पटना : बिहार की सियासत में पर्यावरण और कानून के पालन को लेकर एक बार फिर गर्मागर्म बहस छिड़ गई है। गुरुवार को बिहार विधान परिषद के प्रश्नकाल के दौरान सरकार उस वक्त असहज हो गई, जब खुद सरकारी परिसरों में ही प्रतिबंधित प्लास्टिक के इस्तेमाल का मुद्दा गूंजा। राजद एमएलसी सौरभ कुमार ने सदन में सरकार की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े किए। उन्होंने याद दिलाया कि राज्य सरकार ने दिसंबर 2021 में ही सिंगल यूज प्लास्टिक और थर्मोकोल के उत्पादन, भंडारण और वितरण पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया था।
सौरभ कुमार ने जमीनी हकीकत बयां करते हुए आरोप लगाया कि प्रतिबंध के बावजूद खुले बाजार में प्लास्टिक का इस्तेमाल जारी है। हैरानी की बात यह है कि बिहार विधानसभा और विधान परिषद की कैंटीन में भी धड़ल्ले से सिंगल यूज पॉलिथीन और थर्मोकोल का उपयोग हो रहा है। उन्होंने सवाल किया कि जब सरकारी परिसरों में ही कानून का पालन नहीं हो रहा, तो आम जनता से इसकी उम्मीद कैसे की जा सकती है?
विपक्ष के इन तीखे सवालों का जवाब देते हुए मंत्री प्रमोद कुमार ने स्वीकार किया कि प्लास्टिक मुक्त बिहार के अभियान में व्यवहारिक मुश्किलें आ रही हैं। उन्होंने सदन में अपनी बेबसी और भविष्य की योजना दोनों साझा की। “सबसे बड़ी तकनीकी समस्या सिंगल यूज और मल्टी यूज प्लास्टिक के बीच अंतर करने में आती है। जांच के दौरान अधिकारी यह स्पष्ट नहीं कर पाते कि कौन सा प्लास्टिक प्रतिबंधित श्रेणी में है और कौन सा नहीं। इसी धुंधली लकीर का फायदा उठाकर लोग इसका इस्तेमाल कर रहे हैं।
मंत्री ने स्पष्ट किया कि वह व्यक्तिगत तौर पर प्लास्टिक पर और भी व्यापक और सख्त प्रतिबंध के पक्षधर हैं ताकि किसी भी प्रकार का संशय न रहे। सरकार की ओर से संकेत दिए गए हैं कि मौजूदा नियमों की विफलता को देखते हुए और सख्त कानून लाने पर विचार किया जा रहा है। मंत्री ने कहा कि यदि सदन सहमति देता है, तो सरकार इस पर और अधिक प्रभावी नियंत्रण के लिए ठोस कदम उठाएगी।
2021 में लागू किए गए इस कानून का उद्देश्य पर्यावरण को बचाना था, लेकिन सदन में हुए खुलासे ने यह साफ कर दिया है कि निगरानी तंत्र पूरी तरह विफल साबित हो रहा है। तकनीकी जटिलताओं की वजह से उल्लंघन करने वालों को रास्ता मिल रहा है। राजद ने साफ कर दिया है कि वह इस मुद्दे को केवल सदन तक सीमित नहीं रखेगा, बल्कि सरकार को पर्यावरण के प्रति जवाबदेह बनाएगा। अब देखना यह है कि इस खुलासे के बाद क्या सरकार वाकई अपनी नाक के नीचे यानी विधानमंडल की कैंटीन से प्लास्टिक हटा पाती है या नहीं।