध कर देता है।
देवर्षि नारद के इस ज्ञानवर्धक उपदेश को सुनकर राजा चित्रसेन का संशय और सांसारिक आसक्ति पूरी तरह समाप्त हो गई। उन्होंने अपने पुत्र को राज्यभार सौंपा और स्वयं तीर्थ-सेवा व विष्णु-भक्ति में लीन होकर परम पद को प्राप्त किया।
वामन पुराण के 74 वें 75 वें अध्याय में राजा चित्रसेन के चरित्र और नारद जी के साथ हुए इस ज्ञान-संवाद का विस्तृत वर्णन मिलता है।
चैतन्यं सुमनं मनं मनमनं मानं मनं वामनं!
विश्वासार सरं सरं सरसरं सारं सरं वासरं!!
मायाजाल धवं धवं धव धवं धावं धवं माधवं
वैकुंठाधिपते भवं भव भवं भावं भवं शांभवं!!
मानव के मन को चैतन्य बनाकर उसे विकार रहित करने वाले वामन देव की कृपा से इस विश्व के सार तत्व का बोध हो जाता है। इससे अविद्या के कारण उत्पन्न मायाजाल नष्ट हो जाते है। वामन भगवान की कृपा प्राप्त मनुष्य बैकुठ के स्वामी नारायण एवं शिव तत्व से युक्त हो जाता है। संसार को अविद्या व माया के बंधन से मुक्त कराने वाले नारद जी के आराध्य वामन देव ही है। नारद को आद्य पत्रकार भी कहा गया है। सत्य आधारित श्रेष्ठ पत्रकारिता से ही लोकतंत्र स्वस्थ होता है। इस प्रकार लोकतंत्र के देवता भगवान वामन ही है।
आचार्य वराहमिहिर ने अपने पूर्ववर्ती संहिताचार्यों में नारद जी का प्रमुखता से वर्णन किया है। वराहमिहिर के पूर्ववर्ती संहिताकारों में एकमात्र नारद जी की ही संहिता ऐसी है जिसमें अधिकांश ज्योतिष विषयों का समावेश है। श्री नारद जी के द्वारा तीन स्कन्धों में ज्योतिष शास्त्र की रचना की गई है। जिसमें युग के प्रभाव से मानव व प्रकृति में होने वाले परिवर्तनों का ज्ञान निहित है। नारद जी के कई गं्रथ एवं पुराण उपलब्ध हैं, जिसमें धर्म एवं ज्योतिष आदि विषयों का विस्तृत विवेचन नारद मुनि द्वारा किया गया है।
काल के प्रभाव से युग परिवर्तन और दो युगों के संघिकाल में मानव मन व विचार-व्यवहार मंे होने वाले सकारात्क व नकारात्मक परिवर्तन का विस्तृत विवरण नारद पुराण में है। परिवर्तन सृष्टि का शश्वत नियम है। इसे स्वयं विधाता भी नहीं बदलता। भगवान विष्णु के प्रथम मनुज अवतार वामन ने युग परिवर्तन और युगों के संघिकाल में मानव के लिए धर्म निर्देशित आचरण ओर अनुशासन का प्रवर्तन किया है। इसमें तत्व की प्रधानता अलग-अलग है।
त्रेतायां मंत्र शक्तिश्च ज्ञानशक्तिः कृते युगे।
द्वापरे युद्ध शक्तिश्च, संघेशक्तिः कलौ युगे।।
नीति ग्रंथ का यह प्रचलित श्लोक वेद की उस ऋचा के भाव को अभिव्यक्त करता है जो राष्ट्र को संगठित करने के लिए मानव मन में एकता और समानता का उद्घोष करता है।
संगच्छध्वं संवदध्वं । सं वो मनांसि जानताम।।
देवा भागं यथा पूर्वे सञ्जानाना उपासते। समानो मन्त्रः समितिः समानी
समानं मनः सहचित्तमेषाम। समानं मन्त्रमभिमन्त्रये वः
समानेन वो हविषा जुहोमि। समानी व आकूतिः
समाना हृदयानि वः। समानमस्तु वो मनो यथा वः सुसहासति।
ऋग्वेद का यह मंत्र भारत वर्ष में निवास करने वाले आर्यो केे मन की समानता की कामना करते हैं ताकि हमारे राज्य व्यवस्था का संचालन करने वाली समिति सबकी समिति हो। हमारे मन जब एक रहेंगे तो हमारा चित भी एक होगा। हमारे हृदयों मंे उठने वाले भाव व संकल्प भी एक ही होगा। यही हमारे उत्थान का मार्ग है।
कलिकाल में संघ यानी संगठन को प्रधान शक्ति कहा गया है। हमारा देश लोकतांत्रिक देश है जहां हम सब मिलकर अपनी व्यवस्था का संचालन करने वाली सरकार को चुनते हैं। लोकतंत्र की व्यवस्था ठीक से चले इसके लिए वैदिक ज्ञान के आधार पर लोक के मन को एक बनाए रखना अतिआवश्यक है।
वामन भगवान ही ऐसे देव हैं जो मनुष्य के मन के अंदर से कलुषता, अविद्या और अधर्म की वृति व प्रवृति का नाशकर उसे सामूहिक शक्ति के प्रकटीकरण के योग्य बनाते हैं। यही कारण है कि इस पृथ्वी को निशाचरों के अत्याचार से मुक्त कराने के अपने संकल्प को सिद्ध करने के लिए महर्षि विश्वामित्र को वामन देव की तपोभूमि-जन्मभूमि पर निवास कर साधना करनी पड़ी थी। इसके बाद उन्होंने भगवान श्रीराम को यहां लाया। भगवान श्रीराम ने वामन के उस शक्ति को धारण किया जिसके द्वारा वनवास के समय उन्होंने वानरी सेना को संगठित किया। कलिकाल में लोकतांत्रिक व्यवस्था का संचालन वामन की ज्ञान व आध्यात्मिक शक्ति से ही संभव है। वामन देव मानव मन को शुभ्र और शक्तिशाली बनाने वाले देव है।
