बिहार के सृजन घोटाले का जिन्न एक बार फिर वोतल से बाहर निकल आया है। करीब 9 साल पहले हुए 5500 करोड़ के इस घोटाले को लेकर बिहार के नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव ने पूर्व सीएम नीतीश कुमार और बीजेपी पर गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने कहा कि 5500 कारोड करोड़ की कथित लूट का अब तक हिसाब नहीं मिला है। सृजन के 5500 करोड़ रुपए डकार कर आज भी इस घोटाले के दुर्जन आराम से घूम रहे हैं और सत्ता सुख भोग रहे हैं। तेजस्वी ने आरोप लगाया कि 5500 करोड़ रूपये के इस बड़े घोटाले के नौ साल बाद भी राज्य के लोगों को उनकी मेहनत की लूटी गई कमाई का कोई हिसाब नहीं मिला है। इसमें जांच एजेंसियों की भूमिका पर भी तेजस्वी ने सवाल उठाया और कहा कि सत्ता में बैठे बड़े नेताओं और अधिकारियों को बचाने के लिए पूरे मामले को दबाने की कोशिश की गई।
करीबी लोगों के खातों में ट्रांसफर किए करोड़ों
अपने सोशल मीडिया पेज पर लिखे एक पोस्ट में तेजस्वी यादव ने दावा किया कि सरकारी फंड का सृजन घोटाले में सुनियोजित तरीके से गबन किया गया। आज से ठीक नौ साल पहले बिहार में 5,500 करोड़ रूपये का सृजन घोटाला सामने आया था। उन्होंने कहा कि तत्कालीन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के करीबी नेताओं, मंत्रियों और अधिकारियों ने सरकारी खजाने से 5,500 करोड़ रूपये अपने सहयोगियों के निजी खातों में ट्रांसफर किए थे। कई वरिष्ठ BJP नेताओं, केंद्रीय मंत्रियों और घोटाले के दोषियों के बीच लेन-देन और करीबी संबंधों के स्पष्ट सबूत होने के बावजूद, जांच एजेंसियों ने मामले को दबा दिया।
BJP की गंगोत्री में दोषियों के पाप धुल गए
केंद्रीय जांच एजेंसियों और सत्ताधारी पार्टी पर निशाना साधते हुए तेजस्वी यादव ने कहा कि जांच का इस्तेमाल निष्पक्ष नतीजे तक पहुंचने के बजाय राजनीतिक फायदे के लिए किया गया। तेजस्वी यादव ने आगे कहा कि नौ साल बाद भी लूटे गए 5,500 करोड़ रुपये का कोई हिसाब या रिकॉर्ड नहीं है। BJP के भ्रष्टाचार की ‘गंगोत्री’ में डुबकी लगाकर कोई भी अपने सारे पाप धो सकता है। विदित हो कि सृजन घोटाले की शुरुआत बिहार के भागलपुर जिले में मनोरमा देवी द्वारा स्थापित ‘सृजन महिला विकास सहयोग समिति’ नाम की एक NGO से हुई थी। इसका मकसद महिलाओं को वोकेशनल ट्रेनिंग देना और उन्हें आत्मनिर्भर बनाना था। इस संस्था को चलाने वाले लोगों ने जिला प्रशासन और बैंक अधिकारियों के साथ अपने संबंधों और अपने राजनीतिक रसूख का फायदा उठाकर एक संगठित नेटवर्क बनाया।
इस स्कीम के तहत, जमीन अधिग्रहण, इंदिरा आवास योजना, जिला कल्याण योजनाओं और शहरी विकास विभागों के लिए आवंटित फंड को सरकारी खजाने में जमा करने के बजाय, फर्जी चेक और नकली हस्ताक्षरों का इस्तेमाल करके सीधे ‘सृजन’ के खातों में ट्रांसफर कर दिया गया। इस तरह हड़पे गए सरकारी फंड का इस्तेमाल निजी संपत्ति और रियल एस्टेट खरीदने में किया गया और इसे ब्याज पर भी दिया गया। यह धोखाधड़ी सालों तक चलती रही, लेकिन इस बड़े घोटाले की परतें आखिरकार अगस्त 2017 में खुलीं, जब भागलपुर के जिला मजिस्ट्रेट द्वारा जारी 270 करोड़ रुपये का सरकारी चेक बाउंस हो गया।