पटना : बिहार की राजनीति में इस वक्त सबसे बड़ा सवाल मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के इस्तीफे और उनके दिल्ली जाने को लेकर बना हुआ है। 16 मार्च को राज्यसभा के लिए निर्वाचित होने के बाद अब संवैधानिक समय-सीमा (14 दिन) समाप्त होने की ओर है। तकनीकी और संवैधानिक प्रावधानों के अनुसार, 30 मार्च तक नीतीश कुमार को अपनी वर्तमान विधान परिषद (MLC) सदस्यता पर फैसला लेना होगा।
बिहार विधानसभा के अध्यक्ष प्रेम कुमार के अनुसार, यदि कोई सदस्य दूसरे सदन (राज्यसभा) के लिए चुना जाता है, तो उसे निर्वाचन के 14 दिनों के भीतर अपनी वर्तमान सदस्यता से इस्तीफा देना पड़ता है। 16 मार्च को निर्वाचन हुआ था, जिसका 14वां दिन 30 मार्च को पूरा हो रहा है। यदि 30 मार्च तक नीतीश कुमार एमएलसी पद से इस्तीफा नहीं देते हैं, तो उनकी राज्यसभा की सदस्यता स्वतः समाप्त हो जाएगी। संविधान का अनुच्छेद 164(4) के अनुसार “कोई भी व्यक्ति बिना किसी सदन (विधानसभा या विधान परिषद) का सदस्य रहे भी 6 महीने तक मुख्यमंत्री पद पर बना रह सकता है।
इसका मतलब यह है कि अगर नीतीश कुमार 30 मार्च को एमएलसी पद से इस्तीफा दे भी देते हैं, तब भी वे अगले 6 महीनों तक बिहार के मुख्यमंत्री बने रह सकते हैं। उन्हें सीएम की कुर्सी तुरंत छोड़ने की कोई संवैधानिक मजबूरी नहीं है। नीतीश कुमार ने हाल ही में अपनी समृद्धि यात्रा संपन्न की है, जिसका समापन पटना के बापू सभागार में हुआ। यात्रा के दौरान कई जिलों में समर्थकों ने उनसे बिहार न छोड़ने की भावुक अपील की। इसके बाद पूर्णिया से निर्दलीय सांसद पप्पू यादव ने सीएम नीतीश की सुझाव दिया था कि यदि नीतीश कुमार राज्यसभा जाना ही चाहते हैं, तो उन्हें जेडीयू से ही किसी अन्य विश्वसनीय चेहरे को मुख्यमंत्री बना देना चाहिए।
अब सबकी नजरें 30 मार्च पर टिकी हैं। क्या नीतीश कुमार केवल एमएलसी पद से इस्तीफा देकर सीएम बने रहेंगे, या वे पूरी तरह से दिल्ली की राजनीति में सक्रिय होने के लिए मुख्यमंत्री का पद भी त्याग देंगे? बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष और राज्यसभा के लिए नवनिर्वाचित नितिन नवीन के इस्तीफे को लेकर भी सरगर्मी तेज है। जेडीयू के अंदरखाने चर्चा है कि नीतीश कुमार ‘वेट एंड वॉच’ की स्थिति में हैं। वे राज्यसभा की सदस्यता सुरक्षित रखकर बिहार की कमान अपने पास ही रखना चाहते हैं या किसी उत्तराधिकारी का ऐलान करेंगे, यह सस्पेंस बरकरार है।