-1976 में सर्वाधिक उत्पादन कर जीता था स्वर्ण पदक, 1993 में हुई बंद; अब 500 करोड़ से अधिक के निवेश से नयी मिल को मंजूरी
नवादा : कभी जिस मोहिनी शुगर मिल ने जिले के वारिसलीगंज को औद्योगिक पहचान दी थी, वह आज भले ही इतिहास का हिस्सा बन चुकी है, लेकिन उसकी यादें लोगों के जेहन में अब भी जिंदा है। करीब तीन दशक से अधिक समय बाद वारिसलीगंज में नयी चीनी मिल की मंजूरी ने उस पुराने दौर की यादों को फिर से ताजा कर दिया है। 23 सितंबर 2026 को बिहार कैबिनेट ने वारिसलीगंज में नयी चीनी मिल की स्थापना को मंजूरी दी। परियोजना में 500 करोड़ रुपये से अधिक के निवेश की संभावना जतायी गयी है।
वारिसलीगंज की ऐतिहासिक चीनी मिल का सफर वर्ष 1952 में शुरू हुआ था। बाद में करमचंद थापर कंपनी ने इसे मोहिनी शुगर मिल्स लिमिटेड के नाम से संचालित किया। उपलब्ध ऐतिहासिक स्रोत भी 1952 में मोहिनी शुगर मिल के शुरू होने और करमचंद थापर कंपनी से इसके जुड़ाव की पुष्टि करती है। धीरे-धीरे यह मिल दक्षिण बिहार के गन्ना उत्पादक क्षेत्र का महत्वपूर्ण केंद्र बन गयी। नवादा के अलावा नालंदा, शेखपुरा, गया और जमुई सहित आसपास के इलाकों के किसान यहां अपना गन्ना लेकर पहुंचते थे। मिल के साथ खेती, परिवहन, मजदूरी, व्यापार और छोटे कारोबार की पूरी अर्थव्यवस्था जुड़ गयी थी। अलग-अलग जिलों से करीब 1200 कर्मचारी यहां काम करते थे। यानी एक मिल परिसर में सिर्फ मशीनें नहीं चलती थीं, बल्कि हजारों परिवारों की उम्मीदें भी चलती थीं।
मोहिनी शुगर मिल के स्वर्णिम दौर को याद करने वाले किसान उमेश सिंह के अनुसार, गन्ने की खेती ने इलाके की आर्थिक तस्वीर बदल दी थी। खेतों में गन्ने की फसल लहलहाती थी और कटाई के बाद उसे मिल तक पहुंचाने के लिए गांवों से वाहनों की कतारें निकलती थी। गन्ने से मिलने वाली आमदनी से लोगों के घरों की स्थिति बदली। कई कच्चे मकान पक्के हुए। स्थानीय बाजारों में कारोबार बढ़ा। रोजगार के अवसर पैदा हुए। मिल से जुड़े कामों ने बड़ी संख्या में लोगों को सीधे और अप्रत्यक्ष रूप से रोजगार दिया। कहा जाता है कि मिल की वजह से आसपास के क्षेत्र में बिजली पहुंचने और औद्योगिक गतिविधियों को गति मिलने का दौर शुरू हुआ। उस समय मोहिनी मिल सिर्फ चीनी बनाने वाली फैक्टरी नहीं, बल्कि पूरे क्षेत्र की आर्थिक धुरी बन चुकी थी।
मोहिनी शुगर मिल के इतिहास का सबसे चमकदार अध्याय वर्ष 1976 माना जाता है। इसी वर्ष मिल ने चीनी उत्पादन में ऐसा रिकॉर्ड कायम किया, जिसने इसे राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलायी। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, वर्ष 1976 में देश में सर्वाधिक चीनी उत्पादन के लिए भारत सरकार ने मिल को स्वर्ण पदक से सम्मानित किया था। इस उपलब्धि की चर्चा बाद के प्रकाशित स्रोतों में भी मिलती है। उस समय मिल की सफलता के साथ किसानों की खुशहाली भी जुड़ी हुई थी। गन्ने की अच्छी पैदावार, मिल में उत्पादन और समय पर भुगतान ने किसानों को खेती के प्रति भरोसा कायम किया था।
