डॉ. अद्वैत कृष्ण
गंगा के तट पर स्थित हमारा पटना मेडिकल कालेज अपना शताब्दी समारोह मनाने जा रहा है। यह हम जैसे हजारों पूर्ववर्ती छात्रों के लिए विशेष अवसर है। अपनी सौ साल की यात्रा में इस महान संस्थान ने हजारों ऐसे चिकित्सकों को पैदा किया है जो चिकित्सा शिक्षा, शोध और रोग निदान, सेवा के क्षेत्र में महत्वपूर्ण कार्य कर रहे हैं। इस संस्थान का परिवार अत्यंत विशाल है। इसके पूर्ववर्ती छात्र आज पूरे विश्व में फेले हुए हैं और इस संस्थान से भावनात्मक रूप से जुडे हुए हैं। इस संस्थान की प्रतिष्ठा में वृद्धि के लिए कुछ करना चाहते हैं। इस महान संस्थान के पूर्ववर्ती छात्र जब विदेश से यहां आते हैं तो अपने इस मातृ संस्थान के दर्शन करने जरूर आते हैं।
पीएमसीएच में पैड्रियाटिक्स आउट डोर के संस्थापक डा. गया प्रसाद के पुत्र डा. रवीन्द्र सिन्हा ने अपने पिता की याद मेें पैड्रियाटिक्स विभाग में एक पुस्तकालय बनवाया जहां महत्वपूर्ण जर्नल उपलब्ध रहते हैं। शताब्दी वर्ष के अवसर पर इस संस्थान में शोध की पुरानी परम्परा को फिर से दृढ करने की योजना बननी चाहिए जिसमे इसके पूर्ववर्ती छात्रों का भरपूर सहयोग मिल सकता है। जब हम वहां के छात्र थे तब उसका नाम प्रिंस आफ वेल्स मेडिकल कालेज था। सौ वर्ष पूर्व इस संस्थान ने इसी नाम से अपनी यात्रा षुरू की थी। उसके प्रथम प्राचार्य अंग्रेज थे लेकिन कालेज के कई प्रोफेसर भारतीय भी थे। पूर्व में बिहार और उड़ीसा बंगाल प्रांत का ही एक हिस्सा था। लेकिन बाद में बिहार और उड़ीसा अलग प्रांत बन गया। अलग प्रांत बनने के 15 वर्ष बाद पटना में मेडिकल कालेज की स्थापना हुई जिसमें बिहार के उस समय के संसाधन सम्पन्न लोगों का महत्वपूर्ण योगदान था।
इस कालेज के प्रथम बैच की शुरूआत के लिए बंगाल स्थित मेडिकल कालेज से 15 छात्रों का नामांकन यहां कराया गया था। इस प्रकार अपने शैशवावसथा को पार करता हुआ इस कालेज ने अगले दस वर्षों में ही भारत और भारत के बाहर विदेशों में भी अपनी विशिष्ट पहचाना बनाना शुरू कर दिया था। इस कालेज की ख्याति विदेषों में है। एक छात्र के रूप में इस चिकित्सा शिक्षा संस्थान में व्यतीत समय मेरे जीवन का सबसे सुखद काल था। वहां के शैक्षिक वातावरण में मैने जो सीखा वह मेरे जीवन का आधार बना। सचमुच यह कालेज एक परिवार जैसा था। वरीय और कनीय छात्र एक दूसरे से अद्भुत भावनात्मक बंधन में बंधे हुए थे। यह भावनात्मक रिश्ता कालेज के बाद भी कायम रहा। शिक्षकों के साथ भी हमारे सम्बंध अत्यंत आदर और प्रेम का था। शिक्षक हमारे अभिभावक थे। पटना मेडिकल कालज में जो वातावरण था उसमें मेडिकल की कठीन पढ़ाई सहजता से पूरी होती चली जाती थी। सीखने-सीखने, प्रषिक्षित करने का अद्भुत माहौल था। हमे अपने शिक्षकों से समय की पाबंदी और अनुशासन का जो शिक्षण-प्रशिक्षण मिला वह हमारे जीवन का आधार बना।
यह बात सही है कि कुछ कालखंड में इस महान चिकित्सा शिक्षा संस्थान के समक्ष समस्याएं आयीं। संसाधन की कमी के कारण उत्पन्न समसयाओं से शिक्षकों अैर छात्रों को जूझना पड़ा। समय पर ग्रांट नहीं मिलने और शिक्षकों की कमी, समय पर प्रोन्नति का न होना जैसी समस्याओं के कारण इस कालेज के समक्ष गंभीर समसएं थीं। लेकिन, शताब्दी वर्ष के अवसर पर यह कालेज अपनी समस्याओं से पार पाते हुए अपने गौरवषाली अतीत की ओर लौटता दिख रहा है। यह हमारे जैसे इसके पूर्ववर्ती छात्रों के लिए संतोष की बात है।