मोहिनी मिल में काम कर चुके पुराने कर्मचारियों के लिए वह दौर महज नौकरी का दौर नहीं था। मिल के आसपास ही कई परिवारों की जिंदगी बसी थी। सुबह काम पर जाना, दिनभर मशीनों के बीच मेहनत करना और शाम को घर लौटना उनकी रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा था। पुराने कर्मचारियों की यादों में मिल का परिसर आज भी वैसा ही जिंदा है, जहां मशीनों की आवाज सुनायी देती थी, गन्ने की खुशबू आती थी और मजदूरों की आवाजाही लगी रहती थी। हालांकि बाद के वर्षों में कर्मचारियों के वेतन के भुगतान में देरी होने लगी। आर्थिक संकट बढ़ता गया और कभी क्षेत्र की पहचान रही मिल धीरे-धीरे मुश्किलों में घिरती चली गयी।
मोहिनी मिल के इतिहास में वर्ष 1977 एक बड़ा मोड़ लेकर आया। 1976 में रिकॉर्ड उत्पादन के अगले ही वर्ष बिहार राज्य चीनी निगम ने मिल का अधिग्रहण कर लिया। उपलब्ध रिपोर्टों में भी 1977 में बिहार राज्य चीनी निगम द्वारा मिल के अधिग्रहण का उल्लेख मिलता है। सरकारी नियंत्रण में आने के बाद धीरे-धीरे मिल की स्थिति कमजोर होती गयी। प्रबंधन संबंधी समस्याओं के साथ किसानों और कर्मचारियों के भुगतान में देरी का दौर शुरू हुआ। उत्पादन क्षमता प्रभावित हुई और मिल आर्थिक संकट की ओर बढ़ती गयी। जो मिल कभी क्षेत्र की समृद्धि का प्रतीक थी, उसकी चमक धीरे-धीरे फीकी पड़ने लगी।
लगातार आर्थिक संकट, तकनीकी रूप से पुरानी पड़ती मशीनों और घाटे के बीच वर्ष 1993 में लालू यादव की सरकार ने मोहिनी शुगर मिल को बंद कर दिया। मिल के 1993 में बंद होने की जानकारी पुराने समाचार अभिलेखों और सरकारी दस्तावेजों में दर्ज है। इसके साथ ही वारिसलीगंज के औद्योगिक इतिहास का एक बड़ा अध्याय समाप्त हो गया। मिल की चिमनी खामोश हो गयी। गन्ने से लदे वाहनों की कतारें गायब हो गयीं और हजारों किसानों तथा कर्मचारियों से जुड़ी आर्थिक गतिविधियां थम गयीं। कभी जहां मशीनों की आवाज दूर तक सुनायी देती थी, वहां धीरे-धीरे सन्नाटा छा गया।
मोहिनी शुगर मिल के बंद होने के बाद भी वारिसलीगंज के लोगों और गन्ना किसानों के मन में चीनी मिल की जरूरत बनी रही। समय-समय पर पुरानी मिल को फिर शुरू करने या नयी चीनी मिल स्थापित करने की मांग उठती रही। अब वर्ष 2026 में बिहार सरकार ने वारिसलीगंज में नयी चीनी मिल की स्थापना को मंजूरी दी है। कैबिनेट के फैसले के बाद इस परियोजना में 500 करोड़ रुपये से अधिक के निवेश की संभावना जतायी गयी है। प्रस्तावित मिल से नवादा के साथ नालंदा, शेखपुरा और जमुई के गन्ना किसानों को लाभ मिलने की बात कही गयी है।
वारिसलीगंज के लिए मोहिनी शुगर मिल सिर्फ ईंट-पत्थर और मशीनों का परिसर नहीं थी, वह एक ऐसा दौर था, जब खेतों में उगने वाला गन्ना सीधे हजारों परिवारों की जिंदगी में मिठास घोलता था। 1976 का स्वर्ण पदक, मिल की चहल-पहल, किसानों की गन्ने की फसल, कर्मचारियों की मेहनत और 1993 में मशीनों के थमने तक की कहानी आज भी लोगों की यादों में दर्ज है। अब नयी चीनी मिल की मंजूरी ने उन पुरानी यादों को फिर से जगा दिया है। बुजुर्गों की आंखों में बीते दौर की तस्वीरें हैं, तो किसानों की निगाहें आने वाले कल पर टिकी हैं। जिस वारिसलीगंज में कभी मोहिनी मिल की चिमनी क्षेत्र की खुशहाली का संकेत हुआ करती थी, वहां अब नयी चीनी मिल के साथ एक बार फिर गन्ने की मिठास और रोजगार की नयी कहानी लिखे जाने की उम्मीद जगी है।
भईया जी की रिपोर्ट